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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 387

स अत्यन्त पीडित होकर नील मूर्च्छित हो गया, किन्तु शीघ्र ही सँभलकर आकाश की ओर
उछला और तरु-सहित एक विशाल पर्वत को उठाकर उसे महोदर पर दे मारा। उस पर्वत के
प्रहार से महोदर का सिर फूट गया और वह अपने अस्त्रो के साथ नष्ट हो गया। महोदर
को पृथ्वी पर गिरते देखकर त्रिशिर ने प्रचण्ड पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, साहस खोये
बिना पवन-पुत्र पर असंख्य बाणो की वर्षा की। तब हनुमान् ने शीघ्र ही एक पर्वत-शृंग
को उखाडकर उसे उस त्रिशिर पर फेंका। किन्तु त्रिशिर ने उसे बीच में ही ऐसे चूर-चूर
कर दिया कि देवता भी देखकर चकित-से रह गये। तब हनुमान् सहज ही उसके रथ पर
कूद गया और उसके अश्वो को ऐसा चीर डाला, जैसे सिंह क्रुद्ध होकर हाथियो को चीर
डालता है। तब, क्रोधोन्मत्त हो त्रिशिर ने उस पर शक्ति का प्रयोग किया। प्रचण्ड ज्वालाओ
से युक्त हो उस शक्ति को आते देखकर हनुमान् ने उसे पकडकर तोड डाला। शक्ति को
तोडने के हनुमान् के बाहु-बल का विचार करके त्रिशिर ने एक पैनी धारवाले खड्ग को
लेकर बडे वेग से हनुमान् पर आक्रमण करके उस खड्ग से हनुमान् के वक्ष पर प्रहार
किया। तुरत हनुमान् ने अपनी हथेली से उस राक्षस के वक्ष पर आघात किया। तब, वह
राक्षस अपने खड्ग को छोडकर पृथ्वी पर मूर्च्छित होकर गिर पडा। तब, नीचे गिरे हुए
खड्ग को हाथ में उठाकर अनिल-कुमार ने पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए सिंहनाद किया।
किंतु इतने में त्रिशिर सँभल गया और अपनी मुष्टि से हनुमान् के वक्ष पर प्रहार किया।
तब हनुमान् की कनपटियाँ क्रोध से फूल उठी। उसने बडे दर्प के साथ खड्ग को चमकाते
हुए उस राक्षस के तीनो सिर ऐसे काट डाले, जैसे सुरेन्द्र ने विश्वरूप के सिर काट डाले थे,
अथवा हनुमान् ने त्रिशिर के कर्म-बधनो को ही काट डाला हो। तब पृथ्वी, आकाश,
तथा दिशाओ को कँपाते हुए त्रिशिर पृथ्वी पर गिर पडा।
उसके गिरते ही महापार्श्व अत्यधिक क्रोध से तेवर बदलते हुए, दिग्गज के समान
भयकर, कनक-चक्र एव मणि-प्रभा से विलसित, यम के भीषण दड के सदृश दीप्त अरुण-
पुष्प एव अरुण-चदन से अलकृत हो उदय-सूर्य की भाँति उज्ज्वल गदा-दड को धारण किये हुए
बडी शीघ्र गति से हनुमान् पर आक्रमण करने चला। इतने में ऋषभ ने एक विशाल
पर्वत को उठाकर उस राक्षस पर फेंका। किन्तु, उस राक्षस ने अपनी गदा से उस पर्वत
को चूर-चूर कर दिया। फिर, उसने बडे दर्प से युक्त हो तेजी से अपनी गदा को घुमाकर
ऋषभ के वक्ष पर प्रहार किया। गदा के प्रहार के कारण ऋषभ तुरत मूर्च्छित हो गया,
किन्तु वह शीघ्र ही सँभल गया और अपनी मुष्टि से महापार्श्व के वक्ष पर भीषण प्रहार किया।
चोट लगते ही वह राक्षस अपना गदा-दड छोडकर, शक्तिहीन हो पृथ्वी पर गिरने लगा।
तुरत ऋषभ ने उस गदा-दण्ड को लेकर भयकर गर्जन करते हुए उससे उस राक्षस
पर प्रहार किया। वज्र के गिरने से जैसे गिरि-शृग गिर जाता है, वैसे ही उस राक्षस
का सिर चूर-चूर हो गया और वह भयकर ध्वनि के साथ पृथ्वी पर गिर पडा। पवन
से डरनेवाले पीले पत्तो की भाँति दैत्य-सैनिक चक्कर काटते हुए तितर-बितर हो गये।
८६. अतिकाय का युद्ध
इस प्रकार, उन सब राक्षसो को गिरे हुए देखकर अतिकाय ने ऐसा गर्जन किया,