रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 303, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड २७३
२३ राम का समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना
इस प्रकार राम के प्रार्थना करने पर समुद्र, गर्व से फूलकर, उत्तुंग तरंग-रूपी
अपनी बाहुओ को हिलाते हुए, अपने धवल फेन-रूपी हँसी को बिखेरते हुए विशाल मीन-
रूपी जिह्वा को फैलाते हुए, अपने गंभीर घोष से अट्टहास करते हुए, अपने वेला-जल से
दिशाओ को यह वृत्तांत सुनाते हुए तथा अपने मध्य भाग के भँवरो से अपनी वक्रता दिखाते हुए,
राम की बातो की उपेक्षा करने लगा । यह सत्य ही तो है कि मूर्ख, दुर्जन, क्रूर-
कर्मी, तथा कुल-नाशक, कभी प्रार्थना करने से नही झुकते । प्रार्थना सुनकर वे और भी
भडक उठते हैं । प्रेम से उससे मिलने जाइए, तो वे मन को अशान्त बनानेवाली विष-वृष्टि
करने लगते हैं ।
समुद्र को अपनी प्रार्थना अस्वीकार करते हुए देखकर राघव के विशाल नेत्रो से
अग्नि-कण छिटकने लगे और उनकी भौहें तन गई । वे अत्यंत क्रोध से वार-वार समुद्र
और फिर लक्ष्मण की ओर देखकर बोले—'हे लक्ष्मण, इस समुद्र का गर्व तो देखो ।
मैं इससे कितनी बार प्रार्थना करता हूँ । फिर भी, यह मेरी प्रार्थना को स्वीकार नहीं करता ।
स्वीकार कराये बिना में थोडे ही इसे छोड़ दूँगा ? क्या, इसका वडवानल इतना तेजस्वी है
कि मेरी बाणाग्नि उसे निस्तेज न बना सकती । समुद्र भी देख ले कि मेरे बाणो में
कितनी शक्ति है । मैं अपने बाणो की अग्नि-ज्वालाओ से सारे समुद्र के जल को इस
प्रकार ढक दूँगा कि मानो वे उस समुद्र की हड्डियाँ हो । उन बाणो के तीक्ष्ण ताप के
कारण, बडे-बडे मकर, सर्प, मीन, गेंडा, कच्छप, कर्कट, मेंढक, जल-मानुष आदि का समूह
परस्पर एक दूसरे से टकराते हुए प्राण-रक्षा के लिए भाग खड़े होगे और तिमिगिल,
बलवान् जल-राक्षस, जल-ग्रह तथा पर्वत आदि का भी सर्वनाश हो जायगा । मैं उस समुद्र
की ऐसी धूल उड़ाऊँगा कि समस्त जलचरो का सचलन वद हो जायगा और सीप तथा घोंघे
बाहर निकल आयेंगे । मैं इसको लक्ष्मी का पिता, हरि का श्वशुर समझकर ही अबतक
चुप रहा । हे सौमित्र, मैं इसके लिए समुद्र मे प्रार्थना ही क्यो करूँ ? अपने-आपको
मैं इसके सामने शक्तिहीन क्यो समझू ँ ? लाओ मेरे धनुष-बाण और देखो कि यह समुद्र
मेरे बाणो से कैसे सूखता है । मैं अभी समुद्र में रहनेवाले प्राणियो को चूर-चूरकर
देता हूँ ।
इस प्रकार कहते हुए जब राघव ने धनुष हाथ में लिया, तब तुरत इन्द्र कपित
हुआ, आकाश थरथराने लगा, समुद्र आलोड़ित हुए, दिग्गज स्तभित हो रह गये,
पृथ्वी धँस गई, पर्वत-शिखर टूटकर गिरने लगे, ब्रह्मा चकित रह गया, नक्षत्र गिरने
लगे और दिशाएँ चकराने लगी । सूर्यवंशतिलक राम ने अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए,
प्रलय के समय प्रयुक्त करनेवाले यम के काल-दण्ड के समान, उज्ज्वल तथा प्रलयकाल
की अग्नि के समान दीप्त होनेवाले बाणो का अपने धनुष पर संधान किया और उन्हें
समुद्र पर चलाया । तब समुद्र की लहरें पर्वतो का आकार धारण करके आकाश का अंग
स्पर्श करने लगी, मानो समुद्र यह कहते हुए वाणो से बच रहा हो कि मैने अत्यधिक घमण्ड
दिखाया, मुझ पर कृपा करो । उन उत्तुंग लहरो पर इतना अधिक फेन दिखाई पडने लगा,
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