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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 311

'राम भूपाल ने दया करके मुझे अभयदान दिया है'—ऐसा सोचकर मानो फूल उठनेवाले उस
विशाल समुद्र को देखकर कपि भी (अपने कार्य की सफलता देख) आनंद से फूलने लगे ।
आकाश से देवता (रामचन्द्र के) पराक्रम के परिणाम को देखकर मन-ही-मन यह विचार
करके हर्षित होने लगे कि, सच ही तो है, नीच व्यक्ति कभी मृदुवचनों से बात नहीं
मानता । वह केवल दंड के भय से, वश में लाया जा सकता है । रामचन्द्र ने जब समुद्र
से विनय के साथ प्रार्थना की, तब समुद्र ने उनकी उपेक्षा की । फिर, सूर्यवंश-तिलक ऐसा
क्यों नहीं करें ? जो व्यक्ति इस सेतु का स्मरण-मात्र करेगा, जो इस सेतु का दर्शन करेगा,
उसे विजय, यश तथा पुण्य की प्राप्ति होगी। जबतक यह सेतु स्थिर रहेगा, जबतक यह समुद्र रहेगा,
तबतक राघव की कीर्त्ति स्थिर रहेगी और दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई वह आनंद प्रदान करती रहेगी ।
इस प्रकार, मन-ही-मन हर्ष-पुलकित होते हुए उन्होंने फूलों की वृष्टि की और
देव-दुंदुभियां बजाईं । तब रघुराम आनंदित होकर सेतु को देखते हुए बोले—'यह सेतु
अनंतकाल तक नल के नाम पर विख्यात होते हुए सुशोभित रहेगा ।' प्रभु के वचन सुनकर
सभी कपिवीरों ने नल की प्रशंसा की । तब समुद्र, सेना के साथ राम को अपने निवास
स्थान ले गया और अत्यंत भक्ति के साथ उन्हें दिव्यास्त्र, दिव्य वस्त्र, दिव्य भूषण तथा
वज्र-कवच प्रदान किये और निष्कलंक चित्त से रामचंद्र को देखकर कहा—'हे राम भूपाल,
आप राजपुत्र हैं । युद्ध के समय आपका यह मुनि-वेश क्यों ? अब उचित यही है कि
आप इन दिव्य-वस्त्र तथा आभरणों को धारण करें ।'
३०. राघवों का सुवेलाद्रि पर पहुँचना
तब राम-लक्ष्मण ने दिव्य वस्त्राभरणों, चंदन तथा पुष्प-मालाओं को धारण किया
और रविचंद्र के समान दीप्तिमान् होने लगे । समुद्र ने उन्हें आशीर्वाद देकर विदा किया ।
तब राम-लक्ष्मण हनुमान् तथा नील के कंधों पर बैठकर (सुवेलाद्रि के लिए) रवाना हुए।
सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे, समस्त लोक उनकी जयजयकार करने लगा । रामचंद्र ने
समुद्र को अनुमति देकर उसको घर भेज दिया और अपने अनुज के साथ लंका की ओर मुँह
करके सेतु के मार्ग से ऐसे रवाना हुए, मानो रमणीय राक्षस-लक्ष्मी के सीमंत पर ही चरण
धरकर चल रहे हों । विभीषण गदा हाथ में लिये हुए कपि-सेना के आगे-आगे चलने
लगा । निदान पराक्रमी राम अपने मंत्रियों के साथ सुवेलाद्रि पर पहुँच गये और वहाँ
शिविर डाल दिये । राम के पीछे-पीछे उनकी विशाल वानर-सेना चली। कुछ लोग सेतु
के किनारे-किनारे चल रहे थे, तो कुछ सेतु के बीचोबीच जा रहे थे, कुछ वानर बड़े
कौतुक के साथ आकाश-मार्ग से जा रहे थे, तो कुछ झुंड बनाकर जा रहे थे, कुछ समुद्र
में तैरते हुए जा रहे थे, तो कुछ अपने समूह से विछुड़कर आगे पीछे-दौड़ रहे थे । उस
सेना के हुंकार तथा गर्जनों की ध्वनि ने समुद्र-घोष को भी दबा दिया । उस ध्वनि के
प्रभाव से आकाश-पाताल तथा दिशाएँ कंपायमान होने लगीं । इस प्रकार, राघव ने अपनी
सेना के साथ सेतु की यात्रा पूरी करके सुवेलाद्रि पर पड़ाव डाल दिया । अपने गुप्तचरों
के द्वारा राम के आगमन का वृत्तांत जानकर रावण ने समस्त दानवों को अपनी राज-सभा
में बुलाया और स्वयं नवरत्न-खचित सिंहासन पर आसीन हुआ ।
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