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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 508 में से

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पृष्ठ 398

३६८ रंगनाथ रामायणी
९२. वानरों का लंका जलाना
इस बात को सुनकर सभी वानर सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे । शनै. शनै
सूर्यास्त हुआ और अधकार क्रमश घना होता हुआ चारो ओर व्याप्त होने लगा । तब
कपि-वीरो ने अत्यधिक रोष से भरे हुए बडे साहस के साथ लूकाओ को हाथ में लिये
हुए बडे वेग से उछलते-कूदते लका को घेर लिया । द्वाररक्षक उन्हें देख भयभीत होकर
भाग गये । तब वानरो ने लका में प्रवेश किया और लका को जलाने लगे । अग्नि क्रमश
प्रचंड होकर दिशाओ तथा आकाश में व्याप्त हो गई । वह प्रचंड अग्नि ऐसी लग रही थी
कि रावण की लंकापुरी को जलाने के लिए अब राम की क्रोधाग्नि की कोई आवश्यकता
नही, यही अग्नि उसको जलाने के लिए पर्याप्त होगी ।
वडवानल जैसे अपने धुएँ के साथ समुद्र-भर में व्याप्त होता है, वैसे ही यह अग्नि
विपुल धुएँ के साथ आकाश तक पहुँच गई । इससे प्रासादो की पंक्तियाँ अपनी मणि-
राजियो को विखेरती हुई भस्मसात् हो गई, ऊँचे-ऊँचे गोपुर पृथ्वी को कँपाते हुए जलकर
पृथ्वी पर गिर पड़े और चूर-चूर हो गये । वडी-वडी अट्टालिकाएँ आश्चर्यजनक रीति से
जलकर गिरने लगी और अग्नि-ज्वालाएँ लपलपाती हुई आकाश की ओर बढने लगी ।
महान् स्वर्ण-मडप, तथा रत्न-निर्मित गृह-पंक्तियाँ जलकर राख हो गई । आभरणो से भरे
भंडार-घर जैसे थे, वैसे ही भस्म हो गये । विविध अमूल्य वस्त्र, सुगंध-द्रव्य, कालीनें, मोती,
तथा मरकत, अगर-चंदन, कर्पूर, कस्तूरी आदि वस्तुएँ, विविध धान्यो की अक्षय राशियाँ
तथा अन्य मूल्यवान् वस्तुएँ, हाथियो तथा घोडो की झूलें, स्थान-स्थान पर रखे हुए कवच-
समूह आदि जलकर भस्म हो गये, जिससे राक्षसो के हृदय में पीड़ा उत्पन्न होने लगी ।
उस समय कुछ राक्षस सुवर्ण-कवच पहने हुए आयुधो से युक्त हो दुर्वार गति से वानरो
का सहार करने का निश्चय करके घरो से निकल रहे थे, कुछ राक्षस विपुल रति-क्रीडा
के आवेग से मस्त हो कामिनियो के संग-सुख की घडियाँ बिता रहे थे, शय्या को
छोडने की अनिच्छा से कुछ लोग ऊँघ रहे थे, कुछ लोग अभी सुख की निद्रा में
निमग्न थे, कुछ राक्षस अपने बच्चो को लेकर भाग रहे थे, कुछ भौंचक होकर चारो
दिशाओ में दौड़ रहे थे, कुछ रुदन कर रहे थे, कुछ अपनी संपत्ति को घर के बाहर
निकालकर उसे छोड़कर जाने की इच्छा न होने से, वही चकित हो यह दृश्य देख रहे थे,
धुएँ के कारण मार्ग न पाकर कुछ लोग जँभाइयाँ लेते हुए खडे थे, कुछ राक्षस अग्नि को
बुझाने के लिए घर की छतो पर चढ गये, किन्तु वहाँ से नीचे उतरने में अपने को
असमर्थ पा रहे थे, और जहाँ-तहाँ कुछ लोग इकट्ठे होकर घबराहट मे यह दृश्य देखकर दुखी
हो रहे थे । अग्नि प्रलयानल के समान, अपनी लपलपाती शिखाओ को व्याप्त करती हुई,
कई भवनो तथा कई राक्षसो को भस्मसात् करने लगी । रत्न-नूपुरो का मधुर शिंजन,
वीणा की मृदु झकार, सुदर तथा मीठे वचनो की ध्वनि, अद्वितीय नृत्य-गीतो की ध्वनि,
श्रुति-मधुर केका-रव, हंसो का कल-कूजन तथा सुदर शुक-शारिकाओ की मधुर ध्वनि आदि
मिट्टी में मिल गईं । चंद्रिका मे भी धवल काति से युक्त तथा पद्मराग-मणियो की
कांति से उज्ज्वल, उम लंका के सभी हर्म्य, जलने की ध्वनि, चारो ओर व्याप्त होनेवाले धुएँ