रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोनेवाली बात जान ली हो । जो कोई कपि उसका नाश करने के निमित्त किसी पर्वत
को उखाडने की चेष्टा करता, उसके पूर्व ही वह अत्यधिक क्रोध से उसका नाश कर देता था ।
जो कोई कपि उसका वध करने के लिए कोई वृक्ष उखाडने का प्रयत्न करता, उसके
पहले ही वह उसका वध कर देता । इतना ही नही, वह अपने अश्वो को वानरो के समूह
पर चलाकर कितने ही वानरो को कुचल दिया, जिससे उनकी आँतें, और मांस निकल पडे ।
वह उन्हें एक दूसरे से ऐसा टकरा देता था कि उनका वक्ष फट जाता और हड्डियाँ चूर-
चूर हो जाती । इस प्रकार, उसने भयकर क्रोध से प्रलय-कालानल की भाँति सारे युद्ध-क्षेत्र
में व्याप्त होकर वानर-सेना-रूपी वन को कई वार नष्ट कर दिया । वानर उसके शौर्य
तथा उसकी शक्ति का सामना नही कर सकने के कारण चकित तथा व्याकुल-से हो रहे ।
सभी देवता विचलित हुए । अत्यधिक त्रस्त वानर-सेना को क्लेश पहुँचानेवाले नरातक
को देखकर कपिराज का पुत्र अगद क्रोध में आकर वानर-सेना से यो बाहर निकल पडा,
जैसे बादलो के समूह को चीरकर सूर्य बाहर निकलता है ।
८३. अंगद तथा नरांतक का द्वंद्व-युद्ध
उसने नरातक को देखकर कहा—'हे नरातक, इतनी क्रूरता के साथ तुम इन वानरो
का सहार क्यो कर रहे हो ? ऐसा करने से क्या तुम शूर बन जाओगे ? यदि सचमुच
तुम शूर हो, तो मेरे साथ युद्ध करो।' तब नरातक ने हँसकर कहा—'हे वनचर, मेरे
सामने तुम्हारी हस्ती ही क्या है ? मैने सभी दिक्पालो का दर्प-दलन किया है । समस्त
देवताओ को पीडित किया है । मेरे जैसे पराक्रमी का सामना, क्या, तुम कर सकोगे ?
मैं तुम्हारी दोनो जांघो को चीरकर फेंक दूँगा । तुम अभी नादान दुधमुँहे बच्चे हो,
किन्तु प्रतापी योद्धाओ के साथ युद्ध करना चाहते हो । अभी तुम मेरी शक्ति देख लोगे ।'
तब अगद ने हँसकर कहा—'हे राक्षस, दशकंठ का दर्प चूर करने के पश्चात् खर के पुत्र
का सहार करके जब में जाने लगा, तब क्या, तुमने मुझे नही देखा था ?'
इतना कहते ही ब्रह राक्षस काल-सर्प की भाँति फुफकारते हुए अगद के निकट आ
पहुँचा और अत्यधिक स्फुलिंगो को विकीर्ण करनेवाली अपनी शक्ति से अगद पर प्रहार
किया । गरुड के मुँह का स्पर्श होते ही गिरनेवाले काले नाग की भाँति वह शक्ति अगद
के वज्र-सम वक्ष का स्पर्श करते ही खड-खड हो गई । अपने वज्रायुध से पर्वतराज को
दबानेवाले इन्द्र की भाँति वालि-पुत्र ने अपनी हथेली से उसके घोड़े पर ऐसा दुर्भर प्रहार
किया कि उसका मस्तक फूट गया और वह अश्व मुँह खोले, जीभ बाहर किये, पृथ्वी पर
गिर पड़ा और छटपटाकर मर गया । अश्व के गिरते ही नरातक क्रोधानल से आँखें लाल
किये हुए अपनी मुष्टि से अगद के सिर पर प्रहार किया और उसे मूर्च्छित कर दिया,
किन्तु अगद शीघ्र ही सचेत हो गया और चिल्लाया कि रे नरातक, तुम्हारा ऐसा साहस ?
फिर, उसने वज्र-सम अपनी मुष्टि से श्रेष्ठ पर्वत के समान दीखनेवाले उसके वक्ष पर प्रहार
किया । चोट लगते ही वह रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिर पडा और उसका कपाल
फूटकर चूर-चूर हो गया । इस प्रकार, नरातक ने उस घोर रण-क्षेत्र में गिरकर अपने
प्राण छोड़ दिये । आकाश से देवता और पृथ्वी पर कपि हर्ष की ध्वनि करने लगे ।