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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 508 में से

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पृष्ठ 389

वह कौन है, उसे दिखाओ । उसके सिवाय और किसी पर मै अपना अतुल शक्ति-
सम्पन्न अस्त्र नही चलाऊँगा । देव, दानव, यक्ष तथा अन्य देवताओ से भी अधिक शक्तिशालि
रावण को युद्ध में जीतने का सकल्प करके, इस प्रकार लका में आनेवाला वीर
कौन है, उसे दिखाओ । उसके सिवाय और किसी पर में अपने अतुलित
अस्त्र नही चलाऊँगा ।'
इस प्रकार गर्वोक्तियो को कहनेवाले उस दानवेश्वर के पुत्र पर कपि-वीर क्रोध
से वृक्षो तथा पर्वतो की अविरल वर्षा करने लगे । तब अतिकाय ने अविरल बाण-वर्षा से
उन सब को बीच में ही काट डाला । उसके पश्चात् तीन गुरुतर अस्त्रो से कुमुद को,
पाँच भयंकर शरो से द्विविद को, सात अद्वितीय बाणो से मैन्द को, नौ शरो से गभ को,
आठ घोर बाणो से गज को, चार तीव्र बाणो से गवाक्ष को, आठ बाणो से गवय को,
दस बाणो से ज्योतिर्मुख को, पन्द्रह बाणो से शतवली को और पच्चीस बाणो से नील को,
पृथ्वी पर गिराकर मूच्छित कर दिया । सभी देवता आकाश से चकित होकर यह दृश्य
देखने लगे । तब प्रचड क्रोध से अतिकाय ने सभी वानरो को ऐसे भगाया, जैसे मृगराज
मृगो को भगाता है । वह मन-ही-मन सोचने लगा कि विरोधी होते हुए भी यदि में
परमेश्वर राम की भक्ति करूँ, तो मै अवश्य मुक्ति प्राप्त करूँगा । यो सोचकर वह राम
की ओर बढने लगा । जो वानर उसका मार्ग नही रोकता, वह उस पर हाथ नही उठाता।
इस प्रकार, वह आगे बढते हुए राम के निकट पहुँचा और उस निगमवेद्य राम से
हँसते हुए बोला—'हे राम, तुम इस रणभूमि में अपनी शूरता मुझे दिखाओ । तुम अनन्त हो ।
कोई भी यह नही जानता कि तुम्हारी शक्ति कितनी है । मेरे पिता के कारण
तुमने मनुष्य का जन्म लिया है । उन्ही के कारण तुम पृथ्वी के राजा हुए हो । मेरा सामना
करने के लिए, अमरेन्द्र, यम, वरुण आदि देवताओ के समूह से तुम कोई नही हो । अपना
अत कर डालने के लिए जो कोई शूर मुझसे भिडे, उससे मै लडूंगा ही । मै तुम्हारा
पराक्रम भली भाँति जानता हूँ । तुम्हें मान-अपमान का विचार ही नही है । तुम कदाचित्
मुझे नही जानते । भला गुणहीनो में सत्त्वगुण कहाँ रहेगा ? तुम किस जाति के हो,
मै कैसे कहूँ ? क्या, तुम राजकुल के आचारो का पालन करनेवाले हो ? पुण्यात्मा तपस्वियो
के मानस-काननो में भले ही तुम निवास करो । मेरे साथ लडने की क्षमता तुम नही
रखते । वेदाद्रि-गुफाओ में तुम जाकर वास करो, युद्ध के लिए तुम मेरे जोड के नही हो।
सनक आदि मुनि तथा योगियो के मानस-रूपी समुद्रो में भले ही तुम निवास करो, मेरे
साथ युद्ध करने योग्य नही हो । गेरुए रग के वस्त्र धारण करके, पाप-रहित तथा ससार
के दुखो से मुक्त, कद-मूल-फल जैसे नीरस आहार करते हुए, विविध आचार-निष्ठाओ के
कारण क्लान्त, घोर काननो में विचरण करनेवालो के साथ तुम जाकर रहो । तुममें
रण-कौशल नही है । तुम्हारी शक्ति की कल्पना मैने कर ली है । इस ससार में तुम
अकेले थे, ऐसे तुम्हें यह कपि-सेना मिल गई है । आश्रयहीन होकर घूमनेवाले तुम्हें
अब सूर्य-पुत्र एक मात्र आधार मिल गया है । हाय, कहीं भी, किसी का जो गुरु नही
बना, ऐसा विश्वामित्र तुम्हारा गुरु हुआ । तुम्हारा अपना कोई देश नही था, इसलिए