रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड ३५३
आगे-आगे जा रहा हो कि हमारे कारण ही यह मनुजाशन (रावण) सीता के
निमित्त श्रीराम का सामना कर रहा है । अस्ताद्रि पर आरूढ सूर्य की भांति महोदर शरत्-
काल के मेघ की समता करनेवाले तथा ऐरावत के अश से युक्त सुदर्शन नामक हाथी पर
बैठकर निकला । निशित आयुधो से प्रकाशित होनेवाला शीघ्रगामी रथ, जिसमे बलिष्ठ तथा
चचल अश्व जुते हुए थे और जो सूर्य के समान भासमान था, उस पर, इन्द्रचाप के समान
दीखनेवाले धनुष धारण किये हुए, नील मेघ के समान त्रिशिर निकला । तब धनुर्वेद का
पडित अतिकाय, अत्यत तेजस्वी शर, चाप, खड्ग तथा विविध शस्त्रास्त्रो से युक्त तथा
सूर्य-सम प्रकाश से भासमान, स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर रवाना हुआ । विविध आभूषणो
से युक्त हो कनक पर्वत के समान दीप्त होते हुए नरातक, देवताओ के अश्व का स्मरण
दिलानेवाले विविध आभूषणो से अलकृत श्रेष्ठ अश्व पर आरूढ हो, प्रविमल तेज से
विलसित हो, बलिष्ठ बाहुओ में शक्ति धारण किये हुए, शक्तिपाणि (कुमार) की भाँति
निकल पड़ा । दीप्त गदा धारण करके देवांतक, विष्णु के समान सुशोभित होते हुए रवाना
हुआ । महापार्श्व विशाल गदा लिये हुए गुह्यकेश्वर (कुबेर) के समान निकला। कालचक्रो
के वेग से असख्य रथ भी साथ निकल पडे । पर्वतो की भाँति दीखनेवाले करोडो श्रेष्ठ
मदमत्त हाथी अपने उद्धड दण्डो से (सूँडो से) सुशोभित होते हुए झुण्डो में चलने लगे ।
अपनी हिनहिनाहट की गभीर ध्वनि को चारो ओर प्रतिध्वनित करते हुए अश्व चलने लगे ।
यम-किकरो के सदृश दीखनेवाले पदचर-सैनिक भयकर गति से चलने लगे ।
ऐसी अनुपम चतुरगिणी सेना के मध्य भाग में प्रलय-काल के सूर्यो की भाँति, प्रकाश-
मान होनेवाले छहो दैत्य-वीर, दीखने लगे । उनके श्वेत छत्र शरत्काल के मेघ की भाँति
शोभायमान होने लगे । हम अवश्य विजय प्राप्त करेंगे या युद्ध में प्राण-त्याग करेंगे, किन्तु
रण का उत्साह नही छोड़ेंगे, वे ऐसी विविध प्रतिज्ञाएँ करत हुए, एक दूसरे को पुकारते
हुए युद्ध के लिए रवाना हुए । उनके विचित्र सिंहनाद, रथ-घोष, अश्वो की हिनहिनाहट,
गजो की चिंघाड, सैनिको के अत्यत भयकर पदाघात, अनुपम ध्वजाओ का किकिनी-रव,
पटह, भेरी तथा शखो की भयावह ध्वनि तथा निसान-तुरहियो का घोर नाद आदि से समस्त
दिशाएँ गूँजने लगी; आकाश हिल उठा, नक्षत्र गिरने लगे, वासुकि ने करवट ली, मेरु-
पर्वत आमूल हिल गया, पृथ्वी कपित हुई और दुर्बह भार से दिग्गज विचलित हुए ।
इस प्रकार, जब राक्षस-सेना दुर्ग से बाहर निकली, तब वानर-वीर, भूमि तथा
आकाश को चीरनेवाली भयकर ध्वनियाँ तथा भयकर हुकार करते हुए बड़े उत्साह से
पर्वतो तथा वृक्षो को राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । दैत्यो ने वानरो पर अविरत गति से
शर-वृष्टि आरभ कर दी। वानरो द्वारा असुरो पर आक्रमण करने के पहले ही असुर वानरो
पर आक्रमण कर देते और उनका सर्वनाश करने लगते । वे एक दूसरे से जूझने, एक दूसरे
को गिराते, और असुरो के हाथो के शस्त्र छीनकर उन्हें तोड डालते । तब क्रूर राक्षस
क्षुब्ध होकर वानरो के हाथो के पर्वतो तथा वृक्षो को तोड डालते । राक्षस कपियो के पैर
पकडकर उन्हें भयकर गति से नीचे पटक देते, तो वानर तुरन्त उनके पैर पकडकर
उन्हें पृथ्वी पर गिरा देते । इस प्रकार, घोर युद्ध करते हुए वानरो तथा राक्षसो के
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