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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 508 में से

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पृष्ठ 315

युद्धकांड २८५
सेना ठहरी हुई है । उस सेना की गणना करना असम्भव है । जहाँ देखो वहाँ वानर-सेना
ही है । कुछ सेना पर्वतो पर ठहरी हुई है, कुछ सेना अभी ठहरने की व्यवस्था में ही
लगी है, कुछ सेना ठहरने के लिए स्थान खोज रही है, कुछ सेना समुद्र के उस पार है
और कुछ सेना वहाँ से निकलकर इस पार आ रही है । हे प्रभो, इतनी विशाल सेना
को देखकर मन में भय उत्पन्न होता है । एक एक स्थान पर ठहरी हुई सेना की गणना
करके लिखना ब्रह्मा के लिए भी असम्भव है । इसलिए हे दानवेन्द्र, आप राम के दर्शन करके
उन्हें सीता को लौटा दीजिए और आनन्द में रहिए ।"
उनकी ऐसी बातो को सुनने की इच्छा न रखनेवाला रावण अत्यधिक रोष से
बोला--'चाहे देवता तथा गंधर्व ही मेरे ऊपर आक्रमण करने आवें, तो भी मैं सीता को
नहीं छोड़ूँगा । तुम ऐसे कायर क्यो बनते हो ? कदाचित् वानरो ने तुम्हें पकड़कर अच्छी
तरह पीटा है, इसलिए तुम भयभीत होकर भाग आये हो । डरो मत, वे कपि तुम्हारा
पीछा करते हुए नही आ सकेंगे ।' इस प्रकार कहते हुए रावण शुक तथा सारण के साथ
अपने ऊँचे सौध पर चढ़कर उस विशाल कपि-सेना को देखकर आश्चर्यचकित हुआ ।
उसके पश्चात् उसने शुक-सारण को देखकर पूछा—'इस विशाल कपि-सेना का
संचालन करते हुए कौन आगे-आगे चलेगा ? सावधानी के साथ उसके पीछे-पीछे कौन
चलेगा ? इनमें कौन शूर है ? कौन चतुर है ? सूर्यवंशी राम किसके परामर्श से काम
करता है ? किसके साथ राम अपने मन की बात करता है ? सेना किसकी आज्ञा के
अधीन है ? दिन-रात इस सेना की रक्षा करनेवाला कौन है ? इस सेना में सामन्त
कौन है ? इसमें सुग्रीव कौन है ? राम कौन है ? लक्ष्मण कौन है ? और, अगद कौन है ?
उन्हें दिखाने के पश्चात् उनके शौर्य के बारे में कहो । मुझे क्रोध नहीं आयगा ।'
३३. सारण का रावण को कपियों का परिचय देना
तब सारण बड़ी कुशलता के साथ इस प्रकार कहने लगा—"हे देव, पुर्किंद नदी-
तटवर्ती सूर्यपुत्र, इस पृथ्वी पर महान् बली है । उसीने इस लंका को उखाड़ दिया था और
यहाँ भयंकर चीत्कार व्याप्त कर दिया था । वही एक लाख श्रेष्ठ कपि-वीरों के साथ
वानर-सेना के अग्र भाग में रहता है । हे देव, नील एक अतिबलशाली है और वही राम
का सेनाध्यक्ष है । अपनी पूँछ को बड़े गर्व से हिलाते हुए समस्त दिशाओ को कम्पित करने-
वाला हजार पद्म तथा एक शंख उत्तम वानर-सेना के साथ, पर्वत के समान दिखाई पड़ने
वाला वालिपुत्र अंगद है । वह वालि की अपेक्षा अधिक बलवान् है । वालि-पुत्र के उस
ओर रहनेवाला नल है, जो चन्दनाद्रि का स्वामी है और विख्यात विश्वकर्मा का पुत्र है ।
उसीने एक सहस्र करोड़ और अस्सी लाख वानरों की सहायता से समुद्र पर पुल का
निर्माण किया है और समस्त वानर-सेना को समुद्र पार कराया है। वह अकेले ही अपनी
विशाल सेना के साथ समस्त लंका को जीतना चाहता है । हे राक्षसराज, रविपुत्र के
सामने ही रमणीय कांति में रजताद्रि की समता करनेवाले श्वेत नामक वानर को देखिए ।
वही समस्त सेना की व्यवस्था करता है । हे लंकेश वह देखिए, सत्तर करोड़ वानर-वीरों
को साथ लिये हुए वेगवान् नामक वानर हमारी ओर देख रहा है। वह सुग्रीव का मित्र है