रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसके तुरंत बाद ही उसने तीन ऐसे शक्ति-सम्पन्न बाण चलाय, मानो कह रहा हो
कि भले ही त्रिनेत्र शिव भी रक्षा करें, तो भी तुम्हारा सुख छीन लूँगा । फिर, तुरत उसने
पाँच बाण चलाये, मानो कह रहा हो कि तुम्हारे पंच प्राण अवश्य खींच लूँगा । उसके
पश्चात् उसने अपने बाहु-बल के गर्व से फलते हुए वड वेग स सात वाण चलाय, मानो
कह रहा हो कि भले ही तुम सप्त समुद्रो में प्रवेश करके उन्हें पार कर जाओ, मै तुम्हें
अवश्य ही मार डालूँगा । किन्तु, लक्ष्मण ने शीघ्र ही उन सभी वाणो को खड-खंड करके
सिंह-गर्जन किया । उसके पश्चात् उन्होने आग्नेय अस्त्र चलाया, तो अतिकाय ने सौरास्त्र
चलाया । दोनो शरो ने आपस में टकराकर युद्ध किया और दोनो चूर-चूर होकर नीचे
गिर गये। फिर, राक्षस ने ऐषिक बाण चलाया, तो लक्ष्मण काँप उठे। फिर, उन्होने ऐन्द्र
बाण से उसे काट डाला । यह देखकर दैत्य ने याम्यास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने वायव्यास्त्र
चलाकर उसे काट डाला । इतना ही नही, उन्होने कई और बाण भी उस राक्षस पर
चलाये, किन्तु वे सभी बाण अतिकाय का स्पर्श करते ही टूटकर पृथ्वी पर गिर गये ।
लक्ष्मण यह देखकर सोचने लगे कि क्या कारण है कि कोई भी शर इसके शरीर में गडना
नही ? उनका इस प्रकार व्याकुल होते समय अनिल ने आकर कहा—'यह अनुपम रहस्य
तुम्हें बताऊँगा । हे लक्ष्मण, इसने ब्रह्मा से वज्र-कवच प्राप्त किया है । अत, कोई भी
शर इसके शरीर में नही गडता । तुम इस पर ब्रह्मास्त्र चलाकर इसके टुकड़े-टुकड़े
कर डालो ।'
तब बडे हर्ष से लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र को मन्त्र-पूत करके धनुष पर चढाया और उसे
रावण के पुत्र पर चलाया । तुरत समस्त ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए, इन्द्र को भयभीत करते
तथा देवताओ को कँपाते हुए, दिशाओ को हिलाते हुए, समुद्रो को आलोड़ित करते हुए,
पर्वतो को झकझोरते हुए, सूर्य-चन्द्र को पथ-भ्रष्ट करते हुए, नक्षत्रो को गिराते हुए, वह
ब्रह्मास्त्र, रत्न-समूह की भाँति उज्ज्वल कांति से युक्त हो, प्रलय-काल की अग्नि के समान
सभी लोको में व्याप्त होकर जलते हुए, पवन के वेग से यम-डड के समान, अतिकाय की
ओर आने लगा । तब अतिकाय ने उस पर तीव्र शर चलाये, किन्तु उस ब्रह्मास्त्र को निष्फल
नही कर सका। फिर, राक्षस ने शक्ति चलाई, किन्तु ब्रह्मास्त्र ने उसकी भी उपेक्षा कर दी।
फिर, अतिकाय ने उस पर शूल चलाया, किन्तु ब्रह्मास्त्र ने उसकी भी अवहेलना कर दी।
उसके पश्चात् राक्षस ने गदा चलाई । उसे व्यर्थ होते देखकर, उसने खड्ग चलाया ।
किन्तु, उसकी भी परवाह किये बिना उसको अपनी ओर आते देखकर अतिकाय ने परशु
चलाया । किन्तु, परशु की भी उपेक्षा करके उसे आते देखकर राक्षस ने भाला चलाया ।
इस पर भी ब्रह्मास्त्र की गति नही रुकी, तो उसने अपनी कमर से वरछी निकालकर उससे
प्रहार किया ।
८८ अतिकाय का वध
उसपर भी ब्रह्मास्त्र अप्रतिहत गति से अतिकाय की ओर बढता रहा । तब अतिकाय न
उस पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया। पर, उस अस्त्र ने मुकुट तथा कुंडलो ने अलंकृत
उस राक्षस का सिर काट डाला । वज्र के आघात म रोहणाद्रि का शृंग जैमे गिर गया
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