रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैसे जब उसका सिर पृथ्वी पर गिरा, तब उसके सिर को देखकर हतशेष राक्षस भयभीत
होकर लका की ओर भागने लगे । सभी वानर लक्ष्मण की प्रशसा करने लगे । रामानुज ने
तब रामचन्द्र के चरणो में गिरकर प्रणाम किया, तो उन्होने बड़े आनंद से लक्ष्मण को हृदय
से लगा लिया और वानरो के साथ अत्यधिक हर्ष प्रकट किया ।
अतिकाय आदि छह वीरो की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण मूच्छित हो गया ।
फिर सचेत होकर अविरल अश्रु वहाते हुए वह अत्यधिक शोक से सतप्त होने लगा । इस
प्रकार दुख से पीडित होनेवाले पति की सेवा में पहुँचकर मय-पुत्री मदोदरी कहने लगी—
'हे असुरेन्द्र, सभी लोको में अद्वितीय शक्ति से सपन्न आपका ऐसा दुखी होना उचित
नही है । उस दिन वीर की तरह आप राम की देवी को क्यो ले आये ? उन्हें फिर
राम के पास पहुँचाना आप नही चाहते थे । अब उचित समय बीत गया । उस राम पर
आक्रमण करने के लिए गये हुए राक्षस-वीर फिर लौटकर आयेंगे, यह आगा आप छोड़
दीजिए । हे नाथ, युद्ध में आप अपनी शक्ति दिखाइए ।'
इन बातो पर रावण ने मन-ही-मन विचार किया । उसने अपनी स्त्री को अत पुर
में भेज दिया और दुःख की लबी साँस खींचकर अपने मत्रियो से कहा—'हाय, मेरे भाई
तथा मेरे प्रिय पुत्र इस प्रकार मारे गये ? अव क्या कहा जाय ? श्रेष्ठ योद्धाओ के लिए
भी अकाट्य नाग-पाशो को इन मानव-वीरो ने न जाने, माया से या शक्ति से, काट
दिया है । अब में विजय की आशा करूँ, तो भी वह मेरे लिए असभव है । उस राम को
युद्ध में जीतनेवाला अब ढूँढने पर भी मुझे नही मिलेगा । अवतक जो लका, बिना किसी
भय के शोभायमान थी, वह आज इन शक्तिशाली लोगो के कारण त्रस्त हो रही है । उस
राम के पराक्रम की सीमा ही नही है । इसलिए तुम लोग अव लका की रक्षा के लिए
आवश्यक सेना प्रतिदिन भेजते रहो ।' ऐसा आदेश देकर वह अत पुर में चला गया और
एकात में मन-ही-मन चिंता से पीड़ित रहने लगा ।
८९. इंद्रजीत का द्वितीय युद्ध
उस समय मेघनाद वहाँ पहुँचकर दशकंठ से कहने लगा—'हे दानवेन्द्र, मेरे रहते
हुए आपका इस प्रकार चिंतित होना उचित नही है । शक्ति से सपन्न मेरे वाणो का आघात
क्या ईश्वर भी सह सकता है ? लीजिए, मै अभी जाता हूँ । उस राम के भाई को अपने
उद्धत वाणो से अवश्य जर्जर करके उसे मार डालता हूँ और उस वानर-सेना को अपने
पराक्रम से पृथ्वी पर सुलाकर आता हूँ । हे देवताओ के शत्रु, मेरी प्रतिज्ञा सुन लीजिए ।
जैसे महाराज बलि की यज्ञ-भूमि में त्रिविक्रम के वढते हुए रूप को त्रस्त होकर इन्द्र,
विष्णु, यम, अग्नि, रुद्र, सूर्य, चन्द्र तथा साध्य देखते रहे, वैसे ही आज वे मेरे प्रताप को
देखते रह जायेंगे ।'
इतना कहने के पश्चात् वह राक्षस-राजकुमार वायुसम शीघ्रगामी रथ पर आरूढ़
हो युद्ध के लिए चल पड़ा । उसके चलते ही सव दिशाओ से एक साथ बड़े वेग से असख्य
रथ निकल पड़े । अनगिनत गज निकल पड़े, विपुल अश्व-सेना तथा पदाति-सेना निकल
पड़ी । उस चतुरंगिणी सेना पडरीको (श्वेत छत्रो) से प्रकाशित होनेवाले, पडरीक (वाघ)