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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 508 में से

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पृष्ठ 382

३५२ रंगनाथ रामायण
देवता इस भय से पीड़ित होकर सोते तक नहीं थे कि तुम नींद से जगकर रौद्र रूप
धारण करके क्रूरता के साथ उनका सर्वनाश कर दोगे। तुम युद्ध में गिर गये, अब, भला, देवता
मेरी परवाह क्यों करने लगे ? सारे वंश की रक्षा करने के उद्देश्य से भाई विभीषण ने,
हठ करके बार-बार मुझे हित-वचन कहे, किन्तु मैंने उसकी बातें नहीं सुनीं और पद-
प्रहार करके उसे नगर से निर्वासित कर दिया। क्या, वह पाप मुझे यों ही छोड़ देगा ?
तुम तथा अन्य बुद्धिमान् लोगों ने सतत जो नीतिपूर्ण वचन कहे, उन्हें मैंने नहीं माना,
और तुम्हें खो बैठा । अब जिस विजय की मैंने आशा की थी, वह मुझे क्यों मिलेगी ?
युद्ध-क्षेत्र में तुम मेरे दाहिने कंधे की तरह रहे, किन्तु आज युद्ध में तुम अपने महान् बाहु-
बल को खोकर नष्ट हो गये । अब मेरा सहारा कौन होगा ?'
इस प्रकार, रावण बार-बार कुंभकर्ण का स्मरण करते हुए दीर्घ निश्वास छोड़ते
हुए, परिताप-रूपी वडवानल, उमड़कर टपकनेवाली लार-रूपी फेन, अजस्र अश्रु-रूपी बाढ़,
अनंत दुःख-रूपी तरंगें, रुदन-रूपी घोष, भय-रूपी मचलने से युक्त शोक-समुद्र में डूबकर
व्याकुल पड़ा रहा । तब रावण को देखकर त्रिशिर उसे धैर्य देते हुए बोला--'हे देव, आप
साधारण लोगों की भाँति अपना धैर्य खोकर ऐसे क्यों शोक करते हैं ? ब्रह्मा से प्राप्त वर की
महान् शक्ति रखते हुए, सतत मंत्र-पूत अस्त्र तथा वज्र-कवच से संपन्न होते हुए, श्रेष्ठतम
गतिशील उज्ज्वल रथ के रहते हुए, आप क्यों ऐसे शोक करते हैं ? मेरी ओर देखिए।
हे अमरों के शत्रु, कौन है जो आपका सामना कर सके ? आप शीघ्र चलकर अपने
अनुपम पराक्रम से राघव का संहार कीजिए। अब शोक तजिए । मैं अभी जाता हूँ और
घोर युद्ध-क्षेत्र में अपने अनुपम पराक्रम एवं प्रताप से वानरों को ऐसे काट डालता हूँ, जैसे
गरुड़ साँपों को काट डालता है। जैसे इन्द्र ने वृत्रासुर का संहार किया था, और जैसे
शिव ने अंधकासुर का नाश किया था, वैसे ही मैं भी युद्ध में राम का संहार करूंगा । मुझे
आज्ञा दीजिए, मैं अभी जाता हूँ।'
तब अतिकाय ने रावण को देखकर कहा--'हे दानवेन्द्र, आप इतना शोक क्यों
करते हैं ? मैं दैत्य-सेना के साथ जाऊँगा, मुझे आज्ञा दीजिए । जिस प्रकार दावानल
काननों को जलाता है, वैसे ही, मैं अपने असह्य बाणों का प्रहार करके कपियों के साथ,
राम-लक्ष्मण का वध करूंगा।' तब नरांतक तथा महाबली देवांतक दोनों ने मिलकर कहा-
'हम इसी क्षण जाकर राम-लक्ष्मण तथा वानरों का वध करते हैं।' इनकी बातें सुनकर
दैत्याधीश ने शोक छोड़ दिया और अपने पुत्रों के साथ मोदमग्न हो रहने लगा, जैसे
देवताओं के साथ इन्द्र रहता है ।
इसके पश्चात् रावण ने बड़े हर्ष से अपने चारों पुत्रों को आदेश दिया--'राम-
लक्ष्मण को तथा वानर-सेना को अपने भयंकर अस्त्रों की सहायता से मारकर आओ ।'
फिर, उसने अपने भाई महोदर तथा महापार्श्व को भी युद्ध करने के लिए भेजा ।
८२. अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसों की युद्ध-यात्रा
वे छहों राक्षस ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले गर्जन करते हुए, इस प्रकार युद्ध
के लिए निकल पड़े, मानो (काम-क्रोध आदि) अरि-षड्वर्ग यह सोचकर राम से भिड़ने के लिए