रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुद्धकांड २७५
और उसके हाव-भाव नष्ट-से हो गये । अबतक पराजय का नाम न जाननेवाला
समुद्र आज पराजय के निवास के समान, सत्त्व-संपन्न होते हुए भी सत्त्वहीन के समान व्याकुल
होने लगा । स्थैर्य रखते हुए भी वह अस्थिर तथा अधीर हो बड़े वेग से राम के हाथ
के ब्रह्मास्त्र के अग्र भाग में एक बिंदु के रूप में आकर ऐसे खड़ा रहा, मानो वरदान के
प्रभाव से पल-पल बढ़नेवाले रावण के मस्तकों को एक साथ काट डालने के उद्देश्य से
राम ने अपने बाण को पैना बनाने के लिए वडवानल में उसे तपाया हो और फिर समुद्र
में उसे डुबोने पर सारा समुद्र खिंचकर उस शर के अग्र भाग में बूंद के रूप में खड़ा
हुआ हो और (इस प्रकार) कह रहा हो—‘हे देव, मेरा अस्तित्व इतना ही तो है ।’
२४. समुद्र का राम से प्रार्थना करना
तब समुद्र सब देवताओ के समक्ष दीप्तिमान् रत्न-प्रभा से विलसित हो, असंख्य
मंगल पुष्प-मालाओ से अलंकृत हो, उज्ज्वल तथा विशाल फणवाले कोटि सर्प तथा असंख्य
जलचरो के साथ, गगा आदि नदियो की सेवाओ को प्राप्त करते हुए, रामचंद्र के समक्ष
आया, साष्टांग प्रणाम किया ओर कर-कमलो को मुकुलित करके अत्यन्त भक्तियुक्त हो
निवेदन करने लगा—‘हे नरनाथ, आपके क्रोध के सम्मुख मेरी क्या शक्ति है कि मैं खड़ा
भी रह सकूं ? आप आदि पुरुषोत्तम हैं, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी आपकी
आज्ञा के वशवर्ती है । आपमें जो प्राणी विलसित हैं, उनकी गणना ही नहीं हो सकती ।
समस्त लोक आपके अधीन हैं । मुझे अपराधी जानकर आप मुझे दंड मत दीजिए । आप
जो भी कार्य कहें, आपकी आज्ञा को सिर आंखो पर धारण करके उसे संपन्न करूंगा ।
इसके पश्चात् गगा आदि नदियो ने रामचन्द्र को सिर नवाकर प्रणाम किया और
ललाट पर हाथ जोड़कर कहा—‘हे जगदभिराम राम, हम आपकी शरण में आई है ।
हे करुणानिधि, आप हम पर कृपा कीजिए । हम सब आपसे अभयदान की याचना करती है ।
अद्वितीय रीति से इस सागरेश्वर को क्षमा करके आप हमारे सौभाग्य की रक्षा कीजिए ।
हे त्रिभुवनाधार, हे दीन-मन्दार, अपराधियो को क्षमा करना ही आपका लोकोत्तर गुण है ।
हे देववंद्य, हम पर कृपा करके हमारी रक्षा कीजिए । हे शिवधनुर्भंजक, हे राम, आपकी
महिमा का वर्णन श्रुति भी गा नही सकते । आप देव-देव हैं । रक्षा तथा पालन करने में
आप ही समर्थ है । हे भूमीश, हे लोकेश, हे प्रकाश-संपन्न, हे सीतापति, हे पुण्य-स्वरूप,
आप हमारी रक्षा कीजिए ।'
इस प्रकार की नदियो की विनती सुनकर राम ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए
कहा—‘तुम भय छोड़ो ।’ तब समुद्र ने राम से निवेदन किया—‘हे कमलगर्भ, हे मुनिजन-
वंद्य, हे शरणागतरक्षक, हे दिव्य मूर्ति, आप चाहें, तो अपनी वानर-सेना को ले जाने
के लिए दीर्घकाय मकरों के संचलन से युक्त उमड़कर लहरो में फैल जाने वाले, झंझावात
को उत्पन्न करनेवाले, भँवरो से युक्त हो मेरे सौंदर्य की वृद्धि करनेवाले मेरे इस अगाध तथा
अनत जल पर सेतु बाँधिए या चाहें तो वैसे ही चले जाइए ।”
समुद्र के इन विनयपूर्ण वचनो को सुनकर राम संतुष्ट हुए और जलाधीश के सुझाव
के अनुसार उस अमोघ अस्त्र को मरुकांतार नामक प्रदेश पर चला दिया । उस बाण के