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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 508 में से

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पृष्ठ 395

युद्धकांड ३६५
उसी समय सूर्यास्त हुआ, मानो राघव की दुर्दशा के कारण मन-ही-मन दुखी हो,
उन्हें उस दशा में देख नहीं सकने के कारण सूर्य ने आँखें वद कर ली हो । वानरो के
मुख-कमल मुरझा गये । अंधकार चारो ओर ऐसा व्याप्त हो गया, मानो बता रहा हो कि
वानरो के द्वारा लका का दहन होते समय, धुआँ इसी प्रकार व्याप्त होगा । वह ब्रह्मास्त्र
का सधान करने के लिए आवश्यक मत्र-पठन का उचित अवसर नहीं था, इसलिए विभीषण ने
पृथ्वी पर गिरे हुए सुग्रीव आदि योद्धाओ को देखकर कहा--'हे वानर-वीरो, रावण के
पुत्र ने ब्रह्मा के वर की शक्ति से अस्त्र चलाया था, और राघव ने ब्रह्मास्त्र की शक्ति
का आदर करने के विचार से उसे सह लिया है। इतना ही है और कुछ नही ।' ब्रह्मा के वर
से आरक्षित होने के कारण वायु-पुत्र, इन्द्रजीत के दिव्य-अस्त्रो के प्रहार से मरा नहीं था। इसलिए
उसने कहा--'अब हम देखें कि वाणो से आहत हो युद्ध-भूमि में गिरे हुए वीरो में से
कितने अभी जीवित हैं ।' यो कहकर वे दोनो जलती हुई मशालें लेकर उस अधकार में
युद्ध-भूमि में घूमने लगे । तब उस युद्ध-भूमि में लगातार नृत्य करनेवाले घड, छककर मास
खानेवाले भूत, भयंकर रूप से गरजनेवाले बैताल, वहनेवाले रक्त का पान करनेवाली
डाकिनियाँ मास-पेशियो को निगलनेवाले गृद्ध, उच्च स्वर में रव करनेवाले शृगाल,
रक्त उगलनेवाले भालू, पृथ्वी पर लोटने, छटपटाने तथा दाँत पीसनेवाले वानर, शक्ति-
हीन होकर गिरे हुए, रूप-विकृत, रक्त में भीगे हुए तथा धूलि से सने हुए कपि, एक ही
बाण के आघात से एक साथ एक ही स्थान पर सटकर गिरे हुए कपि, खड-खड होकर गिरे हुए
पर्वत, छिन्न-भिन्न होकर गिरे हुए वृक्ष, खडित होकर फैले हुए राक्षसो के शूल, असख्य खडों
में टूटकर गिरी हुई गदाएँ, मरकर गिरे हुए असख्य हाथी आदि जहाँ-तहाँ दिखाई पडने
लगे । इस दृश्य को देखकर विभीषण तथा हनुमान्, दोनो विस्मित तथा दुखी हुए, किन्तु
तुरन्त उन्होने निश्चय किया कि अब हमें भविष्य के कार्य के सबध में जाबवान् से परामर्श
लेना चाहिए । वही जानता है कि अब क्या करना चाहिए । हम उसे पहले ढूँढे और
उसके कथन के अनुसार कार्य करें ।
यो सोचकर वे युद्ध-भूमि में जाबवान् को ढूंढते हुए गये और निदान एक विशाल
शर-शय्या पर पडे हुए उसे देखा । तब विभीषण ने कातर-भाव से जाबवान् को
देखकर कहा--'हे ऋक्षराज, तुम अभी जीवित हो ? क्या, तुम वोल सकते हो ? तुम
हमें पहचानते हो ?' राक्षस के शर-प्रहार से शक्तिहीन होने के कारण जाबवान् ने क्षीण
स्वर में कहा--'हे विभीषण, तुम्हारे कठ-स्वर को पहचानकर में तुम से वात कर रहा हूँ।
वैसे तो मेरी आँखो में वाण चुभ गये है । अत, मेरी आँखें देख नही पाती। क्या पवन-
पुत्र जीवित है ? उसके जीवित रहने की वार्ता सुनकर मेरे कानो को आनंद पहुँचाओ ।'
यह सुनकर विभीषण ने अत्यत आश्चर्य-चकित होकर जाबवान् से पूछा--'हे ऋक्षराज,
यह कैसे आश्चर्य की बात है कि तुम महात्मा रामचन्द्र के वारे में नहीं पूछते, लक्ष्मण
के सबध में नही पूछते, सूर्य-पुत्र के सबध में जानने की इच्छा प्रकट नही करते, और अगद
के वारे में भी पूछना नही चाहते, किन्तु पवन-पुत्र के सबध में ही पहले जानना चाहते हो ?
यह तुम्हारा कैसा विचार है ?' तब जाबवान् ने कहा--'हे विभीषण, यदि अकेले