रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ रंगनाथ रामायण
ताप से उस प्रदेश का सारा जल सूख गया । तब राम ने उस देश को सब प्रकार से
समृद्ध रहने का वर दिया, तब से वह प्रदेश उसी प्रकार सुशोभित रहता है । इसके
पश्चात् राम का शर फिर उनके तूणीर में लौट आया और समुद्र पूर्ववत् शांत हो गया ।
तब समुद्र ने अत्यंत विनय के साथ राघव से कहा—'हे भूपाल, पूर्वकाल में आपके
वंश के सगर-पुत्रों के द्वारा निर्मित होने के कारण मैं सागर नाम से विख्यात हुआ ।
इतना ही नहीं, मैं आपके वंश के लिए मान्य रहा हूँ । देव-दानव-युद्ध के समय आपके
पिता मुझे अयोध्या ले गये थे और बड़े आदर-सत्कार के साथ वहाँ से विदा किया था ।
इस प्रकार, मेरा और आपका संबंध (बहुत पुराना) है । इसलिए हे राघवेन्द्र, आप सेतु
बाँधिए और वानर सेना को उस पार ले जाइए ।"
२५ सेतु-बंधन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देना
तब रघुराम सूर्यनंदन को देखकर बोले—'हे सुग्रीव, सेतु बनाने के लिए शीघ्र
श्रेष्ठ वानरों को भेजो ।' सुग्रीव ने बड़े उत्साह से योग्य वानरों को इस कार्य के लिए
नियुक्त किया । अंगद, जाम्बवान्, नील, गज, गवाक्ष, पनस, नल, पावकनेत्र, तपन, तारू,
गवय, ऋषभ, गंधमादन, शरभ, द्विविद, शतबलि, हरिरोमवक्ष, सुषेण, केसरी, ज्योतिर्मुख,
दधिमुख, वेगदर्शी आदि श्रेष्ठ वानर-वीर समुद्र के निकट गये और शीघ्र गति से बड़े-बड़े
वृक्षों तथा पर्वतों को ले जाकर समुद्र में डालने लगे । लेकिन, उनमें कोई भी जल पर
तैरता नहीं था, सब जल में डूब जाते थे । तब सब वानर आश्चर्यचकित होकर राम के
पास लौट आये और सारा वृत्तांत कह सुनाया । रामचंद्र भी आश्चर्यचकित होकर समुद्र
से बोले—हे समुद्र, यह कैसी बात है कि इन कपि-वीरों के द्वारा फेंके गये वृक्ष तथा पर्वत
पानी पर तैरते नहीं हैं ? यह सुनकर समुद्र बोला—'हे परमेश, वानर जिन वृक्षों को जल
में फेंकते हैं, उनके समुद्र-तल में पहुँचते ही जलचर उन्हें शीघ्र निगल जाते हैं । समुद्र
के तल में शतयोजन विशाल आकारवाला तिमि नामक मत्स्य रहता है, जो सभी जलचरों
को खा जाता है । उन मत्स्य को तिमिंगिल निगल जाता है । हे देव, इस प्रकार एक
दूसरे को निगल जानेवाले दीर्घ आकारवाले असंख्य मत्स्य समुद्र में रहते हैं ।"
इन बातों को सुनकर राम बोले—'हे समुद्र, ऐसी दशा में समुद्र पर सेतु बाँधने
का क्या उपाय हो सकता है, बताओ ।' तब समुद्र बोला—'हे सूर्यवंश-तिलक, आप सेतु
बाँधने के लिए नल को भेजिए । यह महान् विश्वकर्मा का पुत्र है । इसका उपाय वही
जानता है । अपने पिता से उसने यह कला जान ली है । उसके सिवा और किसी से यह
सेतु बाँधा नहीं जा सकेगा । इसका एक और कारण भी है, सुनिए । बहुत पहले की बात है
कि यह अपनी बाल्यावस्था में विंध्याचल के निकटवर्ती वन में पशुकर्ण नामक मुनि के
समीप खेल रहा था । मुनि स्नान आदि अनुष्ठान करने के लिए चले गये, तो इसने मुनि
की सभी पूजा-मूर्तियों को अपने मुँह से धक्का देकर समुद्र में फेंक दिया । जब मुनि वहाँ
लौटकर आये, तब सारा वृत्तांत उन्हें मालूम हुआ । इस पर वे बहुत ही क्रुद्ध हुए, किन्तु बालक
होने के कारण उसे दण्ड नहीं देना चाहते थे । मुनि अपनी खोई हुई वस्तुओं को पुन
प्राप्त करने का उपाय सोचने लगे । उस तपोधन ने अच्छी तरह सोच-विचारकर, अपनी