रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुस्कान-रूपी चन्द्रिका से दीप्त होनेवाले मुँह से विलसित होते हुए पुल पर खडे होकर
सेतु के निर्माण का कार्य देखते रहे । कपि सब बडे-बडे वृक्षो तथा पहाडो को बड़े साहस
के साथ उखाडकर ले आने थे और नल के हाथ में देते थे, नल उन्हें लेकर पुल में लगा
देता था । इसी समय एक गिलहरी ने सोचा—‘सेतु का निर्माण शीघ्र ही पूरा होना चाहिए
इसलिए मै भी इन बलवानो की सहायता करूँगी ।’ यो सोचकर उसने राम के चरण-
कमलो का मन-ही-मन स्मरण करके, उनके समक्ष ही वडी भक्ति के साथ समुद्र में गोता
लगाया, फिर वह समुद्र-तट पर बालू में लोट गई, उसके पश्चात् पुल पर आकर अपने
शरीर पर लगी रेत को झटका देकर गिराने लगी । इसी प्रकार, वह बार-बार समुद्र
में गोता लगाती, बालू में लोटती और तुरंत आकर पुल पर अपने शरीर पर लगी रेत
को गिरा देती । राम बडी देर तक गिलहरी का यह कार्य देखते रहे । फिर, उन्होने अपने
अनुज को देखकर कहा—‘हे लक्ष्मण, वहाँ देखो, एक गिलहरी मेरी भक्ति से प्रेरित होकर
अपना शरीर जल से भिगो रही है । फिर, तट पर पहुँचकर रेत में लोटती है और फिर
अपने शरीर में लगी रेत को पुल पर गिरा देती है । जहाँ श्रेष्ठ बलशाली वानरवीर
वृक्षो तथा पर्वतो को लाकर गिराते है, वहाँ अपनी अल्प शक्ति का विचार किये बिना ही
वह बडे प्रेम से अपनी शक्ति के अनुरूप सहायता कर रही है ।’ तब लक्ष्मण ने कहा-
‘हे सूर्यवंश-तिलक, मैने जान लिया कि जो आपके चरण-कमलो में अपना मन स्थापित
करके एक तृण भी अर्पित करता है, आप उसे मेरु पर्वत के समान ही मान प्रदान करते हैं।
इसलिए हे अनघ, आपकी भक्ति ही प्रधान है ।’ तब राम ने सुग्रीव से कहा—‘उस गिलहरी
को देखने के लिए मेरी बडी इच्छा हो रही है । उसे प्रेम से यहाँ ले आयो ।’ तब सुग्रीव
उस गिलहरी को पकड़कर ले आया और राम के हाथो में दे दिया । राम ने कई प्रकार
से उसकी प्रशसा की और बड़े हर्ष से अपना सुदर दाहिना हाथ उसकी पीठ पर फेरा ।
उसके पश्चात् उन्होने लक्ष्मण, सागरेश्वर, विभीषण तथा सुग्रीव के समक्ष उसे छोड़ दिया ।
वह गिलहरी थोडी देर तक वही इधर-उधर विचरती रही । फिर, राम ने उसे चंदन,
मदार, चपक, पूगीफल, पुन्नाग, सहकार आदि वृक्षो से युक्त सुदर प्रदेश में छोड़ देने
का आदेश दिया ।
२९. सेतु को देखकर राम का हर्षित होना
तदनंतर हनुमान्, अगद, नील, हरिगोम, आदि वानरश्रेष्ठो के साथ राम आश्चर्य-
चकित करनेवाले उस विशाल सेतु पर खड़े होकर कहने लगे—‘वाह ! नल कितना निपुण है !
उसने समुद्र के दूसरे छोर तक एक विशाल चबूतरे के समान इस पुल का निर्माण
किया है । अपनी कला-निपुणता तथा अपने बाहुबल को प्रदर्शित करके उसने इस दीर्घ
सेतु को बांधा !’
नल द्वारा निर्मित वह सेतु शत योजन लबा और दस योजन चौडा था और मलय
पर्वत तथा सुवेलाद्रि का स्पर्श करता हुआ बहुत सुदर दीख रहा था । समुद्र में उछल-कूद
करनेवाले बडे-बडे मत्स्य-समूह-रूपी दीप्त नक्षत्रो तथा दोनो ओर व्याप्त नील समुद्र-
रूपी नील गगन के साथ वह सेतु आकाश-गंगा के समान सुशोभित हो रहा था ।