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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 508 में से

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पृष्ठ 309

जब मध्याह्न हुआ, तब वानर अपनी थकावट मिटाने के लिए वृक्षो की छाया में
गये और मीठे फल खाते तथा ठंडा जल पीते हुए थोड़ी देर वहाँ विश्राम करते रहे ।
उसके पश्चात् वे अत्यधिक उत्साह से काम में लग गये । वे एक दूसरे से कहते-'तुम
इन पहाड़ो को ले आओ, तुम उन पर्वतो को उखाडकर ले आओ ।' इस प्रकार, एक
दूसरे को बढावा देते हुए असंख्य वृक्षो, तथा पर्वतो को ला-लाकर वे नल को देते थे ।
कुछ वानर पर्वतो को सीधे समुद्र में ही गिरा देते थे, कुछ बीच रास्ते में ही दूसरो का
बोझ अपने सिर पर ले लेते और कुछ अपना बोझ ले आकर नल के निकट रख देते थे ।
इस प्रकार, दूसरे दिन उन्होने छब्बीस योजन लंबा पुल बनाया । तब सूर्यास्त हुआ ।
तब सुग्रीव आदि वानर, रामचन्द्र को अपने कार्य की प्रगति का वृत्तांत सुनाकर समुद्र-तट पर
अपने निवासो में लौट आये और रात को बडी शान्ति के साथ सो गये । दूसरे दिन प्रात -
काल ही उठकर वे बडे उत्साह से सेतु बाँधने चले । वे एक दूसरे से स्पर्धा करके कहते
जाते थे कि हम अकेले सभी पर्वतो को उठा लायेंगे । हम ही सब वृक्षो को उखाडकर
लायेंगे । इस प्रकार, होड लगाकर वे चारो दिशाओ में बिखर गये । कुछ लोग वृक्षो तथा
पर्वतो को ले आकर समुद्र में डालते थे, कुछ निरीक्षण करते थे, कुछ पेड़ो की छाया में
बैठकर सुस्ताते थे, कुछ लोग बने हुए सेतु की लंबाई नापते थे, कुछ लोग जहाँ-तहाँ
बैठकर ऊँघते थे, कुछ लोग ठंडे जल से अपनी प्यास बुझाते थे । इस प्रकार, वे सब
अत्यधिक क्लान्ति का अनुभव करने लगे । तब सूर्य, चन्द्र के समान शीतल प्रकाशित होने
लगा । इन्द्र अमृत का फुहारा बरसाने लगा । पवन शीतल होकर चलने लगा । पुष्प-सौरभ
आनंद पहुँचाने लगा । तब वानर अत्यत उत्साह से वृक्षो तथा शैलो को लाकर समुद्र में
डालने लगे । उनकी उद्धत गति से भीत होकर समुद्र के सभी जीव, अपने प्राण बचाने
के लिए जहाँ-तहाँ भागते, पुन-पुन पानी के ऊपर सिर उठाकर देखते और मन ही मन
सोचते कि कदाचित् पहले के समान ही कोई अमोघ अस्त्र हमारा संहार करने के लिए
आ रहा है । फिर तुरन्त यह जानकर कि वानर समुद्र में सेतु बांध रहे है, मन-ही-
मन प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से विचरण करने लगते । इस प्रकार, वानर-वीरो ने बडी
तत्परता से उस दिन पचास योजन तक पुल बांधा । इतने में सूर्यास्त हुआ ।
तब सभी वानर-वीर भक्तियुक्त हो, संध्या-वंदन आदि कार्य से निवृत्त हो विचार
करने लगे कि अब तो हमें केवल दस ही योजन लंबा पुल बाँधना शेष रह गया है ।
कल यह भी पूरा कर लेंगे । इस प्रकार, वार्त्तालाप करते हुए वे समुद्र-तट पर लौट आये
और रात को सुख की नीद सोये । प्रात काल होते ही सभी वानर-नेता रामचन्द्र के पास
गये और उन्हें बडी भक्ति से प्रणाम करके अपने कार्य की प्रगति सुनाई । फिर, वे
मोदमग्न मन से फिर वृक्षो तथा महाशैलो को बड़ी शीघ्र गति से ला-लाकर नल के हाथो
में देने लगे ।

२५ गिलहरी की भक्ति

तब राम सेतु का निरीक्षण करने के उद्देश्य से सागरेश्वर, वानरेश्वर तथा दैत्य-
नायक के साथ वहाँ गये और लक्ष्मण के कंधे पर अपना वाम कर टेके हुए मंद-मंद