रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ रगनाथ रामायण
हनुमान् अपने प्राणो से जीवित है, तो सभी वानर जीवित हो जायेंगे । यदि वह जीवित
नही है, तो जीवित रहकर भी, वानर जीवित नही रह पायेंगे ।'
इन बातो को सुनकर वायु-पुत्र को अधिक हर्ष हुआ । उसने अपना नाम लेकर
जाववान् के चरणो में प्रणाम किया । ऋक्षराज अत्यत हर्षित हुआ और अपने को पुनर्जीवित-सा
अनुभव करके कहा—'हे वायुनदन, अब इन वानरो के लिए तुम्हारे सिवाय और
कौन आश्रय है, इसलिए तुम शीघ्र ही समुद्र को पार करके जाओ । हिमाचल को पार
करके हेमकूट,- ऋषभ-पर्वत, मेरु-पर्वत, रजताद्रि तथा श्वेताचल से आगे निकल जाओ ।
वहाँ (तुम्हें) लवण-समुद्र मिलेगा । उसे भी पार करो, तो शाक-द्वीप पहुँचोगे । उसको भी
पार करो, तो तरगायमान अमृताव्धि को देखोगे । उसे पार करो, तो चन्द्र-शैल तथा द्रोण-
शैल के मध्य भाग में उज्ज्वल प्रकाश से दीप्त ओषधी-शैल को देखोगे । उस पर्वत पर
सजीवकरणी, विशल्यकरणी, सधानकरणी तथा सौवर्णकरणी नामक चार ओषधियाँ है । तुम
उस पर्वत पर चढकर उन ओषधियो को ले आओ और इस वानर-समूह को प्राण-दान देकर
राम-लक्ष्मण को आनद पहुँचाओ ।'
९१. हनुमान् का ओषधी-शल लाकर वानरों की मूर्च्छा दूर करना
वायुपुत्र, जाववान् से आज्ञा लेकर सुवेलाचल पर चढ गया । अपने चरणो को
समान रूप से पृथ्वी पर प्रतिष्ठित करके, अपनी दीप्तिमान् लागूल को ऊपर उठाये, कधो
को उचकाकर, अपने शरीर को फुलाकर, राम का स्मरण करते हुए वह आकाश की ओर
उछला । उस अनुपम वेग के कारण वह विशाल पर्वत भी पृथ्वी में धँस गया, दिशाएँ
काँप गई और पृथ्वी चकराने लगी । इस प्रकार, आकाश मार्ग में उडकर हनुमान् ने अत्यत
भयकर समुद्र को पार किया और विष्णु के चक्र के समान आकाश में जाते हुए, मार्ग में
कई विचित्र दृश्यो को देखते हुए, घने फेन से युक्त अमृत-समुद्र को पार किया और चन्द्र-
शैल तथा द्रोण-शैल के मध्य भाग में स्थित ओषधी-शैल पर चढ गया और ओषधियो का
अन्वेषण करने लगा । किन्तु, वे ओषधियाँ काम-रूपिणी थी, इसलिए अपने-आपको उस कपि-
शेखर की दृष्टि से छिपा लिया । ओषधियो के नही दीखने से अनिलकुमार मन-ही-मन
विचार करने के पश्चात्, विनीत हो उस पर्वत से प्रार्थना करने लगा—'हे पर्वतराज,
में प्रालेय, पर्जन्य तथा कैलास-पर्वतो की उपेक्षा करते हुए शीघ्रगति से तुम्हारी सेवा में
आया हूँ । में कार्यातुर हूँ । देवताओ ने यहाँ जिन ओषधियो को छिपा रखा है, उन्हें
कृपया मुझे दिखा दो । हमारे राघव को इनकी आवश्यकता पड गई है । किसी भी तरह
उन्हें दे दो, तो अच्छा होगा ।'
तब पर्वत ने अट्टहास करके गर्व से फूलते हुए, हनुमान् से कहा—'तुम्हारा कितना
साहस है कि तुम मुझसे ऐसे वचन कह रहे हो ? इन ओषधियो को मुझसे माँगने का
तुम्हारा अधिकार ही क्या है ? इन्हें लाने का आदेश देनेवाले तुम्हारे राम की शक्ति
कितनी है ? जिन ओषधियो को देवताओ ने यहाँ छिपा रखा है, उन्हें तुम्हें देने से अधिक
कोई और अपराध हो सकता है ?'
इन गर्वोक्तियों को सुनकर अनिल-कुमार ने अत्यत क्रुद्ध होकर उस पर्वत से कहा—