रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी-सी आँखोवाले, पुडरीक (श्वेत कमल) की कातिसम शरीरवाले, पुडरीक के (आग्नेय
दिशा का दिग्गज) के औन्नत्य से विलसित होनेवाले, पुडरीक (बाघ} के समान भयकर
लगनेवाले और पुडरीक (बाघ) की शक्ति से सपन्न वीरो से पूर्ण थी । सिंहनादो, दहाडो,
हुकारो, गर्वोक्तियो, रथ की नेमियो तथा निसानो की भयकर ध्वनि चारो ओर व्याप्त
हो रही थी । धवल छत्र से युक्त वह राक्षस-कुमार सुधाकर से युक्त आकाश के समान
दीख रहा था । सुदर कामिनियाँ अपने कमल-नेत्रो की दीप्ति को चारो ओर विकीर्ण
करती हुई चामर डुला रही थी । ऐसी रण-सज्जा से युक्त हो, अपने आभूषणो की प्रभा
से दीप्त होते हुए, सहज वैभव से उज्ज्वल इद्रजीत रण-स्थल के मध्य आकर खडा हुआ ।
उसके पश्चात् उसने रक्त-वर्ण के वस्त्र, चदन तथा पुष्प-मालाएँ धारण करके अग्निदेव का
प्रतिष्ठापन किया, शर तथा तोमरो से उसकी परिधि बनाई और लोहे के स्रुक् तथा स्रुवा
एकत्र किये । फिर, राक्षसेश्वर के पुत्र ने अथर्ववेद के उच्चारण के साथ घी, खील तथा
ताल-समिधाओ का हवन किया । होम की समाप्ति के पहले, उसने कृष्ण-छाग (काला
वकरा) के रक्त की पूर्णाहुति दी । तब अग्निदेव ने स्वय प्रकट होकर हव्य ग्रहण किया ।
उनकी कृपा से मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र, रथ, धनुष तथा कवच प्राप्त किये ।
उसके पश्चात् वह राक्षस अपने सिंहनाद से दिशाओ को कँपाते हुए अपने रथ,
अश्व, केतु तथा सारथियो के साथ, सूर्य, चद्र तथा नक्षत्रो को अपदस्थ करते हुए शीघ्रगति
से आकाश-वीथी में जाकर छिप गया । फिर, अपनी सेना से अपने पराक्रम के अनुरूप वचन
कहने लगा--'तुम बिना विचलित हुए युद्ध करते जाओ । मै आकाश से घोर युद्ध करते
हुए राम और लक्ष्मण का शीघ्र ही सहार कर दूँगा ।'
इन उत्साहवर्द्धक वचनो को सुनकर दानव अत्यत हर्षित हुए और सेना के साथ
वानरो पर टूट पडे तथा विविध रीतियो से उनसे युद्ध करने लगे । उसी समय इद्रजीत
अपनी छाया तक प्रकट किये बिना आकाश से दिव्य बाण चलाने लगा । तब वानर उठकर
पर्वतो को उठा-उठाकर उस राक्षस की ओर फेंकने लगे । किन्तु इद्रजीत के शरो ने उन्हें
तोडकर उन वानरो की छाती को विदीर्ण कर उन्हें पृथ्वी पर गिरा दिया । इसके पश्चात्
उसने एक घोर अस्त्र चलाकर पाँच वानरो को तथा नौ अस्त्रो से सात वानरो को नीचे
गिरा दिया । तब क्रुद्ध होकर कपि-वीरो ने पर्वतो तथा वृक्षो को उठाकर उस इद्रजीत पर
फेंका । किन्तु, उसने वडी निपुणता से उन्हें अपने तीव्र बाणो से काटकर गधमादन पर
अठारह बाण चलाकर उसका मद चूर-चूर कर दिया । उसके पश्चात् उसने नौ बाणो से
नल के नाम-रूप मिटा दिये, सात बाणो से मैन्द को झुका दिया, पाँच बाणो से गज का
सहार किया, दस बाणो से जाबवान् का शरीर चीर डाला, सौ बाणो से हनुमान् को
अत्यधिक दुख पहुँचाया, तीन बाण गवाक्ष पर चलाये, तेरह बाणो से हरिरोम के प्राण हर
लिये, छह बाणो से रभ को गिरा दिया, दस बाणो से सूर्यप्रभ को परास्त किया, तेरह
बाणो से पनस के अगो को छेद डाला, आठ क्रूर बाणो से कुमुद को तथा पैतीस बाणो से
नील को छिन्न-भिन्न दिया । तत्पश्चात् बिना विश्राम लिये ही उसने कई बाणो से अगद को,
तीन पैने बाणो से सूर्य-नदन (सुग्रीव) को, पाँच बाणो से इन्द्रजाल को, दो शरो से गिरि-