रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी शरण की याचना करो । वे शरणागत शत्रु की भी उसी प्रकार रक्षा करते हैं, जैसे
(उन्होंने) गजेन्द्र की रक्षा की थी ।"
कैकसी के हितोपदेश को सुनकर रावण क्रुद्ध होकर बोला—'हे माता, मैंने पचास
लाख वर्ष तक अबाध-गति से राज्य किया है और सब प्रकार के सुखो का अनुभव किया है।
मैं स्वप्न में भी किसी से नही डरता । इन नर और वानरो की शक्ति ही कितनी है ?
क्या, ये देवताओ से भी अधिक शक्तिशाली है ? मै अवश्य इन्हें जीत लूँगा । यदि मैं
उन्हें जीत नहीं सका, तो राम के बाणो से मारा जाऊँगा । किन्तु, इन नीच मानवो के
सामने अपना सिर नही झुकाऊँगा । यह सत्य है । हे माता, आप ऐसा उपदेश मत दीजिए
आप रनवास में लौट जाइए । आप लाख कहें, तो भी मैं सीता को नही लौटा सकता ।'
कैकसी इस प्रकार कहनेवाले अपने पुत्र की निंदा करती हुई अपने अत पुर में चली गई
और विचार करने लगी, 'होनहार बलवान् है, वह किसी भी प्रकार से टाला नही जा
सकता ।' यो विचार करके वह सतत धर्माचरण में लीन रहती हुई अपना समय व्यतीत
करने लगी ।
रावण ने भेरियो तथा नगाडो के अत्यधिक निनाद के द्वारा सारी राक्षस-सेना को
एकत्रित किया और आयुधो से सज्जित अपने प्रताप से दीप्त, मत्रियो को देखकर अत्यत
भयकर रूप धारण करके, आँखो मे अग्नि-वर्षा करते हुए कहने लगा—'रामचन्द्र सेतु को
बाँधकर अत्यधिक शौर्य के साथ मुवेलाद्रि पर आकर ठहरा हुआ है । जब मेरा शत्रु मेरे
ऊपर आक्रमण करने के लिए आ रहा है, तब तुम्हारा इस प्रकार उपेक्षा करके सोते रहना,
क्या उचित है ? पर तुम्हें क्यो दोष दूँ ? तुम मन्त्री हो, ऐसा सोचकर तुम पर विश्वास
करना मेरी ही भूल है । क्या, तुम सोचते हो कि तुम्हारे उपेक्षा करने से मेरी हानि होगी ।
ऐसा कभी नही होगा । साम, दान, भेद आदि उपायो से यदि मैं उसे अपने वश में ला नही
सकता, तो मे राम के साथ घोर युद्ध करूँगा ।'
रावण ने जब ऐसा कहा, तब सभी राक्षस लज्जित होकर सिर झुकाये चुप हो रहे ।
जब रावण ने उन्हें डाँटकर कहा कि तुम लोग चुप क्यो हो, तब इन्द्रजीत अपना शौर्य दिखाते
हुए कहने लगा--"हे देव, समस्त देवताओ पर विजय पानेवाले आपको इन राम-लक्ष्मण
जैसे अकिंचनो के द्वारा कौन-सी हानि पहुँच सकती है ? आप चिंता मत कीजिए । मे
वल, साहस तथा शौर्य से सपन्न हूँ । क्या, आप नही जानते कि मैने इन्द्र को नाग-पाश
से बाँधकर उसकी कैसी दुर्गति कर दी थी ? भीषण रण में कालकेय आदि राक्षसवीरो
को क्या मैने परास्त नही किया था ? तब हे दनुजेश, साधारण मानव, कृश, तपस्वी
तथा दुर्बल दशरथ-पुत्रो को युद्ध में मार डालना मेरे लिए कौन वडी बात है ? आप सदेह
मत कीजिए; में अवश्य उन्हें युद्ध में मार डालूँगा ।"
तब अतिकाय नामक राक्षस ने राक्षसराज से कहा—'हे दानवनाथ, जो राजा
नीतिवान् होकर, दूसरो की संपत्ति की अभिलाषा किये बिना सम्पन्न समाज की प्रशसा
प्राप्त करते हुए, जीवन-यापन करता है, वही सदा राज्य-पालन करेगा । हे दनुजेश्वर, सूर्य-
कुल-तिलक राम ने तुम्हारा क्या अपकार किया है ? उनकी स्त्री पर आपकी आसक्ति