रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 388, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ रंगनाथ रामायण
मानो वह सभी लोकों को निगलनेवाला हो । फिर, उसने सहस्र सूर्यों की भाँति उज्ज्वल
एक विशाल रथ पर आरूढ होकर सिंहनाद करते हुए, अपने प्रताप की डींग हाँकते हुए,
धनुष का टंकार करते हुए, भीषण गति से कपि-सेना पर आक्रमण किया, जैसे प्रलय-काल
की अग्नि घोर वन पर आक्रमण करती है । उस निशाचर का रूप देखकर सभी वानर
भयभीत हो गये कि कुंभकर्ण ही फिर रौद्र रूप धरकर आ गया है । उसे देखते ही
कुछ वानर मूच्छित हो गये, तो कुछ आड में छिपकर देखने लगे। कुछ वानर भयभीत हो
आर्तनाद करने लगे तो कुछ संभ्रमित हो गये और कुछ राम की दुहाई देने लगे । इस
प्रकार, भयभीत होकर भागनेवाले वानरो को देखकर श्रीराम कहने लगे—'भागो मत,
भागो मत ।' फिर, सभी में व्याप्त प्रलय-काल की घनघोर घटा की भाँति गर्जन करते
हुए अत्यधिक वेग से आनेवाले राक्षसराज के पुत्र के प्रताप, दर्प, एव गति को निकट
देखकर राम स्वयं आश्चर्यचकित होकर विभीषण से बोले—'हे विभीषण, अशनि-
पात के समान भयकर ध्वनि करनेवाले उस रथ पर आरूढ होकर इन्द्र-धनुष की
समता करनेवाला विपुल-प्रभा-समन्वित धनुष धारण किये हुए, परिघ, गदा, शूल, परशु,
भाला, तोमर, चक्र तथा दिव्य-शस्त्र-समूह से युक्त अद्वितीय राहु-चिह्नवाली ध्वजा
से विलसित, चार सारथियो, तथा एक सहस्र अश्वो से युक्त रथ पर त्रिनेत्र की मूर्ति के
समान अपनी प्रतापाग्नि को चारो दिशाओ में विकीर्ण करते हुए आनेवाला वह वीर कौन है ?'
तब विभीषण ने रामचंद्र से कहा—'हे देव, यह राक्षस, देवताओ के शत्रु (रावण)
का पुत्र है । यह रावण से भी अधिक रण-कुशल है । हे राजन्, यह चतुरंगिणी सेना के
साथ युद्ध करने में महानिपुण है और अद्वितीय वेद-शास्त्रादि विद्याओ में निष्णात है ।
यह अध्यात्म-तत्त्वज्ञ है । इस वीर की शक्ति के विश्वास पर लंका सतत निःशंक रहती है।
देवताओ से वैर ठानकर युद्ध में उनके हाथो नहीं मरने का वर इसने ब्रह्मा से प्राप्त
किया है । यह दिव्य आयुधो, दिव्य अस्त्रो तथा मंत्र-शक्ति से संपन्न है । इसने इन्द्र
आदि देवताओ को सौ बार परास्त किया है । इन्द्र का वज्रायुध, वरुण का पाश, और
यम का प्रचड दड तथा कुवेर की गदा सदा इसके बाण-समूह के अधीन होकर रहते हैं ।
रावण ने इसे धान्यमालिनी में अपने पुत्र के रूप में प्राप्त किया था। हे राजन्, सभी
वानरो को कुचल डालने के पहले ही आप अपने अनुपम पराक्रम से इसका वध कर दें,
तो अच्छा हो ।'
इतने में ही उस राक्षस को, धनुष के टकार से समस्त दिशाओ को प्रतिध्वनित
करते हुए निकट आते देखकर, खडनोदग्र, गवय, गोमुख, ज्योतिर्मुख, कुमुद, पवन-पुत्र, मैन्द,
नल, शरभ, नील, शतवली, गज आदि कपि-वीर वृक्षो तथा महान् पर्वतो को उठाये हुए
उसका सामना करने लगे । तब, उस राक्षस ने हँसते हुए कहा—'हे वानरो, तुममें रण-
विक्रम-कौशल एवं शक्ति नहीं है, अत तुम यहाँ से हट जाओ । तुम मुझे उस शूर को
दिखाओ, जिसने अपने बाण के अग्रभाग से समुद्र को सोख लिया था और तीनो लोको
की प्रशंसा प्राप्त की थी । मैं अपना अनुपम अस्त्र उसके सिवाय और किसी पर नहीं
चलाऊँगा । त्रिभुवनविजयी, अनुपम शूर तथा अलघु बलवान्, कुंभकर्ण का सिर काट डालनेवाला