सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 386

३५६ रंगनाथ रामायण
८४. देवांतक तथा त्रिशिर का अंगद पर आक्रमण करना
दानवेश्वर के पुत्र की यह दशा देखकर महोदर ने अपने भयंकर गज को आगे
बढ़ाया । देवांतक ने भी अपने अनुज की मृत्यु पर दुःखी तथा वालि-पुत्र के साहस पर क्रुद्ध
होकर अपना परिघ घुमाते हुए अंगद पर आक्रमण किया । रवि-मंडल-सदृश दीप्त होने-
वाले रथ को उद्धत गति से चलाते हुए, पृथ्वी को कँपाते हुए, त्रिशिर अग्नि के समान
भासमान होते हुए बड़े क्रोध के साथ अंगद से भिड़ गया । तब अंगद ने, शाखाओं से युक्त
एक विशाल वृक्ष को उखाड़कर उसे देवांतक पर फेंका, तो त्रिशिर ने उसे बीच में ही
काट डाला । तब, अंगद आकाश की ओर उछलकर क्रोध से पर्वतों तथा वृक्षों को उन पर
गिराने लगा, किन्तु देवांतक तथा त्रिशिर उन्हें ताबड़-तोड़ काटते गये । दोनों ने उस पर
एक साथ असंख्य तोमर चलाये । इससे संतुष्ट न होकर देवांतक ने भयंकर गर्जन करते
हुए अंगद पर बड़े वेग से अपना परिघ चलाया । त्रिशिर ने सिंह-गर्जन करते हुए शर-
वृष्टि की । महोदर ने अपने मत्त गज को उत्तेजित करके आगे बढ़ाया और तोमर चलाया।
इस प्रकार, जब तीनों एक साथ अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने लगे, तब अंगद अपना
शरीर झुकाकर वज्र के समान महोदर के हाथी से ऐसे टकराया कि वह हाथी चिंघाड़ते हुए
पर्वत-शृंग की भाँति नीचे गिर गया । उसकी आँखें बाहर निकल आईं और वह वहीं ढेर
हो गया । उसका कुंभ-स्थल फूट गया और उससे अनुपम मोती ऐसे बिखर गये, मानो
विजय-लक्ष्मी ने राघवेश्वर को प्राप्त करने की अभिलाषा से अपना अलंकरण करने के
लिए अपनी मंजूषा खोल दी हो । उसके पश्चात् वालि-पुत्र ने उसी हाथी का दाँत उखाड़-
कर उससे देवांतक पर प्रहार किया । उस प्रहार से, वह राक्षस, प्रबल वायु से झूलने-
वाले घने साल-वृक्ष की भाँति कंपित हो उठा और रक्त उगलने लगा । फिर भी, उसने
बड़े साहस के साथ अपना सारा बल एकत्र करके अंगद के पर्वतसानु-सदृश वक्ष स्थल पर
अपने परिघ से प्रहार किया । प्रहार से अंगद भी पृथ्वी की ओर झुक गया, किन्तु उसने
अपनी सारी शक्ति संचित करके अत्यधिक क्रोध से देवांतक पर आक्रमण किया । तब
त्रिशिर ने तीन प्रचण्ड शर उस वालि-पुत्र के ललाट पर छोड़े ।
८५. हनुमान् आदि वीरों के द्वारा त्रिशिर आदि राक्षसों का वध
इसी समय नील तथा हनुमान् अंगद की सहायता के लिए आ पहुँचे । नील ने
एक विशाल पर्वत को उठाकर दहाड़ते हुए त्रिशिर पर फेंका । तब, त्रिशिर ने वज्र-सम
एक बाण का संधान करके उससे उस पर्वत को काट दिया । पवन-पुत्र ने देवांतक को
बड़े साहस के साथ एक विशाल परिघ को घुमाते हुए, प्रचंड विक्रम प्रदर्शित करते हुए
सामने आते देखकर अपनी मुष्टि से उस पर प्रहार किया । इस प्रहार से उसके दाँत टूट गये,
पुतलियाँ घूम गईं, और वह मुँह खोले पृथ्वी पर लुढ़क गया । देवांतक का यह
पतन देखकर स्वर्ग-लोक के देवता हर्ष-ध्वनि करने लगे ।
इस पर क्रुद्ध होकर त्रिशिर ने अशनि-वेग से एक तीव्र बाण नील पर चलाया ।
उसी समय महोदर भी एक हाथी पर आरूढ़ हो गर्जन करते हुए आ पहुँचा और उस पर
ऐसी शर-वर्षा कर दी, जैसे घनघोर मेघ कुल-पर्वत पर वर्षा करता है। उनके अस्त्र-समूह