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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

युद्धकांड २७३

२३ राम का समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना
इस प्रकार राम के प्रार्थना करने पर समुद्र, गर्व से फूलकर, उत्तुंग तरंग-रूपी
अपनी बाहुओ को हिलाते हुए, अपने धवल फेन-रूपी हँसी को बिखेरते हुए विशाल मीन-
रूपी जिह्वा को फैलाते हुए, अपने गंभीर घोष से अट्टहास करते हुए, अपने वेला-जल से
दिशाओ को यह वृत्तांत सुनाते हुए तथा अपने मध्य भाग के भँवरो से अपनी वक्रता दिखाते हुए,
राम की बातो की उपेक्षा करने लगा । यह सत्य ही तो है कि मूर्ख, दुर्जन, क्रूर-
कर्मी, तथा कुल-नाशक, कभी प्रार्थना करने से नही झुकते । प्रार्थना सुनकर वे और भी
भडक उठते हैं । प्रेम से उससे मिलने जाइए, तो वे मन को अशान्त बनानेवाली विष-वृष्टि
करने लगते हैं ।
समुद्र को अपनी प्रार्थना अस्वीकार करते हुए देखकर राघव के विशाल नेत्रो से
अग्नि-कण छिटकने लगे और उनकी भौहें तन गई । वे अत्यंत क्रोध से वार-वार समुद्र
और फिर लक्ष्मण की ओर देखकर बोले—'हे लक्ष्मण, इस समुद्र का गर्व तो देखो ।
मैं इससे कितनी बार प्रार्थना करता हूँ । फिर भी, यह मेरी प्रार्थना को स्वीकार नहीं करता ।
स्वीकार कराये बिना में थोडे ही इसे छोड़ दूँगा ? क्या, इसका वडवानल इतना तेजस्वी है
कि मेरी बाणाग्नि उसे निस्तेज न बना सकती । समुद्र भी देख ले कि मेरे बाणो में
कितनी शक्ति है । मैं अपने बाणो की अग्नि-ज्वालाओ से सारे समुद्र के जल को इस
प्रकार ढक दूँगा कि मानो वे उस समुद्र की हड्डियाँ हो । उन बाणो के तीक्ष्ण ताप के
कारण, बडे-बडे मकर, सर्प, मीन, गेंडा, कच्छप, कर्कट, मेंढक, जल-मानुष आदि का समूह
परस्पर एक दूसरे से टकराते हुए प्राण-रक्षा के लिए भाग खड़े होगे और तिमिगिल,
बलवान् जल-राक्षस, जल-ग्रह तथा पर्वत आदि का भी सर्वनाश हो जायगा । मैं उस समुद्र
की ऐसी धूल उड़ाऊँगा कि समस्त जलचरो का सचलन वद हो जायगा और सीप तथा घोंघे
बाहर निकल आयेंगे । मैं इसको लक्ष्मी का पिता, हरि का श्वशुर समझकर ही अबतक
चुप रहा । हे सौमित्र, मैं इसके लिए समुद्र मे प्रार्थना ही क्यो करूँ ? अपने-आपको
मैं इसके सामने शक्तिहीन क्यो समझू ँ ? लाओ मेरे धनुष-बाण और देखो कि यह समुद्र
मेरे बाणो से कैसे सूखता है । मैं अभी समुद्र में रहनेवाले प्राणियो को चूर-चूरकर
देता हूँ ।
इस प्रकार कहते हुए जब राघव ने धनुष हाथ में लिया, तब तुरत इन्द्र कपित
हुआ, आकाश थरथराने लगा, समुद्र आलोड़ित हुए, दिग्गज स्तभित हो रह गये,
पृथ्वी धँस गई, पर्वत-शिखर टूटकर गिरने लगे, ब्रह्मा चकित रह गया, नक्षत्र गिरने
लगे और दिशाएँ चकराने लगी । सूर्यवंशतिलक राम ने अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए,
प्रलय के समय प्रयुक्त करनेवाले यम के काल-दण्ड के समान, उज्ज्वल तथा प्रलयकाल
की अग्नि के समान दीप्त होनेवाले बाणो का अपने धनुष पर संधान किया और उन्हें
समुद्र पर चलाया । तब समुद्र की लहरें पर्वतो का आकार धारण करके आकाश का अंग
स्पर्श करने लगी, मानो समुद्र यह कहते हुए वाणो से बच रहा हो कि मैने अत्यधिक घमण्ड
दिखाया, मुझ पर कृपा करो । उन उत्तुंग लहरो पर इतना अधिक फेन दिखाई पडने लगा,

३५

२७४ रंगनाथ रामायण
मानो राम के शक्तिशाली बाणो के लग जाने से समुद्र के मुँह से झाग निकल रहा हो ।
सारा समुद्र इस प्रकार आलोडित होने लगा, मानो यह सोचकर वह व्याकुल हो रहा हो,
कि अब मुझे शरण कहाँ मिलेगी ? चारो दिशाओ में धुआँ इस प्रकार छा गया, मानो
मेघ-समूह समुद्र के जल का आस्वादन करने के निमित्त आने के पश्चात्, राम के शस्त्रो
के प्रताप से भीत होकर तुरत लौटे जा रहे हो । जलचर इस प्रकार छटपटाने लगे,
मानो वे दिखा रहे हो कि (भविष्य में) राक्षस इसी प्रकार छटपटायेंगे । सभी दैत्य
पाताल छोड़कर चारो ओर ऐसे भागने लगे, मानो मनुकुल-वल्लभ राम के बाणो की अग्नि
से सभ्रमित समुद्र के चित्त से अहंकार आदि भाव भागे जा रहे हो। उद्धत गति से
प्रज्वलित होनेवाली बाणाग्नि के साथ मिलकर समुद्र का वडवानल भी समुद्र के ऊपर ऐसे
जलने लगा, मानो वडवानल यह सोचकर कि मेरे रहते हुए भी जो समुद्र सूखा नही उसे
सोखने के लिए यह बाणाग्नि आ रही है, उसे बडे प्रेम से आलिंगन कर रहा हो ।
तब लक्ष्मण यम के समान क्रोधाभिभूत अपने अग्रज को देखकर, भयभीत हो,
समुद्र के किनारे आया और हाथ जोडकर बोला—'हे मानवेन्द्र, यह कोई रुद्र का रोष-रूपी
समुद्र नही, जिसका मथन करना असंभव हो । यह कोई यम का क्रोध-रूपी समुद्र नही है,
जिसको मथ देना दुष्कर हो । इस जल को सोखने के लिए ऐसा प्रयत्न क्यो ? आपके
बाणो की अग्नि इस समुद्र को जला देने के पश्चात् बाहर निकलकर समस्त दिशाओ के
साथ सभी लोको को जला दे, तो कोई आश्चर्य नही । अपना चरित्र समस्त जगत् में
विख्यात करते हुए आप अपने क्रोध का उपसहार कर लीजिए । आप के कोध के सामने
यह समुद्र क्या शक्ति रखता है ? इसका नाश मत कीजिए, वह धनुष मेरे हाथ में दीजिए,
यो कहते हुए उन्होने राम के धनुष को पकड़ लिया ।
किन्तु राम ने धनुष लक्ष्मण को नही दिया । उनका क्रोध द्विगुणित हुआ और
सौमित्र को टालते हुए, होठ चबाते हुए क्रोधपूर्ण दृष्टियो से समुद्र की ओर देखकर वे
कहने लगे—'रे समुद्र, तुम मेरे हाथो से परास्त नही होओगे ? तुम्हारे जल को अभी
सोखता हूँ और तुम्हारे जल के अंतर्गत रहनेवाले समस्त प्राणियो का नाश करता हूँ ।
तुम अब मेरा सेवक होकर खडे रहोगे । तुमने मेरा सामना करने की दुष्टता की । लो,
में अभी धनुष की डोरी पर बाण चढाता हूँ ।' इस प्रकार समुद्र को त्रस्त बनाते हुए
उन्होने धनुष पर ब्रह्मास्त्र चढाया ।
यह देखकर इन्द्र तथा ब्रह्मा दिग्भ्रान्त हुए, साग ब्रह्माण्ड विदीर्ण-सा हो गया ।
त्रिभुवनो में रहनेवाले प्राणी आर्तनाद करने लगे । सारा भुवन परितप्त-सा होने लगा ।
दिशाओ में अधकार व्याप्त होने लगा । रवि तथा चन्द्रबिब कांति-रहित हो गये । वज्र-
पात होने लगा । महापवन भयभीत हुआ । आकाशवाणी कंपित होने लगी । मिथ्याग्नियां
प्रज्वलित होने लगी और अविरल गति से एक भयकर निनाद गूँजने लगा ।
तब समुद्र अपने मकर-समूह के साथ विचलित हुआ । उसका सारा उफान जाता
रहा, उसकी उत्तुग लहरें कही दब गई, उसका घोर निनाद जाने कही अतर्धान हो
गया, उसका भयकर विष न जाने कही लुप्त हो गया , उसका गर्व कही चूर-चूर हो गया

युद्धकांड २७५
और उसके हाव-भाव नष्ट-से हो गये । अबतक पराजय का नाम न जाननेवाला
समुद्र आज पराजय के निवास के समान, सत्त्व-संपन्न होते हुए भी सत्त्वहीन के समान व्याकुल
होने लगा । स्थैर्य रखते हुए भी वह अस्थिर तथा अधीर हो बड़े वेग से राम के हाथ
के ब्रह्मास्त्र के अग्र भाग में एक बिंदु के रूप में आकर ऐसे खड़ा रहा, मानो वरदान के
प्रभाव से पल-पल बढ़नेवाले रावण के मस्तकों को एक साथ काट डालने के उद्देश्य से
राम ने अपने बाण को पैना बनाने के लिए वडवानल में उसे तपाया हो और फिर समुद्र
में उसे डुबोने पर सारा समुद्र खिंचकर उस शर के अग्र भाग में बूंद के रूप में खड़ा
हुआ हो और (इस प्रकार) कह रहा हो—‘हे देव, मेरा अस्तित्व इतना ही तो है ।’
२४. समुद्र का राम से प्रार्थना करना
तब समुद्र सब देवताओ के समक्ष दीप्तिमान् रत्न-प्रभा से विलसित हो, असंख्य
मंगल पुष्प-मालाओ से अलंकृत हो, उज्ज्वल तथा विशाल फणवाले कोटि सर्प तथा असंख्य
जलचरो के साथ, गगा आदि नदियो की सेवाओ को प्राप्त करते हुए, रामचंद्र के समक्ष
आया, साष्टांग प्रणाम किया ओर कर-कमलो को मुकुलित करके अत्यन्त भक्तियुक्त हो
निवेदन करने लगा—‘हे नरनाथ, आपके क्रोध के सम्मुख मेरी क्या शक्ति है कि मैं खड़ा
भी रह सकूं ? आप आदि पुरुषोत्तम हैं, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी आपकी
आज्ञा के वशवर्ती है । आपमें जो प्राणी विलसित हैं, उनकी गणना ही नहीं हो सकती ।
समस्त लोक आपके अधीन हैं । मुझे अपराधी जानकर आप मुझे दंड मत दीजिए । आप
जो भी कार्य कहें, आपकी आज्ञा को सिर आंखो पर धारण करके उसे संपन्न करूंगा ।
इसके पश्चात् गगा आदि नदियो ने रामचन्द्र को सिर नवाकर प्रणाम किया और
ललाट पर हाथ जोड़कर कहा—‘हे जगदभिराम राम, हम आपकी शरण में आई है ।
हे करुणानिधि, आप हम पर कृपा कीजिए । हम सब आपसे अभयदान की याचना करती है ।
अद्वितीय रीति से इस सागरेश्वर को क्षमा करके आप हमारे सौभाग्य की रक्षा कीजिए ।
हे त्रिभुवनाधार, हे दीन-मन्दार, अपराधियो को क्षमा करना ही आपका लोकोत्तर गुण है ।
हे देववंद्य, हम पर कृपा करके हमारी रक्षा कीजिए । हे शिवधनुर्भंजक, हे राम, आपकी
महिमा का वर्णन श्रुति भी गा नही सकते । आप देव-देव हैं । रक्षा तथा पालन करने में
आप ही समर्थ है । हे भूमीश, हे लोकेश, हे प्रकाश-संपन्न, हे सीतापति, हे पुण्य-स्वरूप,
आप हमारी रक्षा कीजिए ।'
इस प्रकार की नदियो की विनती सुनकर राम ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए
कहा—‘तुम भय छोड़ो ।’ तब समुद्र ने राम से निवेदन किया—‘हे कमलगर्भ, हे मुनिजन-
वंद्य, हे शरणागतरक्षक, हे दिव्य मूर्ति, आप चाहें, तो अपनी वानर-सेना को ले जाने
के लिए दीर्घकाय मकरों के संचलन से युक्त उमड़कर लहरो में फैल जाने वाले, झंझावात
को उत्पन्न करनेवाले, भँवरो से युक्त हो मेरे सौंदर्य की वृद्धि करनेवाले मेरे इस अगाध तथा
अनत जल पर सेतु बाँधिए या चाहें तो वैसे ही चले जाइए ।”
समुद्र के इन विनयपूर्ण वचनो को सुनकर राम संतुष्ट हुए और जलाधीश के सुझाव
के अनुसार उस अमोघ अस्त्र को मरुकांतार नामक प्रदेश पर चला दिया । उस बाण के

२७६ रंगनाथ रामायण

ताप से उस प्रदेश का सारा जल सूख गया । तब राम ने उस देश को सब प्रकार से
समृद्ध रहने का वर दिया, तब से वह प्रदेश उसी प्रकार सुशोभित रहता है । इसके
पश्चात् राम का शर फिर उनके तूणीर में लौट आया और समुद्र पूर्ववत् शांत हो गया ।
तब समुद्र ने अत्यंत विनय के साथ राघव से कहा—'हे भूपाल, पूर्वकाल में आपके
वंश के सगर-पुत्रों के द्वारा निर्मित होने के कारण मैं सागर नाम से विख्यात हुआ ।
इतना ही नहीं, मैं आपके वंश के लिए मान्य रहा हूँ । देव-दानव-युद्ध के समय आपके
पिता मुझे अयोध्या ले गये थे और बड़े आदर-सत्कार के साथ वहाँ से विदा किया था ।
इस प्रकार, मेरा और आपका संबंध (बहुत पुराना) है । इसलिए हे राघवेन्द्र, आप सेतु
बाँधिए और वानर सेना को उस पार ले जाइए ।"

२५ सेतु-बंधन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देना

तब रघुराम सूर्यनंदन को देखकर बोले—'हे सुग्रीव, सेतु बनाने के लिए शीघ्र
श्रेष्ठ वानरों को भेजो ।' सुग्रीव ने बड़े उत्साह से योग्य वानरों को इस कार्य के लिए
नियुक्त किया । अंगद, जाम्बवान्, नील, गज, गवाक्ष, पनस, नल, पावकनेत्र, तपन, तारू,
गवय, ऋषभ, गंधमादन, शरभ, द्विविद, शतबलि, हरिरोमवक्ष, सुषेण, केसरी, ज्योतिर्मुख,
दधिमुख, वेगदर्शी आदि श्रेष्ठ वानर-वीर समुद्र के निकट गये और शीघ्र गति से बड़े-बड़े
वृक्षों तथा पर्वतों को ले जाकर समुद्र में डालने लगे । लेकिन, उनमें कोई भी जल पर
तैरता नहीं था, सब जल में डूब जाते थे । तब सब वानर आश्चर्यचकित होकर राम के
पास लौट आये और सारा वृत्तांत कह सुनाया । रामचंद्र भी आश्चर्यचकित होकर समुद्र
से बोले—हे समुद्र, यह कैसी बात है कि इन कपि-वीरों के द्वारा फेंके गये वृक्ष तथा पर्वत
पानी पर तैरते नहीं हैं ? यह सुनकर समुद्र बोला—'हे परमेश, वानर जिन वृक्षों को जल
में फेंकते हैं, उनके समुद्र-तल में पहुँचते ही जलचर उन्हें शीघ्र निगल जाते हैं । समुद्र
के तल में शतयोजन विशाल आकारवाला तिमि नामक मत्स्य रहता है, जो सभी जलचरों
को खा जाता है । उन मत्स्य को तिमिंगिल निगल जाता है । हे देव, इस प्रकार एक
दूसरे को निगल जानेवाले दीर्घ आकारवाले असंख्य मत्स्य समुद्र में रहते हैं ।"
इन बातों को सुनकर राम बोले—'हे समुद्र, ऐसी दशा में समुद्र पर सेतु बाँधने
का क्या उपाय हो सकता है, बताओ ।' तब समुद्र बोला—'हे सूर्यवंश-तिलक, आप सेतु
बाँधने के लिए नल को भेजिए । यह महान् विश्वकर्मा का पुत्र है । इसका उपाय वही
जानता है । अपने पिता से उसने यह कला जान ली है । उसके सिवा और किसी से यह
सेतु बाँधा नहीं जा सकेगा । इसका एक और कारण भी है, सुनिए । बहुत पहले की बात है
कि यह अपनी बाल्यावस्था में विंध्याचल के निकटवर्ती वन में पशुकर्ण नामक मुनि के
समीप खेल रहा था । मुनि स्नान आदि अनुष्ठान करने के लिए चले गये, तो इसने मुनि
की सभी पूजा-मूर्तियों को अपने मुँह से धक्का देकर समुद्र में फेंक दिया । जब मुनि वहाँ
लौटकर आये, तब सारा वृत्तांत उन्हें मालूम हुआ । इस पर वे बहुत ही क्रुद्ध हुए, किन्तु बालक
होने के कारण उसे दण्ड नहीं देना चाहते थे । मुनि अपनी खोई हुई वस्तुओं को पुन
प्राप्त करने का उपाय सोचने लगे । उस तपोधन ने अच्छी तरह सोच-विचारकर, अपनी

युद्धकांड २७७
तपस्या की महिमा से इसको एक ऐसा वर दिया कि तृण से लेकर कोई भी वस्तु, जिसे
यह वालक समुद्र में फेंकेगा, वह जल के ऊपर ही तैरने लगेगी । इस वरदान के फल-स्वरूप
उस मुनि की देव-मूर्त्तियाँ जल के ऊपर तैरने लगीं ! यही कारण है कि इसके हाथो से
फेंके जाने पर पहाड़ भी जल पर तैरने लगेंगे । इस प्रकार मेरे जल पर सेतु बँध जायगा।
हे धरणीश, आप शीघ्र ही नल को वुला भेजिए ।'
२६. सेतु-बन्धन
तब रघुकुलोत्तम राम ने नल को वुलाया और वड़े आदर के साथ उसे देखकर
वोले—'हे वानरवीर, हे धीर, समुद्र ने तुम्हारे पराक्रम का वृत्तात मुझे सुनाया है ।
अव तुम अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए समुद्र पर मेतु वाँधने में दत्तचित्त हो जाओ ।'
राम का आदेश सुनकर उसने हाथ जोडकर राम भूपाल से कहा—'हे देव, इस ससार में
जन्म लेने का फल आज मुझे प्राप्त हुआ । आप मुझे आज्ञा दीजिए । मैने अपने पिता से
सेतु वाँधने की कला जान ली है । मै अपनी निपुणता का

:
First letter is 'सु'.
Second letter: 'ष' with 'े' = 'षे'. Wait, does it have a diagonal line?
Let's look at 'षे' in L18: there is a diagonal line from top-left to bottom-right of the belly.
In L19: there IS a diagonal line, but it's very faint, or is it 'पे'?
Wait, in "सुषेण", why would one line be 'मुषेण' and the next 'सुपेण' or 'सुषेण'?
Wait, let's look at the name: Sushena is a well-known character (the monkey physician / general, Tara's father).
Wait, look at L18 again. Could the first letter be 'सु'?
Wait, let me look at 'सुग्रीव' in L17:
'सु': the left part of 'स' is round.
In L18, look at that character: wait, look at the top-left! It's round!
Wait, let me look at 'म' in 'मथन' (L5): 'म' has a sharp corner at top-left.
In L18, does it have a sharp corner or a round curve? It has a round curve!
Wait, is that a 'स'? Look at 'स' in 'संसार' / 'ससार' (L9): the 'स' has a round curve, goes down, and a foot.
In

जब मध्याह्न हुआ, तब वानर अपनी थकावट मिटाने के लिए वृक्षो की छाया में
गये और मीठे फल खाते तथा ठंडा जल पीते हुए थोड़ी देर वहाँ विश्राम करते रहे ।
उसके पश्चात् वे अत्यधिक उत्साह से काम में लग गये । वे एक दूसरे से कहते-'तुम
इन पहाड़ो को ले आओ, तुम उन पर्वतो को उखाडकर ले आओ ।' इस प्रकार, एक
दूसरे को बढावा देते हुए असंख्य वृक्षो, तथा पर्वतो को ला-लाकर वे नल को देते थे ।
कुछ वानर पर्वतो को सीधे समुद्र में ही गिरा देते थे, कुछ बीच रास्ते में ही दूसरो का
बोझ अपने सिर पर ले लेते और कुछ अपना बोझ ले आकर नल के निकट रख देते थे ।
इस प्रकार, दूसरे दिन उन्होने छब्बीस योजन लंबा पुल बनाया । तब सूर्यास्त हुआ ।
तब सुग्रीव आदि वानर, रामचन्द्र को अपने कार्य की प्रगति का वृत्तांत सुनाकर समुद्र-तट पर
अपने निवासो में लौट आये और रात को बडी शान्ति के साथ सो गये । दूसरे दिन प्रात -
काल ही उठकर वे बडे उत्साह से सेतु बाँधने चले । वे एक दूसरे से स्पर्धा करके कहते
जाते थे कि हम अकेले सभी पर्वतो को उठा लायेंगे । हम ही सब वृक्षो को उखाडकर
लायेंगे । इस प्रकार, होड लगाकर वे चारो दिशाओ में बिखर गये । कुछ लोग वृक्षो तथा
पर्वतो को ले आकर समुद्र में डालते थे, कुछ निरीक्षण करते थे, कुछ पेड़ो की छाया में
बैठकर सुस्ताते थे, कुछ लोग बने हुए सेतु की लंबाई नापते थे, कुछ लोग जहाँ-तहाँ
बैठकर ऊँघते थे, कुछ लोग ठंडे जल से अपनी प्यास बुझाते थे । इस प्रकार, वे सब
अत्यधिक क्लान्ति का अनुभव करने लगे । तब सूर्य, चन्द्र के समान शीतल प्रकाशित होने
लगा । इन्द्र अमृत का फुहारा बरसाने लगा । पवन शीतल होकर चलने लगा । पुष्प-सौरभ
आनंद पहुँचाने लगा । तब वानर अत्यत उत्साह से वृक्षो तथा शैलो को लाकर समुद्र में
डालने लगे । उनकी उद्धत गति से भीत होकर समुद्र के सभी जीव, अपने प्राण बचाने
के लिए जहाँ-तहाँ भागते, पुन-पुन पानी के ऊपर सिर उठाकर देखते और मन ही मन
सोचते कि कदाचित् पहले के समान ही कोई अमोघ अस्त्र हमारा संहार करने के लिए
आ रहा है । फिर तुरन्त यह जानकर कि वानर समुद्र में सेतु बांध रहे है, मन-ही-
मन प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से विचरण करने लगते । इस प्रकार, वानर-वीरो ने बडी
तत्परता से उस दिन पचास योजन तक पुल बांधा । इतने में सूर्यास्त हुआ ।
तब सभी वानर-वीर भक्तियुक्त हो, संध्या-वंदन आदि कार्य से निवृत्त हो विचार
करने लगे कि अब तो हमें केवल दस ही योजन लंबा पुल बाँधना शेष रह गया है ।
कल यह भी पूरा कर लेंगे । इस प्रकार, वार्त्तालाप करते हुए वे समुद्र-तट पर लौट आये
और रात को सुख की नीद सोये । प्रात काल होते ही सभी वानर-नेता रामचन्द्र के पास
गये और उन्हें बडी भक्ति से प्रणाम करके अपने कार्य की प्रगति सुनाई । फिर, वे
मोदमग्न मन से फिर वृक्षो तथा महाशैलो को बड़ी शीघ्र गति से ला-लाकर नल के हाथो
में देने लगे ।

२५ गिलहरी की भक्ति

तब राम सेतु का निरीक्षण करने के उद्देश्य से सागरेश्वर, वानरेश्वर तथा दैत्य-
नायक के साथ वहाँ गये और लक्ष्मण के कंधे पर अपना वाम कर टेके हुए मंद-मंद

मुस्कान-रूपी चन्द्रिका से दीप्त होनेवाले मुँह से विलसित होते हुए पुल पर खडे होकर
सेतु के निर्माण का कार्य देखते रहे । कपि सब बडे-बडे वृक्षो तथा पहाडो को बड़े साहस
के साथ उखाडकर ले आने थे और नल के हाथ में देते थे, नल उन्हें लेकर पुल में लगा
देता था । इसी समय एक गिलहरी ने सोचा—‘सेतु का निर्माण शीघ्र ही पूरा होना चाहिए
इसलिए मै भी इन बलवानो की सहायता करूँगी ।’ यो सोचकर उसने राम के चरण-
कमलो का मन-ही-मन स्मरण करके, उनके समक्ष ही वडी भक्ति के साथ समुद्र में गोता
लगाया, फिर वह समुद्र-तट पर बालू में लोट गई, उसके पश्चात् पुल पर आकर अपने
शरीर पर लगी रेत को झटका देकर गिराने लगी । इसी प्रकार, वह बार-बार समुद्र
में गोता लगाती, बालू में लोटती और तुरंत आकर पुल पर अपने शरीर पर लगी रेत
को गिरा देती । राम बडी देर तक गिलहरी का यह कार्य देखते रहे । फिर, उन्होने अपने
अनुज को देखकर कहा—‘हे लक्ष्मण, वहाँ देखो, एक गिलहरी मेरी भक्ति से प्रेरित होकर
अपना शरीर जल से भिगो रही है । फिर, तट पर पहुँचकर रेत में लोटती है और फिर
अपने शरीर में लगी रेत को पुल पर गिरा देती है । जहाँ श्रेष्ठ बलशाली वानरवीर
वृक्षो तथा पर्वतो को लाकर गिराते है, वहाँ अपनी अल्प शक्ति का विचार किये बिना ही
वह बडे प्रेम से अपनी शक्ति के अनुरूप सहायता कर रही है ।’ तब लक्ष्मण ने कहा-
‘हे सूर्यवंश-तिलक, मैने जान लिया कि जो आपके चरण-कमलो में अपना मन स्थापित
करके एक तृण भी अर्पित करता है, आप उसे मेरु पर्वत के समान ही मान प्रदान करते हैं।
इसलिए हे अनघ, आपकी भक्ति ही प्रधान है ।’ तब राम ने सुग्रीव से कहा—‘उस गिलहरी
को देखने के लिए मेरी बडी इच्छा हो रही है । उसे प्रेम से यहाँ ले आयो ।’ तब सुग्रीव
उस गिलहरी को पकड़कर ले आया और राम के हाथो में दे दिया । राम ने कई प्रकार
से उसकी प्रशसा की और बड़े हर्ष से अपना सुदर दाहिना हाथ उसकी पीठ पर फेरा ।
उसके पश्चात् उन्होने लक्ष्मण, सागरेश्वर, विभीषण तथा सुग्रीव के समक्ष उसे छोड़ दिया ।
वह गिलहरी थोडी देर तक वही इधर-उधर विचरती रही । फिर, राम ने उसे चंदन,
मदार, चपक, पूगीफल, पुन्नाग, सहकार आदि वृक्षो से युक्त सुदर प्रदेश में छोड़ देने
का आदेश दिया ।

२९. सेतु को देखकर राम का हर्षित होना

तदनंतर हनुमान्, अगद, नील, हरिगोम, आदि वानरश्रेष्ठो के साथ राम आश्चर्य-
चकित करनेवाले उस विशाल सेतु पर खड़े होकर कहने लगे—‘वाह ! नल कितना निपुण है !
उसने समुद्र के दूसरे छोर तक एक विशाल चबूतरे के समान इस पुल का निर्माण
किया है । अपनी कला-निपुणता तथा अपने बाहुबल को प्रदर्शित करके उसने इस दीर्घ
सेतु को बांधा !’
नल द्वारा निर्मित वह सेतु शत योजन लबा और दस योजन चौडा था और मलय
पर्वत तथा सुवेलाद्रि का स्पर्श करता हुआ बहुत सुदर दीख रहा था । समुद्र में उछल-कूद
करनेवाले बडे-बडे मत्स्य-समूह-रूपी दीप्त नक्षत्रो तथा दोनो ओर व्याप्त नील समुद्र-
रूपी नील गगन के साथ वह सेतु आकाश-गंगा के समान सुशोभित हो रहा था ।

'राम भूपाल ने दया करके मुझे अभयदान दिया है'—ऐसा सोचकर मानो फूल उठनेवाले उस
विशाल समुद्र को देखकर कपि भी (अपने कार्य की सफलता देख) आनंद से फूलने लगे ।
आकाश से देवता (रामचन्द्र के) पराक्रम के परिणाम को देखकर मन-ही-मन यह विचार
करके हर्षित होने लगे कि, सच ही तो है, नीच व्यक्ति कभी मृदुवचनों से बात नहीं
मानता । वह केवल दंड के भय से, वश में लाया जा सकता है । रामचन्द्र ने जब समुद्र
से विनय के साथ प्रार्थना की, तब समुद्र ने उनकी उपेक्षा की । फिर, सूर्यवंश-तिलक ऐसा
क्यों नहीं करें ? जो व्यक्ति इस सेतु का स्मरण-मात्र करेगा, जो इस सेतु का दर्शन करेगा,
उसे विजय, यश तथा पुण्य की प्राप्ति होगी। जबतक यह सेतु स्थिर रहेगा, जबतक यह समुद्र रहेगा,
तबतक राघव की कीर्त्ति स्थिर रहेगी और दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई वह आनंद प्रदान करती रहेगी ।
इस प्रकार, मन-ही-मन हर्ष-पुलकित होते हुए उन्होंने फूलों की वृष्टि की और
देव-दुंदुभियां बजाईं । तब रघुराम आनंदित होकर सेतु को देखते हुए बोले—'यह सेतु
अनंतकाल तक नल के नाम पर विख्यात होते हुए सुशोभित रहेगा ।' प्रभु के वचन सुनकर
सभी कपिवीरों ने नल की प्रशंसा की । तब समुद्र, सेना के साथ राम को अपने निवास
स्थान ले गया और अत्यंत भक्ति के साथ उन्हें दिव्यास्त्र, दिव्य वस्त्र, दिव्य भूषण तथा
वज्र-कवच प्रदान किये और निष्कलंक चित्त से रामचंद्र को देखकर कहा—'हे राम भूपाल,
आप राजपुत्र हैं । युद्ध के समय आपका यह मुनि-वेश क्यों ? अब उचित यही है कि
आप इन दिव्य-वस्त्र तथा आभरणों को धारण करें ।'
३०. राघवों का सुवेलाद्रि पर पहुँचना
तब राम-लक्ष्मण ने दिव्य वस्त्राभरणों, चंदन तथा पुष्प-मालाओं को धारण किया
और रविचंद्र के समान दीप्तिमान् होने लगे । समुद्र ने उन्हें आशीर्वाद देकर विदा किया ।
तब राम-लक्ष्मण हनुमान् तथा नील के कंधों पर बैठकर (सुवेलाद्रि के लिए) रवाना हुए।
सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे, समस्त लोक उनकी जयजयकार करने लगा । रामचंद्र ने
समुद्र को अनुमति देकर उसको घर भेज दिया और अपने अनुज के साथ लंका की ओर मुँह
करके सेतु के मार्ग से ऐसे रवाना हुए, मानो रमणीय राक्षस-लक्ष्मी के सीमंत पर ही चरण
धरकर चल रहे हों । विभीषण गदा हाथ में लिये हुए कपि-सेना के आगे-आगे चलने
लगा । निदान पराक्रमी राम अपने मंत्रियों के साथ सुवेलाद्रि पर पहुँच गये और वहाँ
शिविर डाल दिये । राम के पीछे-पीछे उनकी विशाल वानर-सेना चली। कुछ लोग सेतु
के किनारे-किनारे चल रहे थे, तो कुछ सेतु के बीचोबीच जा रहे थे, कुछ वानर बड़े
कौतुक के साथ आकाश-मार्ग से जा रहे थे, तो कुछ झुंड बनाकर जा रहे थे, कुछ समुद्र
में तैरते हुए जा रहे थे, तो कुछ अपने समूह से विछुड़कर आगे पीछे-दौड़ रहे थे । उस
सेना के हुंकार तथा गर्जनों की ध्वनि ने समुद्र-घोष को भी दबा दिया । उस ध्वनि के
प्रभाव से आकाश-पाताल तथा दिशाएँ कंपायमान होने लगीं । इस प्रकार, राघव ने अपनी
सेना के साथ सेतु की यात्रा पूरी करके सुवेलाद्रि पर पड़ाव डाल दिया । अपने गुप्तचरों
के द्वारा राम के आगमन का वृत्तांत जानकर रावण ने समस्त दानवों को अपनी राज-सभा
में बुलाया और स्वयं नवरत्न-खचित सिंहासन पर आसीन हुआ ।
। ३६

२८२ रंगनाथ रामायण
३१ कैकसी का हितोपदेश
उस समय कैकसी सभा में आई। उसे देखकर रावण ने बड़े आदर के साथ उठकर उसे
प्रणाम किया और योग्य आसन पर उसे बिठाकर स्वयं भी बैठा। फिर, अत्यत विनय से
उससे कहा—'हे माता, आप तो कभी राज-सभा में नही आती । आज आपके आगमन
का क्या कारण है ? कृपा करके बतलाइए ।'
तब उसने कहा—"हे पुत्र, मै जितना जानती हूँ उसे कहूँगी । ध्यान से सुनो ।
राम की पत्नी पर आसक्त होकर तुम उन्हें धोखे मे हरकर ले आये हो। इसीलिए आज
ऐसी भयंकर घटनाएँ घट रही है । स्वयं विष्णु ने आर्यों के रक्षणार्थ दशरथ का पुत्र होकर
जन्म लिया, ताड़का का सहार किया, कौशिक के यज्ञ की रक्षा की, अपने चरणो की धूलि
से शिला को स्त्री के रूप में बदल दिया, बड़े हर्ष से शिव-धनु का भग किया, जानकी से विवाह
किया, परशुराम के गर्व को तोडा, अपने पिता की आज्ञा मानकर लक्ष्मण तथा जानकी के
साथ वनवास के लिए आया, वनो में रहनेवाले मुनियो को अभयदान दिया, तुम्हारी वहन
के नाक-कान काट दिये, खर-दूषण का सहार किया, मारीच का वध किया, अपने भयंकर
अस्त्र से वालि को गिरा दिया, सूर्यनदन को अपना सेवक बना लिया, अपने बाण के अग्र
भाग पर उपस्थित होने के लिए समुद्र को विवश किया, कपियो से समुद्र पर पुल बँधवाया
और अब देवताओ की रक्षा करने तथा असुरो को दण्ड देने के उद्देश्य से सुवेलाद्रि पर आकर
ठहरा हुआ है । उस दानवातक (राम) ने इस पृथ्वी पर मत्स्य, कूर्म, वराह, सिंह, वटु,
(भार्गव) राम, तथा (दशरथ-पुत्र) राम के रूप धारण किये है । वे स्वयं आदिनारायण है।
उनकी महिमा का वर्णन करना किसी के लिए सभव नही है। उनकी आज्ञा से ही वायुपुत्र ने
समुद्र पार किया, जानकी को राम का सदेश सुनाया, यक्ष आदि राक्षसवीरो का संहार
किया और लका-दहन करके अपने प्रभु के पास लौट गया । तुम उस पवनपुत्र को ही
जीत नही सके । तब उसके प्रभु को जीतना क्या, तुम्हारे वश की बात है ?
तुम्हारे पिता ने एक दिव्य रहस्य मुझसे कहा था । उसे में तुम्हें सुनाती हूँ । ध्यान
से सुनो ।
"एक वार ब्रह्मा तथा इन्द्र, मुनि, यक्ष तथा गधर्व-नेताओ को साथ लेकर विष्णु
भगवान् के दर्शनार्थ गये और उनसे निवेदन किया—'हे प्रभो, रावण तथा कुंभकर्ण के
अत्याचार असह्य हो गये है । कृपया उनसे आप हमारी रक्षा करें।' तब उन्हें देखकर
कमलनाभ ने कहा—'मै सूर्यवश में जन्म लेकर युद्ध में सहज ही इन राक्षसो का संहार
करूँगा।' फिर, उन्होंने सभी देवताओ को देखकर कहा—'तुम वानरो का रूप धारण कर पृथ्वी
पर जन्म धारण करना और युद्ध में मेरी सहायता करना ।'
"यह वृत्तात तुम्हारे पिता ने मुझे बताया था । वह विष्णु ही ये राम हैं । लक्ष्मी
ही उनकी पत्नी है । देवता ही वानर है । उन्हें तुम युद्ध में जीत नही सकोगे । अत;
तुम अपनी दुर्बुद्धि तज दो और उस भूसूता, जगन्माता, निगमो द्वारा प्रशसित, निखिल-लोक-
विख्यात, अमित-गुणोपेता, पवित्र सीता को राम के चरणो में सौंप दो । पापशोषक, धीर,
सतत शुभाषी तथा आर्य-पक्षपाती विभीषण को लका का राज-तिलक कर दो और राम

की शरण की याचना करो । वे शरणागत शत्रु की भी उसी प्रकार रक्षा करते हैं, जैसे
(उन्होंने) गजेन्द्र की रक्षा की थी ।"
कैकसी के हितोपदेश को सुनकर रावण क्रुद्ध होकर बोला—'हे माता, मैंने पचास
लाख वर्ष तक अबाध-गति से राज्य किया है और सब प्रकार के सुखो का अनुभव किया है।
मैं स्वप्न में भी किसी से नही डरता । इन नर और वानरो की शक्ति ही कितनी है ?
क्या, ये देवताओ से भी अधिक शक्तिशाली है ? मै अवश्य इन्हें जीत लूँगा । यदि मैं
उन्हें जीत नहीं सका, तो राम के बाणो से मारा जाऊँगा । किन्तु, इन नीच मानवो के
सामने अपना सिर नही झुकाऊँगा । यह सत्य है । हे माता, आप ऐसा उपदेश मत दीजिए
आप रनवास में लौट जाइए । आप लाख कहें, तो भी मैं सीता को नही लौटा सकता ।'
कैकसी इस प्रकार कहनेवाले अपने पुत्र की निंदा करती हुई अपने अत पुर में चली गई
और विचार करने लगी, 'होनहार बलवान् है, वह किसी भी प्रकार से टाला नही जा
सकता ।' यो विचार करके वह सतत धर्माचरण में लीन रहती हुई अपना समय व्यतीत
करने लगी ।
रावण ने भेरियो तथा नगाडो के अत्यधिक निनाद के द्वारा सारी राक्षस-सेना को
एकत्रित किया और आयुधो से सज्जित अपने प्रताप से दीप्त, मत्रियो को देखकर अत्यत
भयकर रूप धारण करके, आँखो मे अग्नि-वर्षा करते हुए कहने लगा—'रामचन्द्र सेतु को
बाँधकर अत्यधिक शौर्य के साथ मुवेलाद्रि पर आकर ठहरा हुआ है । जब मेरा शत्रु मेरे
ऊपर आक्रमण करने के लिए आ रहा है, तब तुम्हारा इस प्रकार उपेक्षा करके सोते रहना,
क्या उचित है ? पर तुम्हें क्यो दोष दूँ ? तुम मन्त्री हो, ऐसा सोचकर तुम पर विश्वास
करना मेरी ही भूल है । क्या, तुम सोचते हो कि तुम्हारे उपेक्षा करने से मेरी हानि होगी ।
ऐसा कभी नही होगा । साम, दान, भेद आदि उपायो से यदि मैं उसे अपने वश में ला नही
सकता, तो मे राम के साथ घोर युद्ध करूँगा ।'
रावण ने जब ऐसा कहा, तब सभी राक्षस लज्जित होकर सिर झुकाये चुप हो रहे ।
जब रावण ने उन्हें डाँटकर कहा कि तुम लोग चुप क्यो हो, तब इन्द्रजीत अपना शौर्य दिखाते
हुए कहने लगा--"हे देव, समस्त देवताओ पर विजय पानेवाले आपको इन राम-लक्ष्मण
जैसे अकिंचनो के द्वारा कौन-सी हानि पहुँच सकती है ? आप चिंता मत कीजिए । मे
वल, साहस तथा शौर्य से सपन्न हूँ । क्या, आप नही जानते कि मैने इन्द्र को नाग-पाश
से बाँधकर उसकी कैसी दुर्गति कर दी थी ? भीषण रण में कालकेय आदि राक्षसवीरो
को क्या मैने परास्त नही किया था ? तब हे दनुजेश, साधारण मानव, कृश, तपस्वी
तथा दुर्बल दशरथ-पुत्रो को युद्ध में मार डालना मेरे लिए कौन वडी बात है ? आप सदेह
मत कीजिए; में अवश्य उन्हें युद्ध में मार डालूँगा ।"
तब अतिकाय नामक राक्षस ने राक्षसराज से कहा—'हे दानवनाथ, जो राजा
नीतिवान् होकर, दूसरो की संपत्ति की अभिलाषा किये बिना सम्पन्न समाज की प्रशसा
प्राप्त करते हुए, जीवन-यापन करता है, वही सदा राज्य-पालन करेगा । हे दनुजेश्वर, सूर्य-
कुल-तिलक राम ने तुम्हारा क्या अपकार किया है ? उनकी स्त्री पर आपकी आसक्ति

२८४ रंगनाथ रामायण
क्यो हुई ? आपका तथा आपकी लका का सर्वनाश करने के लिए इन राक्षसो ने निश्चय
किया हैं । उचित यही है कि आप सीता को राघव के हाथो में सौप दें और बुद्धिमान्
होकर इस ससार में सम्मान प्राप्त करते रहें ।'
इस प्रकार, कई रीतियो से अतिकाय ने रावण से हित-वचन कहे, किन्तु
रावण ने उसकी बातो की जरा भी परवाह नही की । उसने वडे साहस के साथ शुक
तथा मारण को देखकर अपना शौर्य दरसाते हुए कहा—'यह वड़ी विचित्र वात है कि एक
मानव समुद्र पर पुल वाँधे । तुम लोग कहते हो कि राम ने ऐसे पुल का निर्माण किया है ।
इसलिए तुम दोनो उसकी सेना में प्रवेश करके उसकी गक्ति का पता लगाकर आओ ।'
३२. शुक तथा सारण का राम की सैन्य-शक्ति का परिचय पाना
तब उन दोनो ने वानरो का वेश धारण करके जगलो, उपवनो तथा पर्वतो में सेतु
के निकट और समुद्र के उस पार के प्रदेशो तथा गुफाओ में विचरण किया और सव स्थानो
में व्याप्त वानर-सेना को देख आश्चर्य से अपने सिर कँपाने लगे । फिर, वे आश्चर्य-पुलकित
गात्र से वानर-सेना के भीतर प्रवेश करने लगे । उस समय विभीषण ने उन्हें पहचान लिया
और उन्हें वदी वनाकर रामचंद्र के सम्मुख उपस्थित करके कहा—'हे राजन्, ये दोनो
रावण के मंत्री है । वानरो के वेश में यहाँ आये है । इनके नाम शुक तथा सारण हैं ।
वे हमारी सेना में प्रवेश करके हमारी सभी वातो का परिचय प्राप्त करके जाना चाहते है ।'
तब उन गुप्तचरो ने भय से अत्यधिक आक्रान्त होकर हाथ जोडकर प्रणाम किया
और कहा—'हे देव, हम रावण के भेजे हुए गुप्तचर हैं । विभीषण ने जो कहा, वह
सत्य है । रावण ने आज्ञा दी है कि हम आपकी सेना का पता लगाकर आयें । इसलिए
हम आये हैं ।'
तब राघव ने हँसते हुए कहा—'तुम रावण के मत्री हो, इसलिए तुम्हें मार डालना
ही उचित है । किन्तु में तुम्हें मारना नही चाहता । तुम्हें मारने से हमारा क्या हित हो
सकता है ? तुम यहाँ की सभी वातें विना किसी अपवाद के देख लो और शीघ्र जाकर
अपने प्रभु रावण से सारी वातें कहो । उसमे यह भी कहना कि जिस शक्ति के भरोसे
वह सीता को चुराकर लाया है, उस शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए यहाँ आये । उसमे
कहना कि मै युद्ध में लका के सभी राक्षसो का तथा गर्व से फूलनेवाले उसका भी वध
कहूँगा । अब तुम जाओ ।'
तब उन दोनो ने विभीषण के साथ जाकर समस्त वानर-सैन्य की शक्ति का पता
लगा लिया और तुरत रावण के पास जाकर बोले—'हे देव, आपकी आज्ञा के अनुसार
हम वानर-सेना के निकट जाकर उसको देखने लगे, तो आपके अनुज विभीषण ने हमें
पहचान लिया और हमारा वध करने के उद्देश्य से हमें वदी वनाकर राम के सामने उप-
स्थित किया । लेकिन रामचंद्र दयानिधि है, इसलिए उन्होने हमारे वध की आज्ञा नही दी ।
हे लंकेश्वर, आपका, आपकी लका का तथा समस्त राक्षसो का नाश करने के लिए एक
सौमित्र ही पर्याप्त है । अब राम के शौर्य का वर्णन क्या करें ? हे देव, हमने सेतु को
देखा । वह शत योजन लवा और दम योजन चौड़ा है । ऐसे विशाल सेतु-भर में वानर

युद्धकांड २८५
सेना ठहरी हुई है । उस सेना की गणना करना असम्भव है । जहाँ देखो वहाँ वानर-सेना
ही है । कुछ सेना पर्वतो पर ठहरी हुई है, कुछ सेना अभी ठहरने की व्यवस्था में ही
लगी है, कुछ सेना ठहरने के लिए स्थान खोज रही है, कुछ सेना समुद्र के उस पार है
और कुछ सेना वहाँ से निकलकर इस पार आ रही है । हे प्रभो, इतनी विशाल सेना
को देखकर मन में भय उत्पन्न होता है । एक एक स्थान पर ठहरी हुई सेना की गणना
करके लिखना ब्रह्मा के लिए भी असम्भव है । इसलिए हे दानवेन्द्र, आप राम के दर्शन करके
उन्हें सीता को लौटा दीजिए और आनन्द में रहिए ।"
उनकी ऐसी बातो को सुनने की इच्छा न रखनेवाला रावण अत्यधिक रोष से
बोला--'चाहे देवता तथा गंधर्व ही मेरे ऊपर आक्रमण करने आवें, तो भी मैं सीता को
नहीं छोड़ूँगा । तुम ऐसे कायर क्यो बनते हो ? कदाचित् वानरो ने तुम्हें पकड़कर अच्छी
तरह पीटा है, इसलिए तुम भयभीत होकर भाग आये हो । डरो मत, वे कपि तुम्हारा
पीछा करते हुए नही आ सकेंगे ।' इस प्रकार कहते हुए रावण शुक तथा सारण के साथ
अपने ऊँचे सौध पर चढ़कर उस विशाल कपि-सेना को देखकर आश्चर्यचकित हुआ ।
उसके पश्चात् उसने शुक-सारण को देखकर पूछा—'इस विशाल कपि-सेना का
संचालन करते हुए कौन आगे-आगे चलेगा ? सावधानी के साथ उसके पीछे-पीछे कौन
चलेगा ? इनमें कौन शूर है ? कौन चतुर है ? सूर्यवंशी राम किसके परामर्श से काम
करता है ? किसके साथ राम अपने मन की बात करता है ? सेना किसकी आज्ञा के
अधीन है ? दिन-रात इस सेना की रक्षा करनेवाला कौन है ? इस सेना में सामन्त
कौन है ? इसमें सुग्रीव कौन है ? राम कौन है ? लक्ष्मण कौन है ? और, अगद कौन है ?
उन्हें दिखाने के पश्चात् उनके शौर्य के बारे में कहो । मुझे क्रोध नहीं आयगा ।'
३३. सारण का रावण को कपियों का परिचय देना
तब सारण बड़ी कुशलता के साथ इस प्रकार कहने लगा—"हे देव, पुर्किंद नदी-
तटवर्ती सूर्यपुत्र, इस पृथ्वी पर महान् बली है । उसीने इस लंका को उखाड़ दिया था और
यहाँ भयंकर चीत्कार व्याप्त कर दिया था । वही एक लाख श्रेष्ठ कपि-वीरों के साथ
वानर-सेना के अग्र भाग में रहता है । हे देव, नील एक अतिबलशाली है और वही राम
का सेनाध्यक्ष है । अपनी पूँछ को बड़े गर्व से हिलाते हुए समस्त दिशाओ को कम्पित करने-
वाला हजार पद्म तथा एक शंख उत्तम वानर-सेना के साथ, पर्वत के समान दिखाई पड़ने
वाला वालिपुत्र अंगद है । वह वालि की अपेक्षा अधिक बलवान् है । वालि-पुत्र के उस
ओर रहनेवाला नल है, जो चन्दनाद्रि का स्वामी है और विख्यात विश्वकर्मा का पुत्र है ।
उसीने एक सहस्र करोड़ और अस्सी लाख वानरों की सहायता से समुद्र पर पुल का
निर्माण किया है और समस्त वानर-सेना को समुद्र पार कराया है। वह अकेले ही अपनी
विशाल सेना के साथ समस्त लंका को जीतना चाहता है । हे राक्षसराज, रविपुत्र के
सामने ही रमणीय कांति में रजताद्रि की समता करनेवाले श्वेत नामक वानर को देखिए ।
वही समस्त सेना की व्यवस्था करता है । हे लंकेश वह देखिए, सत्तर करोड़ वानर-वीरों
को साथ लिये हुए वेगवान् नामक वानर हमारी ओर देख रहा है। वह सुग्रीव का मित्र है

(L10): the anusvara is very clear and dark! Inजाबवान्, there is NO dot whatsoever. So it is literally जाबवान्`.

Line 21:
अत्यंत नील मेघो के बीच में इन्द्र के समान शोभायमान होनेवाला वह नर्मदा नदी के

Line 22:
तट पर स्थित ऋक्षनग का अधिपति है । वह महान् बलशाली तथा शूर है और असख्य
(Yes, असख्य without dot!)

Line 23:
समर्थ भालू उनकी सेवा में रहते हैं । उस जाबवान् को देखिए । नीले पर्वत के समान

Line 24:
शरीर धारण किये हुए एक करोड भालू उसकी सेवा में लगे हुए हैं । पूर्व काल में देवासुर

Line 25:
युद्ध के समय अपने युद्ध-कौशल का परिचय देकर उसीने इन्द्र से कितने ही वर प्राप्त

Line 26:
किये थे । युद्ध में वह धूर्जटि (शिव) से भी परास्त नही होता । उस घुरघर योद्धा सन्नादन
(Note: नही without dot on ही? Yes, नही होता).

Line 27:
को देखिए । उसका एक-एक पार्श्व भाग एक-एक योजन लंबा है और उसका शरीर भी

Line 28:
`उतना ही दीर्घ है । हे देव-शत्रु, उसकी सेवा

हे इन्द्रारि, यम के सदृश करोडो वानरो की सेवा प्राप्त करते हुए रहनेवाले उस गवाक्ष
को देखिए, वह युद्ध करने के लिए अत्यधिक उत्साह प्रकट कर रहा है। उस केसरी नामक
वानर को देखिए, जो उत्तुंग कांचन पर्वत का स्वामी है । उसके पास, धवल वर्णवाले,
उद्दण्ड पराक्रमी, सूर्य-सम तेजस्वी, तथा रण में भयंकर रूप धारण करनेवाले विविध रूपो
के दस सहस्र प्रख्यात वानर हैं । हे देवताओ के शत्रु, उस अद्वितीय पराक्रमी, महान् बल-
शाली, शतवली को देखिए, जो राम की कृपा प्राप्त करके उनके लिए अपने प्राण त्यागने
के लिए सतत सन्नद्ध रहता है । उसकी सेवा में सिंह-शावक को मात करनेवाले विशाल
पिंगल-नेत्रवाले सहस्र करोड वानर हैं । वही सुषेण है, जो अपने समान सहस्र करोड वानरो
को साथ लिये हुए युद्ध के लिए तैयार खडा है । वह उल्कामुख है, जो दस करोड वानरो
के साथ ठहरा हुआ है । यहाँ देखिए, यह ऋषभ है, और इसकी वानर-सेना दस करोड
की है । वह देखिए, वही विशाल भुजाओवाला गंधमादन है, जिसके अधीन सौ करोड
वानर हैं

२८८ रंगनाथ रामायण
आकाश को भी चूर-चूर कर देनेवाले हैं तथा पृथ्वी को भी टुकड़े-टुकड़े करने की क्षमता
रखते हैं । हे दशकंठ, उनका (क्रोध) शत्रुओं के लिए साक्षात् मृत्यु है । चूंकि, आप सीता
को ले आये, इसलिए वे युद्ध करने के लिए आये हैं, अन्यथा वे शरणागतों के, वज्र के
पिंजड़े के समान, रक्षक हैं, वे शूरों के भी शूर हैं । शरण की याचना किये बिना उनके
क्रोध का अंत नहीं होता । आपके ऊपर क्रोध करने के कारण ही उनकी आँखों में लालिमा
छाई हुई है । वे ही त्रिभुवनों के शासक सूर्यकुल-तिलक (राम) हैं ।
“वह देखिए, उनके भाई और शुद्ध स्वर्ण-वर्णवाले राम के अनुज लक्ष्मण धनुष धारण
किये खड़े हैं, अत्यंत आग्रह के साथ सप्त भुवनों को परास्त करने की शक्ति से संपन्न हैं ।
वे राम के प्राणाधार के समान हैं और उद्दण्ड पराक्रमी हैं । हे असुरेन्द्र, उस राजा राम
के पीछे आपके अनुज हैं, जो आपको युद्ध में परास्त करके लंका पर राज्य करने के
उद्देश्य से राम भूपाल के द्वारा राज्याभिषिक्त होकर बड़े आनंद से फूल रहे हैं । वे परम
धर्मानुसरण करनेवाले तथा नीतिवान् विभीषण हैं । हे देव, लक्ष्मण तथा विभीषण के
निकट ही जो खड़ा है, वह सुग्रीव हैं, जो सर्वमान्य गुणों से संपन्न हो किष्किन्धा का राज्य-
भार वहन कर रहा है । वह महनीय लक्ष्मी से संपन्न होकर स्वर्ण-माला धारण किये हुए हैं ।
वह दिग्तालबाहु तथा अत्यंत भयंकर शौर्य से विलसित हैं । उसकी सेना के बारे में
सुनिए । (कहते हैं कि) शतकोटि सहस्र संख्या का एक शंख होता है । ऐसे लाख शंखों
का एक महावृंद होता है और ऐसे लाख महावृंदों का एक पद्म होता है । एक लाख पद्मों
का महापद्म होता है और लाख महापद्मों का एक खर्व होता है । लाख खर्वों का एक
महाखर्व होता है, लाख महाखर्व एक समुद्र कहलाते हैं और लाख समुद्र महासमुद्र कहलाते हैं ।
लाख महासमुद्र, महदाख्य कहलाते हैं । बालि के अनुज के पास एक करोड़ महदाख्य सेना है ।
अब आप ही स्वयं विचार करके देख लें कि उनकी सेना कितनी बड़ी है । उसकी सेना
का आदि तथा अंत जानना असंभव है । उसके सामर्थ्य की समता और कोई सेना नहीं
कर सकती । वह सेना दुर्वार है । इसलिए हे देव, उस सेना से भिड़कर युद्ध करना असंभव है।”
शुक ने जब इस प्रकार कहा, तब रावण ने एक बार फिर सारी वानर-सेना का
पर्यवेक्षण किया और गर्भ में वडवानल प्रज्वलित होनेवाले समुद्र की भाँति मन-ही-मन
भयभीत हुआ, किन्तु अपने भय को दबाकर, निर्भीक की भाँति क्रोध प्रकट करते हुए कहा--
'अपने स्वामी की इच्छा के विरुद्ध, कोई मंत्री मंत्रणा देकर उसको विचलित करे,
यह कैसी नीति है ? तुम बिना विचार किये, मेरे सामने मेरे विरुद्ध इस प्रकार की बातें
कह रहे हो । क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ?' रावण के इतना कहते ही शुक तथा
सारण भयभीत हो, अपना सिर नीचा किये वहाँ से चले गये ।
३५. राम के माया-धनुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना
उनके चले जाने के पश्चात् रावण अपने अंतरंग सचिवों के साथ बड़ी देर तक
मंत्रणा करता रहा और फिर उन्हें विदा करके दुर्धर हो, विद्युज्जिह्व नामक एक राक्षस
को बुलाकर कहा-'तुम अपनी माया से राम के सिर तथा धनुष का निर्माण करके शीघ्र
ले आओ ।' वह तुरंत गया और अपनी सारी निपुणता तथा माया से बनावटी सिर तथा

धनुष का निर्माण करके ले आया । रावण ने उसे अच्छा पुरस्कार दिया । वहाँ से रमणीय
अशोकवन में जाकर दनुजेश्वर ने सीता को देखा । उस समय सीता सिर झुकाये अत्यन्त
चिंता में पड़ी, कातर दृष्टि से पृथ्वी को इस प्रकार देख रही थी, मानो वसुंधरा को कोस
रही हों कि हे माता, तुम मुझे इतना अधिक दुख क्यों दे रही हो ? उनकी आँखो मे
अविरल अश्रुधारा इस प्रकार वह रही थी, मानो उनके चित्त का क्रोध भीतर न रह सकने के
कारण धाराओ के रूप में बह रहा हो । उनका शरीर ऐसा धूलि-धूसरित था, मानो पृथ्वी
यह कहती हुई उनसे लिपट गई हो कि हे पुत्री, यह कैसा दुर्भाग्य है कि तुम ऐसी दुरवस्था
को प्राप्त हुई हो । वे इस प्रकार बैठी हुई थी, मानो रावण के क्रूर कर्म ही देवता का
रूप धारण कर यह निश्चय करके बैठा हो कि हे रावण, मै तुम्हारे तथा तुम्हारे राक्षस-
कुल का सर्वनाश करके ही यहाँ से उठूँगा । वे बार-बार ऐसे दीर्घ निःश्वास छोड़ रही थी,
मानो राक्षस-रूपी नीरस वृक्षो को विध्वस्त करने में प्रयत्नशील प्रलय-काल की अग्नि हो ।
अपनी ओर ध्यान दिये बिना बैठी हुई सीता को देखकर, सर्वनाश के लिए
उद्यत रावण ने कहा—'हे जानकी, मूर्ख तथा अविवेकी खरदूषण आदि राक्षसो का वध
करने मात्र से तुम राम के शौर्य का विश्वास करती हो और मेरे शौर्य को कभी अपने
मन में भी नही लाती । जब राम बडे दर्प से अपनी सेना के साथ समुद्र को पार करके,
वानरो के साथ सुवेलाद्रि पर सो रहा था, तब मेरे एक प्रिय सेवक ने उसका वध करके
उसके धनुष तथा सिर ले आया है । राम का प्रिय अनुज, तथा वानर परास्त होकर भाग
गये हैं । इसलिए हे कमलमुखी, तुम अब राघव की आशा छोड़ दो और मेरी तथा मेरी
स्त्रियो के लिए अधीश्वरी बनकर रहो ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् उसने विद्युज्जिह्व को बुलाकर, राम के सिर तथा
धनुष को सीता के सामने लाने की आज्ञा दी । तब उसने कहा—'हे सुंदरी, यह लो, राम
के सिर तथा धनुष ।' इतना कहकर वह उन दोनो को सीता के सामने फेंककर हँसते हुए
चला गया । उसी समय आकाशवाणी हुई—'राम भूपाल युद्धभूमि में असुर (रावण) का
सिर काटेंगे, यह तुम्हारे पति का सिर नहीं है । तुम विचलित मत होओ । तुम्हारे धर्मा-
चरण के प्रभाव से रामचंद्र अवश्य विजयी होंगे ।' (फिर भी) उस चचलाक्षी सीता ने
उस सिर को देखा और राम की आँखें, मुँह, ललाट, मौलि-रत्न की प्रभा, दंत-पंक्ति और
कर्ण-पुटों का सौंदर्य तथा अधरो की कांति का स्मरण करके उस सिर को राम का ही
सिर समझकर मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पडी, मानो पृथ्वी माता ही उस लतांगी
को अपने हृदय पर लिटाकर उन्हें सांत्वना दे रही हो कि 'यह मिथ्या है । तुम्हारे पति का कोई
अहित हो नही सकता । हे सुंदरी, यह माया है, इसकी ओर तुम्हें देखना नही चाहिए ।'
थोड़ी ही देर में सीता सँभल गई और शोकाग्नि से मतप्त होती हुई बोली--'हाय,
हे कैकेयी, कलह को जन्म देकर तुमने इस प्रकार इक्ष्वाकु-वश का सर्वनाश किया है ।
राघवेन्द्र ने तुम्हारा क्या बिगाडा था कि तुमने उन्हें अनावश्यक ही वन में जाने की
आज्ञा दी ? हे पृथ्वीपति, मैने पूर्ण विश्वास किया था कि आपने समुद्र पर सेतु बाँधा है,
और आप अवश्य मुझे छुड़ाकर ले जायेंगे, किन्तु मैं यह नही समझती थी कि भगवान्
३७

२६० रंगनाथ रामायण
मेरी ऐसी गति करेंगे । हे काकुत्स्थ, आपके और मेरे प्राण एक हैं, उस कथन को आप
इस प्रकार मिथ्या साबित कर रहे हैं, क्या, यह आपके लिए उचित है ? हे सूर्यकुल-
तिलक, पति से पहले ही प्राण देने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला । आप भले ही जायें,
मैं भी तुरंत ही अपने प्राण आपके पास भेज दूँगी । पृथ्वी मेरी माता है और आप मेरे
पति हैं । क्या, आपके लिए यह उचित है कि आप मुझे पुन वसुधा की गोद में पहुँचा दें।
अग्निदेव के समक्ष आपने मेरे पिता से मुझे ग्रहण किया था । अब इस प्रकार आपका
मुझसे विलग हो जाना, क्या आपके लिए उचित है ? हे राम, न जाने क्यों आपको इस
दशा में देखकर भी मेरा हृदय सतप्त नहीं हो रहा है । मेरा हृदय जब मतप्त नहीं होता,
तो निश्चय ही आपकी यह दशा नहीं हुई होगी ।' इस प्रकार सोचती हुई सीता विलाप-
करने लगी ।
उसी समय द्वारपालों ने आकर दनुजेश्वर से निवेदन किया—'हे देव, किसी अत्यंत
आवश्यक कार्य के उपस्थित होने से आपके मंत्री सभा-स्थल में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
उनका संदेश लेकर आये हुए प्रहस्त आदि राक्षसवीर द्वार पर खड़े हैं ।' यह सुनकर
रावण तुरंत सभास्थल के लिए रवाना हो गया । उसके जाते ही, वे माया सिर तथा
धनुष भी ऐसे अदृश्य हो गये, मानो रावण की लक्ष्मी भी इसी प्रकार शीघ्र ही अदृश्य
हो जायगी । सभास्थल में पहुँचकर रावण ने जब गुप्तचरों से सुना कि राम शीघ्र ही
आक्रमण करने का यत्न कर रहा है, तब उसने बड़े धैर्य के साथ ढिंढोरे पीटकर नगर में
इन समाचार को प्रकट कराने का आदेश दिया और अपनी सेना को एकत्रित करने के
लिए वेत्रधरों को भेजा ।
यहाँ सरमा सीता को देखकर कहने लगी—'हे माता, तुम ऐसे क्यों प्रलाप करती हो ?
रावण की बातें सत्य नहीं हैं, उन्हें मिथ्या जानो, क्या तुम इतना भी नहीं जानती
कि तुम्हारे सामने जो सिर फेंका गया था, वह माया का सिर था । इस राक्षस के दुर्वचन
सुनकर मैं सत्य समाचार जानने के लिए गई थी । मेरी बातें सुनो । राम युद्ध करने के
लिए आ रहे हैं । यह समाचार सुनते ही देवताओं का शत्रु (रावण) विचलित हो उठा ।
वह सुनो, ढिंढोरे का शब्द हो रहा है । राक्षसों के भयंकर रथों के दौड़ने की ध्वनि सुनो।
लो, वह सुनो, रथिकों तथा सारथियों के संभाषणों की ध्वनि सुनाई पड़ रही है । इसलिए
हे कुटिल-कुंतले, तुम चिंता मत करो । राम पर किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आई है ।'
इसी समय लंका को विदीर्ण करनेवाले गर्जन के साथ आनेवाली वानर-सेनाओं को
देखकर रावण ने चिंताग्रस्त चित्त से अपने मंत्रियों को शीघ्र बुलाकर कहा—'वह देखो,
राघव युद्ध करने के लिए आ रहा है । तुम अब अपनी अमित शक्ति का परिचय देते
हुए शीघ्र जाओ और उन दोनों मानवों को मारकर, वानर-सेना का वध कर डालो ।
जाओ, शीघ्र जाओ ।'
३६ माल्यवान् का हितोपदेश
तब रावण को देखकर नीतिवान् माल्यवान् ने कहा—'हे राजन्, उचित समय में
संधि कर लेना श्रेयदायक होता है और उचित समय पर वैर ठानना शुभ-प्रद होता है ।

जो नीतियुक्त कार्य करता है, उस राजा के राज्य की सतत वृद्धि होती रहती है ।
नीच व्यक्ति से विग्रह और बलवान् से संधि करना विबुध-जनो का उपदेश है । सूर्यवंश-
तिलक हमसे अधिक बलवान् है, देवताओ के कार्य के लिए उन्होने पृथ्वी पर जन्म लिया है।
दैवबल भी उन्ही को प्राप्त है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वे धर्मात्मा है ।
उन्हें ऋषियो के सतत आशीर्वाद प्राप्त है । तुम तो सदा देवताओ को पीडित तथा ब्राह्मणो
का नाश करते हुए पाप-चिंता में लीन रहते हो । विजय सदा धर्म की ओर ही झुकी
रहती है, अधर्म की ओर नही । उस दिन तुमने ब्रह्मा से अन्य सभी लोगो के हाथो से
न मरने का वर प्राप्त किया था, किन्तु इस प्रकार तुम पर आक्रमण करनेवाले नर तथा
वानरो पर विजय पाने का वर प्राप्त नही किया है । किसी भी रीति से देखा जाय,
उनके हाथो से तुम्हारा नाश निश्चित है। इतना ही क्यो, होनहार की सूचना देनेवाले
कितने ही शकुन दिखाई पड रहे है । विपुल होम-धूम त्रस्त-सा हो गया है । राक्षसो के
तेज का अंत-सा हो रहा है। हमारे गृहो में कई प्रकार की विपत्तियो का जन्म हुआ है ।
इसलिए तुम जान लो कि वे (राम) आदिनारायण है और ऐसा करने के लिए (तुम्हारा
वध करने के लिए) इस संसार में जन्मे है । राम से विग्रह तुम्हें शोभा नही देता ।
इसलिए तुम अपना हठ छोड़ दो । राम का शर औद्धत्य का सहन नही करता ।
अतः हे दानवेन्द्र, सीता को ले जाकर राम को सौंप दो और अपने वंश की
रक्षा करो ।'
तब रावण ने माल्यवान् को रोषपूर्ण नयनो से देखकर कहा--'मै अद्वितीय
प्रताप और दक्षता से संपन्न तथा सतत विजयी होनेवाला हूँ । तू मेरे सामने मेरे शत्रु की
प्रशंसा कर रहा है । अब मै तुझे क्या कहूँ ? तू कभी अपनी कायरता नही छोड़ता ।
भला, मै सीता को क्यो देने लगा ? मुझे किसका भय है कि मै सीता को दे दूँ ?'
उसके उद्धत वचनो को सुनकर माल्यवान् ने कहा--'मेरी बातो का अनादर करके तुम
रामचन्द्र को युद्ध में कैसे जीतते हो, यह मैं भी देखूँगा । हम जायेंगे कहाँ ? (इन्ही
आँखो से) देखेंगे ही।' इस प्रकार क्रोध में आकर माल्यवान्, कुछ और परुष वचन कहते
हुए, वहाँ से चला गया ।
उसके पश्चात् असुरेन्द्र ने पहले, अनुपम पराक्रमी प्रहस्त को पूर्व के द्वार की रक्षा
के लिए भेजा, अक्षीण बली महोदर तथा महापार्श्व को दक्षिण के द्वार पर भेजा, अपने
पुत्र इन्द्रजीत को पश्चिम के द्वार पर नियुक्त किया, उत्तर द्वार की रक्षा के लिए शुक
तथा सारण को नियुक्त किया और नगर के मध्य भाग की रक्षा के लिए विरूपाक्ष को
आज्ञा दी । इस प्रकार, लंका के रक्षण की समुचित व्यवस्था करके रावण अन्तःपुर में
चला गया ।
वहाँ राम ने सुग्रीव विभीषण, अंगद, जाम्बवान्, सुषेण, नील, नल, हनुमान्, गवाक्ष
आदि वानरो को, (उनसे) परामर्श करने के लिए बुलाया और कहा-'अब हम सब प्रकार
के अवगुणो का आगार, तथा देवताओ के शत्रु रावण की लंका का पर्यवेक्षण करें । देखो,
उस एक दुष्ट के कारण उसका सारा वंश नष्ट होनेवाला है ।'

५६२ रंगनाथ रामायण
३७ सुवेलाद्रि पर से राम-लक्ष्मण का लंका को देखना
इतना कहने के पश्चात् राम ने अपने अनुज तथा सुग्रीव आदि वानरों के साथ
सुवेलाचल का आरोहण इस प्रकार किया, मानो कह रहे हों कि गुणवान् आदमी अपने वंश
में इसी प्रकार उन्नति के शिखर पर चढ़ता है । वहाँ से उन्होंने अपने हाथों से नष्ट होने-
वाली उस लंका को देखा । उस नगर के गोपुरों पर जड़ी हुई मणियों की प्रभा इतनी
उज्ज्वल थी, मानों हनुमान् ने जो अग्नि लगाई थी, वह उस दिन तक वैसे ही दीप्त
हो रही हो । बड़े-बड़े कंगूरों से युक्त उस नगर का प्राकार, ऐसा दीख रहा था, मानो
राम के बाणों के प्रहारों से संभ्रमित एवं परितप्त होनेवाले रावण-रूपी मृग को भाग
जाने से रोकने के लिए ही प्रलयकाल के यम-रूपी शिकारी ने चारों ओर से घेरा लगा
दिया हो ।
उस दुर्ग की मीनारों पर दीखनेवाली चित्र-विचित्र ध्वजाएँ तथा तोरण ऐसे दीख
रहे थे, मानो मीनारें-रूपी स्त्रियाँ सूर्य के प्रकाश में उज्ज्वल दीखनेवाले सुंदर तोरण-रूपी
मंगल-सूत्रों से अलंकृत हों, सुंदर ध्वजाएँ-रूपी अपने हाथों को हिलाती हुई (राम का)
स्वागत कर रही हों—'हे राम, रावण का संहार करने के लिए शीघ्र चले आओ ।' उस
दुर्ग की परिखाएँ इतनी विशाल एवं गहरी थीं, मानो रावण-रूपी जंगली भैंसे को पकड़ने
के लिए यम ने अनुकूल खड्डे खोद रखे हों । नगर के उज्ज्वल सौध आकाश का स्पर्श
करते थे और ऐसे दीख रहे थे, मानो रावण ने कैलास पर्वत को उखाड़कर और उसे यहाँ
लाकर सुंदर ढंग से फिर से उसका निर्माण किया हो । उस नगर से तुरही की ऐसी
ध्वनि निकल रही थी, मानो लक्ष्मी राम के स्वागतार्थ आ रही हों । उस नगर में कितने
ही ऐसे उपवन थे, जिनके असंख्य वृक्ष शुकों की बोली से हर्षित होते, भ्रमरों के गुंजन से
आनंदित होते, कोयलों के कल-कूजन से संतुष्ट होते, सुंदर सारिकाओं के संचालन से दीप्त
होते, शाखाओं और मन-रूपी पल्लवों को राग-रंजित करते तथा सतत व्याप्त होनेवाले पुष्पों
के सुगंध-भार से महक रहे थे । उस नगर के कमलाकर कमला (लक्ष्मी) के मन-कमल
के समान थे । ऐसे नगर को आश्चर्य से देखनेवाले राघव को अपने प्रताप का ताप प्रदान
करके भगवान् सूर्य पश्चिम समुद्र में डूबने लगे । तब राम ने उन्हें प्रणाम किया और
सुवेलाद्रि पर ही उन्होंने रात्रि बिताई ।
प्रातःकाल होते ही सभी कपि अत्यधिक हर्ष से विनोद करते हुए उस पर्वत के
जंगल में शीघ्र गति से चले गये और वहाँ अपने भयंकर निनादों से सिंह तथा हाथियों
को भगाने लगे । उनके निनाद राक्षसों की अस्थियों को कँपाते हुए सारी लंका में व्याप्त
हो गये ।
इस ध्वनि को सुनकर रावण यह जानने की इच्छा से कि वह कैसी ध्वनि है, अपने
सौध के कंगूरे पर चढ़कर देखने लगा । उस समय उनके साथ उस कंगूरे की शोभा
अत्यंत उज्ज्वल दीख रही थी । परिचारक-गण उनके ऊपर धवल छत्रों की छाया कर
रहा था; धवल चँवर डुला रहा था । ऐरावत के दाँतों के प्रहार का सहन किये हुए उनके
वक्ष पर मणिमय हार डोल रहे थे । इस प्रकार के वैभव से युक्त वह विविध राक्षसों से