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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पड़े हुए देखकर राम अत्यधिक शोक से अभिभूत हुए । उन्होंने विचार करके निश्चय कर
लिया—हाय, निश्चय ही कोई क्रूर दानव उस कुटिल-कुंतला सीता को उठाकर ले गया है ।
यो चिंतित होते हुए वे मार्ग में अन्वेषण करते हुए थोड़ी दूर आगे बढ़े । मार्ग में
जहाँ-तहाँ राक्षस के चरण-चिह्नों को देखते तथा उनका अनुसरण करते हुए वे कुछ दूर
गये । वहाँ उन सूर्यवंशजो ने एक स्थान पर कटे हुए पख, रक्त के कीचड में मृत पड़े
हुए सारथी, उसपर टूटकर गिरे हुए रथ, रथ के पास कटकर गिरे हुए अश्व, पृथ्वी पर
बिखरे हुए पताका के खंड, उनके सामने ही गिरे हुए धनुष के खंड, छितराये हुए अस्त्र-
शस्त्र देखे । (इन सब वस्तुओ को) लक्ष्मण के दिखाने पर राम विस्मित हुए और सोचने
लगे कि किन्ही ने यहाँ पर युद्ध के आनन्द का उपभोग किया है ।
२५. जटायु का अग्नि-संस्कार करना
उक्त योद्धा का पता लगाने के उद्देश्य से रघुराम उस मार्ग में जहाँ-तहाँ ध्यान से देखते
हुए आगे बढे । उस स्थान के निकट ही पख और पैर कटे हुए, रक्त में डूबे, वज्र के
आघात से गिरेहुए मैनाक पर्वत की भाँति विवश पड़े हुए विहगेन्द्र (पक्षिराज) को देखकर
राम ने कहा—'हे लक्ष्मण, देखा तुमने ? चपलराक्षस सीता को निगलकर, अपना निज
रूप दिखाने से डरकर पक्षी के रूप में यहाँ पडा हुआ है । भय से तडपनेवाले इसका वध
मैं कर डालूँगा ।' यो कहते हुए वे धनुष हाथ में लिये उस पक्षी पर आक्रमण करने को
उद्यत हुए । उन्हें देखकर पक्षिराज ने रक्त का वमन करते हुए, लबी साँस भरते हुए,
गद्गद कठ से कहा—'हे राजन्, मैं आपके पिता का मित्र हूँ, कश्यप ब्रह्म का पौत्र हूँ,
अरुण का पुत्र हूँ तथा जटायु नामधारी हूँ । मै इन घने वन तथा शैल-शृंगो पर निवास
करता हूँ । मैंने अपना सारा वृत्तान्त आपको इसके पहले स्पष्ट रूप से निवेदन कर ही
दिया था । हे पुण्यात्मा, ऐसे मुझे यह विपत्ति क्यो कर आई, उसका भी विवरण सुन
लीजिए । आज रावण आपकी देवी को चुराकर लिये जा रहा था, तो मैने उसको रोका
और अपनी अमित शक्ति के साथ उससे युद्ध करके बुरी तरह घायल होकर पृथ्वी पर पड़ा हूँ ।
यह उसका केतु, सूत तथा अश्वो से युक्त रथ है । युद्ध में मेरे द्वारा ये नष्ट
हुए है । तब क्रोध से वह क्रूर राक्षस सीता को उठाकर आकाश-मार्ग से चला गया ।
आप तो आये नही । (अब) मै आपको यह समाचार सुना सका, आपकी शुभ मूर्ति के
दर्शन कर सका । मै पुण्यवान् हुआ ।'
तब राघव का शोक द्विगुण हो उठा । उन्होंने धनुष को फेंक दिया और मूच्छित
होकर धरती पर गिर पड़े । सौमित्र की परिचर्या के उपरान्त उनकी चेतना लौटी, तो वे
बोले—'हाय, महात्मा जटायु ! मेरे कारण आप पर यह विपत्ति आई है ।' उन्होंने
जटायु के शरीर पर हाथ फेरा, और सारा रक्त स्वय पोछा और अपने अनुज को देखकर
बोले—'लक्ष्मण, इन्होंने हमारे लिए रावण का सामना करके इस प्रकार युद्ध किया है ।
ऐसे पुण्यात्मा कहाँ मिल सकते है ? इनके स्वर्ग सिधारने के पहले ही तुम इनसे पूछ लो
कि रावण की राजधानी को जाने का क्या मार्ग है, उसकी शक्ति आदि कितनी है ।'
तुरन्त लक्ष्मण ने रघुराम के कार्य में सहायक जटायु से उस सुरवैरी की शक्ति आदि

१६६ रंगनाथ रामायण

के संबंध में कई उचित प्रश्न किये । तब जटायु ने कुछ बातें बताईं, किन्तु कंठ से फिर
से रक्त बहने के कारण आगे बोल न सके । तब उन्होंने अतुल पुण्यात्मा राम को देखा
और मन में उनका सतत स्मरण करते हुए बड़े आनन्द से मोक्ष-मार्ग को सामने देख
पुलकित होकर प्राण त्याग दिये । राजकुमार उनकी मृत्यु पर, महाराज दशरथ की मृत्यु
से भी अधिक दुःखी हुए और वेद-विधि से उस पक्षिराज का दाह-संस्कार किया ।
२६. कबंध का वध
वहाँ से वे दोनो क्रौंचवन की ओर बढ़े और वहाँ नाना लता, वृक्ष, नग तथा
मृग से भरी एक घाटी में से होकर जाने लगे । वहाँ एक स्थान पर 'अयोमुखी' नामक
एक राक्षसी को देखा । उसके केश पके हुए थे, दाढ़ें लंबी थीं, उदर विशाल था, मुँह
बहुत बड़ा था, आँखें उभरी हुई थीं और कुच घुटनों तक लटक रहे थे । उसकी चेष्टाएँ
पागलो की-सी थीं । उसने सुंदर आकार तथा शुभ लक्षणो से समन्वित लक्ष्मण को देखा,
तो उनपर आसक्त हो गई और उनका हाथ पकडकर रति-क्रीडा के लिए उनसे आग्रह
करने लगी । उन्होंने उस राक्षसी को तलवार की सहायता से वही सुख दिया, जो उन्होंने
शूर्पणखा को दिया था ।
इसके पश्चात् उन्होंने दुंदुभि, पटह तथा तूर्य आदि की ध्वनि से भी अधिक ध्वनि
अपने आगे सुनी । उसके संबंध में जानने के लिए दोनो राजकुमार आगे बढे । वहाँ उन्होंने
एक ऐसे राक्षस को देखा, जिसकी बाँहें एक योजन लंबी थी । वह अपनी बाँहो को फैला-
कर उनके बीच फँसनेवाले किसी भी जंतु को पकडकर तुरंत ही निगल जाता था और
डकार लेता था । उसका सिर बहुत छोटा था और उसका पेट ही उसका मुँह था । इस
प्रकार का आकारवाला, बहुत से जीव-जतुओ का नाश करनेवाला, देवताओ को कष्ट
पहुँचानेवाला मदांध कबध नामक राक्षस को देखकर राम-लक्ष्मण आश्चर्यचकित हुए ।
उसने भी अपने दोनो करो से उन दोनो को पकड़ लिया और अपनी ओर खींचने लगा ।
उस समय अपने अग्रज को देखकर लक्ष्मण ने कहा- 'हे भाई, आप मुझे इस राक्षस का आहार
बनाकर सीता के अन्वेषण में चले जाइए और उन्हें प्राप्त करके समस्त ससार का शासन
करने के लिए (अयोध्या) लौट जाइए ।'
लक्ष्मण की बातो पर विचार करते हुए राम उस राक्षस के हाथो के साथ थोडी
दूर गये । उसके पश्चात् राम तथा उनके भाई दोनो ने खूब सोच-विचार करके अपनी
म्यानो से खड्ग खींचे और उन तेज खड्गो से उस राक्षस के दोनो हाथ काट डाले ।
राक्षस का सारा गर्व चूर-चूर हो गया । वह धरती पर लोट गया और
थोडी देर के बाद सँभलकर उसने उन लोगो से पूछा कि आप कौन हैं ? तब लक्ष्मण ने
श्रीराम का सारा वृत्तांत कह सुनाया, तो उसे (अपने पूर्व जन्म का) ज्ञान हो आया और
वह अपना वृत्तांत सुनाने लगा । (उसने कहा) - "महाराज, मैं दनु नामक स्वर्ग का निवासी हूँ ।
एक महात्मा मुनि के शाप के कारण मै ऐसा हो गया हूँ । मैंने ब्रह्मा से कामरूपत्व
(इच्छानुसार रूप बदलने की शक्ति) तथा चिरायु प्राप्त की और उस गर्व मे ऐसा रूप
धारण करके सभी संयमी जनो को दुख देने लगा । इस सिलसिले में स्थूलशिर नामक

मुनि का अपकार करके मैंने यह भयकर रूप प्राप्त किया । फिर मेरे प्रार्थना करने पर
उस मुनि ने कहा कि आपके द्वारा मेरी शाप-मुक्ति होगी । मैने उस वचन को स्मरण
रखा और इस रूप को धारण करके इन्द्र को युद्ध के लिए न्योता दिया । उसने अपने
वज्र के प्रहार से कठ-सहित मेरे सिर को मेरे पेट में दवा दिया ।”
तब रामचंद्र ने उससे पूछा, 'हे अनघ ! क्या तुम रावण की शक्ति के बारे में
जानते हो ?' तब उसने कहा—'मै तो जानता हूँ, लेकिन मुनींद्र के शाप के कारण मेरा
ज्ञान कुंठित हो गया । आप मेरे शरीर को अग्नि में जलाइए, तो उसके पश्चात् मै सब
कुछ आपको सुना सकता हूँ ।'
उन्होंने अपने धनुष की सहायता से ही उसके शरीर का अग्नि-सस्कार किया ।
तब वह देवता का रूप धारण करके आकाश-मार्ग में एक सुन्दर विमान पर बैठे हुए इस
प्रकार कहने लगा—"हे रघुराम, हे युद्धप्रवीण, हे करुणानिलय, हे गंभीर, हे काकुत्स्थ-
श्रेष्ठ, आपकी करुणा-पूरित दृष्टि के प्रताप से मैने अपनी पूर्व दशा प्राप्त की है। मै अब
आपसे रावण के सबंध में स्पष्ट रूप से कहूँगा, सुनिए—'रावण कुबेर का भाई है ।
पुलस्त्य ब्रह्मा का प्रिय पोता है । उसने अपनी तपस्या की महिमा से ब्रह्मा को प्रसन्न
करके श्रेष्ठ वरदान तथा औन्नत्य प्राप्त किया है । उसने दिग्विजय किया है । वह दानवो
का स्वामी, देवो का शत्रु, दस बड़े शिरोवाला, बीस भुजाओवाला, लवण-सागर से परि-
वृत, लकापुर का राजा है । उसने गर्व से रजत-पर्वत को भी उखाड दिया था ।” इतना
कहकर उसने वह मार्ग भी बताया जिससे होकर रावण सीता को ले गया था, उस मार्ग
के चिह्न बताये और रास्ते में पड़नेवाली सभी वस्तुओ के नाम बताये । उसने यह भी
कहा कि पपा के आस-पास श्रेष्ठ ज्ञानी मतंग मुनि का आश्रम है, उनकी शिष्या शबरी
आपका आदर-सत्कार करेगी । उस स्त्री के निवास के पास यदि आप जायें, तो सूर्यपुत्र से
आपकी मित्रता होगी, जिसकी सहायता से आप जानकी को प्राप्त कर सकेंगे और निदान
साम्राज्य का लाभ भी करेंगे । इस प्रकार कहकर वह स्वर्ग चला गया ।
२७. राम-लक्ष्मण की शबरी से भेंट
दूसरे दिन मनुवश-तिलक वहाँ से निकले और पपा सरोवर के पश्चिंम भाग में
स्थित तरु-लता-समूह से विलसित, प्रबल पुण्यो का आवास, शबरी के आश्रम-स्थल में पहुँचे ।
शबरी उनके स्वागतार्थ सामने आई और बड़ी भक्ति के साथ रामचंद्र के चरणो
पर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया । उसके पश्चात् वह श्रीरामचंद्र की स्तुति यो करने
लगी—'हे दशरथ के वरपुत्र, ताडकाविजयी, कौशिक के यज्ञ के रक्षक, मुनियो के ध्येय,
ताडका के पुत्रो को दड देनेवाले, परम पवित्र गगानदी के तट पर पैदल चलनेवाले, निर्मल
पद-रजवाले, अहल्या के उद्धारक, हर के प्रचंड तथा विशाल कोदंड को भग करनेवाले,
भयंकर भार्गव राम का गर्व तोडनेवाले, अभिराम नामवाले, पितृ-वचन का पालन करने-
वाले, सत्कीर्त्तिवाले, विराध के कुकर्मों को रोकनेवाले, सफल मुनित्राता, सत्यसपन्न, खर-
दूषणादि राक्षसो का शिरच्छेदून करनेवाले, मरणार्थी मारीच का वध करनेवाले, सीता-वियोग-
जनित मोह से अभिभूत होनेवाले, खगेन्द्र को मोक्ष प्रदान करनेवाले, महान् विक्रम के

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धाम, अति पुण्यप्रद नामवाले, हे रघुराम, में आज आपके दर्शन कर सकी। मेरी तपस्या
आज सफल हुई। मैंने अद्वितीय पुण्यों को प्राप्त किया। हे काकुत्स्थ, मार्ग के श्रम से
आप बहुत क्लात हुए होंगे, कही और न जाकर आज हमारे आश्रम में ठहर जाइए।
हे अनघात्म, मैंने अपने गुरु मतंग मुनि के द्वारा आपका वृत्तांत सुना है। आप आदिदेव हैं,
सर्वनिगम-वेद्य हैं, अत., आपकी स्तुति करना असंभव है। यह मतंग मुनींद्र का
आश्रम है; तपश्चर्या से परिपूर्ण तथा विश्रामदायक है।
इस प्रकार (उस आश्रम का) महत्त्व बताकर उसने बड़े प्रेम से वन के कंद, मूल,
फल ले आकर उन्हें दिये और राम ने उन फलों को खाया। राम उस रात को वही
ठहर गये और दूसरे दिन घनी जटा-जूट की कवरी धारण करनेवाली शबरी को देखकर
बोले—'सीता की वियोगाग्नि से मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, अत, एक स्थान पर ठहर नहीं
पा रहा हूँ; अब मुझे उस उत्फुल्लकमलमुखी सीता को ढूँढने के निमित्त जाना है।
आप कृपया मुझे आज्ञा दें।'
तब शबरी अत्यंत संतुष्ट होकर बोली—'दनु नामक देवता ने आपको भविष्य में
करने योग्य सभी विषयों के सबंध में कहा ही है। फिर भी मैं कहूँगी। हे राजन्, आप
अवश्य ही रावण का वध करेंगे और सीता को प्राप्त करेंगे। इसमें संदेह करने की कोई
आवश्यकता नही है। फिर भी आप अकेले मत जाइए। हे भानुकुलाधिप, यहाँ से आप
ऋष्यमूक पर्वत के निकट जाइए। उस पर्वत पर तीक्ष्ण बुद्धिवाले, सूर्य-पुत्र सुग्रीव नामक
वानर राजा रहता है। वह अपने अग्रज के हाथों अपना राज्य तथा अपनी स्त्री को खो
चुका है। वह शोकातुर है। उसकी वानर-सेना अनंत है। इसलिए आप उसका उपकार
कीजिए जिससे कि उसके मन में आपके प्रति विश्वास उत्पन्न हो जाय। उसके पश्चात्
आप उसके साथ लंका जाइए और अति शक्तिशाली रावण को युद्ध में मारकर अपने बल-
विक्रम की ख्याति चारों ओर फैलाते हुए अपनी स्त्री सीता को प्राप्त कीजिए।
इस प्रकार शबरी ने उन्हें भविष्य में करने योग्य सभी कार्य बतलाकर अपने गुरु
के वचनों का स्मरण किया और तुरंत अग्नि प्रज्ज्वलित करके उसमें अपना शरीर भस्म कर
देने के लिए तैयार हो गई। उस समय आकाश में इन्द्रादि देवता मणियो के प्रकाश से
देदीप्यमान होनेवाले विमानों पर आरूढ होकर इस दृश्य को देखने लगे। नारद, सनक
सनंदन आदि प्रमुख मुनींद्र अत्यंत हर्षित हुए। तब शबरी ने परमधाम, परमकल्याण-
गुण-संपन्न, पूर्णस्वरूप, अव्यय, अविकार, अङ्गिल अंतरात्मा, अव्यक्त अखिलेण, आघात-रहित,
ब्रह्मा ने भी स्तुत्य, संसार के रोगों के वैद्य, और रघुकुल-रूपी समुद्र के लिए चंद्र के
समान शोभित होनेवाले, रघुराम चन्द्र को अपने मन में प्रतिष्ठित करके, बड़ी भक्ति से
उनकी स्तुति की और उस प्रभु के समक्ष ही रामार्पण के रूप में अपने शरीर को अग्नि
में भस्म कर दिया। उसके पश्चात् वह देवताओं के लिए मान्य दिव्य विमान पर आरूढ
होकर देवताओं की विविध सेवाओं को प्राप्त करती हुई बड़े हर्ष से देवलोक को चली गई।
२८. श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना
इस प्रकार शबरी अग्नि-मुख के द्वारा स्वर्ग-सुख को प्राप्त हुई। यह देखकर रमणीय

आकारवाले महाबलशाली राम-लक्ष्मण उस स्थान को छोड़कर आगे बढे और उस ऋष्यमूक
पर्वत के निकट पहुँच गये, जो सतत आलोकमय, तया श्रेष्ठमपन्न मुनियो का निवास था ।
उस पर्वत के झरने ऐसे दीख रहे थे, मानो त्रिलोकीनाथ के आगमन के कारण
आनद से उमड़कर, वह पर्वत आनदाश्रु बहा रहा हो । उस पर्वत की तराइयों में अत्यधिक
सख्या में देदीप्यमान चद्रकात मणियो की काति ऐसी दीख रही थी, मानो मेरु, मदर तथा
हिमाचलो का उपहास करनेवाली उस पर्वत की हँसी हो । उस पर्वत की ऊँची चोटियो
पर चमकनेवाले नक्षत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो ब्रह्मा ने इस पृथ्वी के पर्वत-
राज्य का अभिषेक करके उसके सिर पर मन्त्राक्षत छीट दिये हो ।
उस पर्वत पर उज्ज्वल रूप से दीप्त होनेवाली सूर्यकात मणियो की दीप्ति ऐसी
दीख रही थी, मानो उस पर्वत की शरण में आये हुए सुग्रीव पर अत्याचार करनेवाले वालि
पर क्रुद्ध होकर वह अपने प्रताप की अग्नि दिखा रही हो । उस पर्वत पर विचरण करनेवाले
दतो से युक्त मत्त गज ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो नील मेघ उस पर्वत पर विचरण
करते हुए अपनी विजलियो को चमका रहे हो । उस पर्वत के शिखर के निकट ही बहने-
वाली आकाश-गगा, (मन्मथवैरी) शिव के जटा-जूटो पर शोभायमान गगा के समान थी,
उसके आस-पास क्रीडा करनेवाले हसो की पवित शिव का शिरोभूषण चद्र के समान थी ।
उस पर्वत पर रहनेवाले अत्यधिक शृग, वृक्ष तथा पल्लव-समूह शिव के बिखरे जटा-जूट के
समान सुशोभित थे और वह पर्वत सिद्धो की सेवाएँ प्राप्त करते रहनेवाले शिव के सदृश
ही दीख रहा था । उस पर्वत पर रहनेवाले कल्प-वृक्ष, कामधेनुएँ, देव-कन्याएँ, विविध
औषधियाँ, चितामणि जैसी श्रेष्ठ मणियो का समूह, कभी नष्ट न होनेवाली निधियाँ और
सतान-वृक्ष (एक प्रकार का कल्प-वृक्ष) आदि ऐसे दीख रहे थे, मानो इद्रादि देवता, समुद्र-
मथन-से प्राप्त वस्तुओ को (उनके वितरण के समय इद्रादि देवताओ के बीच झगडा
उत्पन्न होने के कारण लाकर यहाँ पर रख दिया हो), या अमृत-पान से बेसुध होकर
भूल से यहीं छोड़ दिया हो, या योग्य स्थान होने के कारण उन्हें यहाँ छिपा रखा हो ।
इस पर्वत को देखकर राघव अत्यत विस्मित हुए और उसकी प्रशसा करने लगे ।
अपने अनुज की अकलक भक्ति-युक्त सेवा प्राप्त करते हुए वे उस शैल के निकटवर्ती
पपा सरोवर के पास पहुँचे और उस सरोवर में नियमानुसार स्नान किया । उसके पश्चात्
वे उस सरोवर के चारो ओर की शोभा का अवलोकन करके अत्यत मुग्ध-से हो गये ।
अपनी क्लान्ति मिटाने के निमित्त वे एक आम के वृक्ष की छाया में बैठे, तो लक्ष्मण उनका
शीतलोपचार करने में प्रवृत्त हुए ।
कुछ समय के पश्चात् राघव ने उस आम के वृक्ष को ध्यान से देवा और लक्ष्मण
से बोले—'हे अनुज, जबसे हमने वन के लिए प्रस्थान किया, तबसे कितने ही ऊँचे पर्वत
और पुण्य नदियाँ देखीं, किन्तु हमने इस वृक्ष के जोड का वृक्ष कही नहीं देखा । कदाचित्
सुरपति आदि देवताओ ने मिलकर इस वृक्ष का निर्माण किया हो, ब्रह्मा ने स्वय प्राण
देकर इसे यहाँ पर प्रतिष्ठित किया हो, या रविमुत (सुग्रीव) की तपस्या से संतुष्ट होकर
ब्रह्मा ने इस वृक्ष को यहाँ उत्पन्न किया हो, या अमृत को प्राप्त करने के बाद सुरो ने सूर्य-
२२

पुत्र का पक्ष लेकर अमृत से सींचकर इस वृक्ष को वर्द्धित किया हो । सूर्य के साथ प्रेम
बढाने के निमित्त इस वृक्ष ने आठो दिशाओ में अपनी उन्नत शाखाओ को फैलाया है ।
इच्छित फल प्रदान करने के निमित्त मानो इसने अपनी शाखाओ की कांति चारो ओर फैला
रखी है । यह अपने पत्तो को फैलाकर, उसकी कान्ति को विकीर्ण करते हुए, सूर्य की रश्मि
भी नीचे आने नही देता; रात्रि के समय यह शशि के प्रेम से अनुरक्त हो उनकी चाँदनी
को पृथ्वी पर पडने नही देता । इसके फल अमृत-फलो की अपेक्षा सौगुने अधिक स्वादिष्ट हैं ।
ऐसा लगता है कि देवताओ ने इस पृथ्वी के वृक्षो के राजा के रूप में इसका अभिषेक
कर दिया है ।
लक्ष्मण ने अपने अग्रज के चित्त का भाव जानकर उनके कथन का अनुमोदन किया
और उनके लिए पत्रो की मृदु शय्या का प्रबंध किया । तब राम ने उस शय्या पर शयन
किया, तो लक्ष्मण रघुराम के चरण दबाने लगे । इस प्रकार अत्यंत शोभा-समन्वित हो उनके वहाँ
रहते हुए कुछ समय व्यतीत हुआ । तब अनघ रघुराम को सबोधित करके लक्ष्मण ऊँचे
स्वर में बोले- 'हे देव, अभी-अभी छिपकली की बोली मुझे सुनाई पडी है कि आप युद्ध में
शत्रु-सेना को जीतकर अवश्य अपनी देवी को प्राप्त करेंगे । सर्वत्र आपकी विजय ही होगी ।'
तब राम ने कहा- 'अब वानरेश्वर बडी श्रद्धा के साथ यहाँ आकर हम से मिलेगा
और हम शीघ्र ही लका जायेंगे । युद्ध में रावण मरेगा और सीता हमें मिल जायगी और
उसके पश्चात् मै राज्य-भार ग्रहण करूँगा ।' इस प्रकार राम के कहने के पश्चात् राम तथा
लक्ष्मण बडी प्रसन्नता से वहाँ रहने लगे ।
आन्ध्र-भाषा के सम्राट्, श्रेष्ठ काव्य तथा आगम आदि के ज्ञाता, आचारवान्, अपार
धैर्य-सागर, भूलोक-निधि गोन बुद्ध राजा ने अपने पिता महनीय गुणसपन्न, मेरु पर्वत के
समान धीर, विट्ठल राजा के नाम पर, आचद्रार्क पृथ्वी पर स्थायी रहनेवाली, असमान
तथा ललित शब्द तथा अर्थों से विलसित रामायण के, अलकार तथा भावो से भरे अरण्य-
काण्ड की रचना इस प्रकार की कि वह इस पृथ्वी पर आचद्रार्क लोगो की प्रशसा प्राप्त
करती रहे । रसिकजनो को सतत आनद देनेवाले, श्रेष्ठ, आर्ष, आदि काव्य-रूपी इस पुण्य
चरित को जो पढेंगे, या सुनेंगे, उन्हें सामादि वेद-समूहो का आधार, रामनाम-रूपी चिंता-
मणि, नव-भोग, परहित-वृद्धि, उन्नत विचार, परिपूर्ण शक्ति, राज्य-सुख, निर्मल कीर्त्ति,
नित्य सुख, धर्म में निष्ठा, दान में आसक्ति, चिरायु, आरोग्य तथा ऐश्वर्य सतत संप्राप्त
होंगे । इसे सुनते रहने से पाप-क्षय, पुत्र-प्राप्ति, शत्रुओ का नाश, धन-धान्य की समृद्धि,
विघ्न-बाधारहित सुन्दर स्त्रियो के साथ जीवन और पुत्रो के साथ सहजीवन सिद्ध होगे ।
सब विपत्तियाँ दूर होंगी, बंधु-बांधवों का सहवास रहेगा, अभिलषित वस्तुओ का वियोग
न होगा, (घरो में) देवता-तर्पण तथा पितरो की तृप्ति होती रहेगी । इस पुण्य चरित
के लिखनेवालों को श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति तथा इद्रलोक का निवास प्राप्त होगा । जब-
तक कुलपर्वत, नक्षत्र, रवि तथा चद्र, दिशाएँ, वेद, पृथ्वी तथा समस्त लोक स्थित रहेंगे,
तबतक यह कथा अक्षय आनंद-समूह का आधार रहेगी ।
ः अरण्यकांड समाप्त ः

श्रीरंगनाथ रामायण
(किष्किंधाकांड)

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१. पंपासर-दर्शन
श्रीराम ने तब शीतल जल तथा कमल, उत्पल एव कुमुदो से सुशोभित पपा सरोवर
को और उसके तटवर्त्ती, वसत ऋतु के कारण, फूल और फल के भार से युक्त चपक तथा
सहकार वृक्षो की शोभा को देखकर जानकी के विरह से कपित होते हुए लक्ष्मण से कहा—
“हे सौमित्र, यह पपा सरोवर इतना मनोहर है कि यह देवताओ की कामिनियो के लिए
भी जल-क्रीडा करने की इच्छा करने योग्य है । इस सरोवर की समता करनेवाला कोई
दूसरा सरोवर वताना, क्या शेषनाग के लिए भी सभव हो सकता है ? इसका महत्त्व
जानने के पश्चात् क्या मानसरोवर भी तुच्छ नही प्रतीत होगा ? पवित्र जीवन का आधार
इस सरोवर की समता, क्या स्वर्गलोक का कोई भी जलाशय कर सकता है ? (जल के)
वाहर निकले हुए मृणालो के ऊपर दीखनेवाली कर्णिकाओ पर (बीजकोष) विकसित श्वेत
कमल, मरकत के स्तम्भो पर स्थित स्वर्ण-कलशो पर आधारित छत्रो की भाँति दीखते हैं ।
दोनो पार्श्वभागो में भ्रमरो के पखो से उत्पन्न शीतल वायु के कारण तरगायमान होनेवाली
लहरो पर डोलनेवाले राजहसो के फैलाये हुए पख चामरो की भाँति सुशोभित हैं ।
इनके कारण यह सरोवर शोभा-रूपी साम्राज्य के लिए अभिषिक्त सा अत्यत मनोहर दीख
रहा है । वसतकाल के समान यौवन की काति से परिपूर्ण हो, छोटे-छोटे पल्लव-रूपी

१७४ रंगनाथ रामायण
माणिक्य के आभूषण पहने हुए ये पेड़ों की फैली हुई शाखाएँ इस स्निग्ध सरोवर रूपी
दर्पण में उझक-उझककर (अपना मुंह) देख रही है । उनकी शिखाएँ मद पवन में इस
तरह हिल रही है, मानो वे अपने सौंदर्य को देखकर प्रसन्नता से अपना सिर हिला रही है ।
यहाँ की शुक-सारिकाएँ इस प्रकार बोल रही है, मानो एक दूसरे की प्रशंसा कर रही है ।
इस सरोवर के तीर की वन-स्थली को देखकर मेरा संताप, मन्मथ के प्रताप के समान,
उद्दीप्त हो उठा है । मेरी धृति भी नष्ट हो गई है ।
"हे सौमित्र, विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह वन-भूमि नहीं है, बल्कि
कामदेव का शस्त्रागार है, वे आम्र-पल्लव नहीं हैं, बल्कि मन्मथ के तेज खड्ग है, यह
भ्रमरों का गुजार नहीं है, बल्कि निकट पहुँचनेवाले मन्मथ के धनुष्टंकार है, वे फूलों के
गुच्छ नहीं है, बल्कि मन्मथ के तीक्ष्ण बाण हैं, यह कोयल की मीठी बोली नहीं है, बल्कि
उसके (कामदेव के) कर्णकटु हुकार है । मेरे जैसे स्त्री-विरही इस कानन में कैसे रात्रि
बितायेंगे ? इस वन में सुनाई पड़नेवाला कोयल का कल-कूजन वर्षा ऋतु के बादलों के
घोर गर्जन के समान लगता है, वृक्षों से गिरनेवाले पुष्प-रज का प्रकाश, नये बादलों की
बिजली के समान लगता है, पल्लव-युक्त शाखाएँ इन्द्र-धनुष के समान लगती है, पृथ्वी
पर गिरनेवाले फूल ओले के समान लगते हैं, सतत झरनेवाला मकरद वर्षा के समान
दीखता है । (इन कारणों से) यह वसंत ऋतु भी वर्षा ऋतु के समान दिखाई पड़ती है ।
इस पर भी पल्लव-रूपी अग्नि-ज्वालाओं से, भ्रमर रूपी धुएँ से, वकुल के पुष्परज-रूपी
राख से, सेमर के फूल-रूपी अंगारों से प्रकट होकर, यह ऋतु विरहियों के लिए अग्नि के
समान दीखती है और मन्मथ के प्रताप की अग्नि का भी तिरस्कार करती हुई, मेरे मन
को जला रही है । हाय ! अब मैं क्या करूँ ? कैसे मैं इसे सहन करूँ ? कामिनी-कुल-
भूषणा सीता को मैं कब देखूँगा ? क्या कभी मैं सीता के साथ उस प्रकार मिलकर रह
सकूँगा, जैसे पपा सरोवर के तटवर्त्ती वन की शोभा के साथ वसंत रहता है । इस पपा के
कमलों के समान दीखनेवाले सीता के मुख का मैं कब अवलोकन कर सकूँगा ? यहाँ की
मछलियो की आंखो के समान उस इंदुवदनी की आँखें मैं कब देख सकूँगा ? भ्रमर यहाँ
के पद्मो का मकरद जैसे पान करते है, वैसे ही मैं कब उस सुदरी का अधर-पान करूँगा ?
यहाँ के जलपक्षी जैसे जोड़ों में रहते हैं, वैसे ही उस कमलाक्षी के संग मैं कब रह सकूँगा ?
हाय, यह कैसा विचार है ! अब वह सीता कहाँ ? कहाँ यह विरह ? इन दोनों का मेल
कैसे संभव है ? हे अनुज, अब तुम अयोध्या लौट जाओ । मैं अब अपने प्राणों को रख
नहीं सकूँगा ।",
इस प्रकार अनाथ की तरह शोक करनेवाले राम को देखकर लक्ष्मण बोले—'हे
रघुराम, आप समस्त लोकों का सामना करने की क्षमता रखनेवाले पुरुषोत्तम हैं । ऐसे
मोहजन्य शोक में आप क्यों पीड़ित हो रहे हैं ? सीता को छल से ले जानेवाले रावण
के संहार का उपक्रम कीजिए ।' तभी भासंत नामक पक्षी (शकुन-पक्षी) बोल उठा ।
इतने में उस ऋष्यमूक पर्वत की तराइयों में विचरण करते हुए सुग्रीव ने निकट
ही राम तथा लक्ष्मण को देखा । वह अत्यधिक भयभीत होकर, चीत्कार करते हुए, अपने

मार्ग में पडनेवाले भाड-झखाड की परवाह किये बिना अधाधुध पर्वत पर चढने लगा ।
उसने वानरो को एकांत में बुलाकर उन्हें राम और लक्ष्मण को दिखाते हुए कहा—
'वह देखो, पपा के पास दो व्यक्ति धनुष धारण किये हुए, विविध शस्त्रास्त्रो से सज्जित
होकर ठहरे हुए है । ये प्रच्छन्न वेशधारी, वालि के भेजने पर, हमारा सहार करने आये है ।
अन्यथा, मुनियो को खड्ग, तूणीर, धनुप-बाण आदि की क्या आवश्यकता है ? इनके
पवित्र मुनिवेश देखकर मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है । अव हमें यहाँ से कही चला जाना
चाहिए; यहाँ रहना उचित नही है ।'
जब सुग्रीव ने मंत्रियो से इस प्रकार के वचन कहे, तब उन्हे सुनकर विमल विचारो
से भरे हनुमान् बोले—'इन्हें देखने पर ऐसा लगता है कि ये कोई पुण्यात्मा है, ये कपट-
वेशधारी नही है । रवि-चन्द्र के समान दीखनेवाले, ये दयालु व्यकित ही हैं । पता नही कि
इस रूप में वे यहाँ क्यो आकर रहते हैं ? उनका महत्त्व जाने बिना हमें भयभीत होने
की क्या आवश्यकता है ?' तब सुग्रीव ने हनुमान् से कहा--'हमें शका होती है कि ये
वालि के भेजने पर यहाँ आये है, पता नही कि क्रोध से भरा हुआ वालि हमें कब कैसी
हानि पहुँचायेगा । हमें कभी अपने शत्रु का विश्वास नही करना चाहिए । अत हे पवन-पुत्र,
तुम किसी कौशल से उनसे जाकर मिलो और इस बात का पता लगाओ कि ये क्यो
आये हैं । उनके मन की बात जानकर मेरे मन के भय का निवारण करो । शीघ्र जाओ ।'
२. हनुमान् की राम से भेंट
इस प्रकार हनुमान् को विदा करके सुग्रीव अपने मंत्रियो के साथ वहाँ रहने से
डरकर मलयाद्रि पर चला गया । तब अत्यंत शूर, उत्तम गुणवान्, शीलवान्, बाहुबली,
तेजस्वी, कमनीय रूपवाले, वानरों के रक्षक, धर्मार्थमोक्ष के इच्छुक, अतुल गुरु-भक्त, अत्यंत
कुशल, तथा कीर्तिवान्, अजन-सुत हनुमान् उस पर्वत से धीरे-धीरे ऐसे उतरा, मानो वालि को
अमरलोक भेजकर सुग्रीव को राज्य पर प्रतिष्ठित करने, सुरो की रक्षा करने, रावण की
विजय-लक्ष्मी राम को देने, सीता के दुख को दूर करने तथा रवि-पुत्र (सुग्रीव) के
चित्त को मोद-मग्न करने के लिए जा रहा हो । इस प्रकार वह वानरेश्वर पर्वत से
उतरकर आया और वटु का वेश धारण करके पंपा सरोवर के निकट पहुँचा । महात्माओ के
दर्शनार्थ जाते हुए रिक्त हस्तो से जाना उचित नही है, इसलिए राम के देने योग्य एक फल
हाथ में लिये हुए, वह उनके निकट जाने लगा । इस प्रकार आते हुए अनिल-कुमार को
देखकर राम अपने अनुज से बोले—'हे लक्ष्मण, सुनहला रग, मुज की सुंदर करधनी, रत्न-
कुंडलो से विलसित कर्ण, श्रेष्ठ हार, यज्ञोपवीत, कौपीन, तथा हस्त-कंकण धारण किये हुए
किसी मनुष्य ने क्या अनुपम कपि का रूप धारण किया है ? इस रूप को धारण करने
की इच्छा से स्वयं रुद्र ने इस रूप में जन्म तो नही लिया है ? अन्यथा इस पृथ्वी पर
कपिमात्र को ऐसी प्रभा कैसे प्राप्त हो सकती है ?'
इस प्रकार प्रशसा करनेवाले राजकुमार को देखकर पुलकित गात्र से हनुमान् उनके
निकट पहुँचा और बडी प्रीति के साथ फल उनको भेंट किया, मानो कह रहा हो कि में साध्वी
सीता का शिरोरत्न आप को शीघ्र ही ला दूंगा । इसके पश्चात् वह बोला—'हे प्रभो,

१७६ रंगनाथ रामायण
आप ही शरण हैं । आपकी दृष्टि ने मेरा स्पर्श किया । मे विभूषित हुआ । मे कृतार्थ
हुआ । धन्य हुआ । मे आपका प्रिय सेवक हूँ । मेरा नाम हनुमान् है; मे वायु-पुत्र हूँ,
और सूर्य-पुत्र का मंत्री हूँ । अञ्जना-सुत हूँ । मैं भय तजकर भिक्षुक के रूप में आपके विषय
में जानने के लिए आपके पास आया हूँ । आप सुनिए । यशस्वी सुग्रीव वानरों के राजा हैं ।
और परम बलवान् है । वे सूर्य-पुत्र है और सूर्य-सम तेजस्वी है, वे अभिमानी तथा असमान
पराक्रमी है । अपने भाई वालि के द्वारा अपना सारा राज्य खोकर, अत्यंत व्याकुल हो,
वे इस पर्वत पर रहते हैं । वे दुखी है और आपके सखा बनकर रहने योग्य है ।'
इस प्रकार कहकर उसने हाथ जोड़कर राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया और बड़ी
भक्ति के साथ आगे कहा—'हे महात्माओ ! इस पृथ्वी के इन्द्र तथा उपेन्द्र के समान,
अश्विनीकुमारों के समान, रवि-चन्द्रों के समान मनोहर रूप, उन्नत स्कंध, चंद्र के समान मंद
हास से युक्त मुख, कमल-दलों को भी परास्त करनेवाले नेत्र, स्वर्ग के निवासियों की भी
प्रशंसा प्राप्त करने योग्य वाहुवलवाले, दुर्लभ राजचिह्नो से सुशोभित, धनुप धारण करनेवाले, आपने
यह मुनिवेश क्यों धारण किया है ? आप कौन हैं ? यहाँ क्यों आये हैं ?'
इस प्रकार के सुधा-मधुर वाक्यों से अत्यंत नम्र होकर जब हनुमान् ने उनसे प्रश्न
किया, तब राम उसकी वाक्-पटुता, बुद्धि-चातुरी, आकृति, मन की प्रीति तथा नीति से प्रसन्न
होकर अपने भाई से बोले—'हे लक्ष्मण, ऐसे वचन कहना ब्रह्मा के लिए या उनकी पत्नी
के लिए ही संभव है, अन्यों के लिए नहीं । कदाचित् यह (वानर) व्याकरण, निगम,
शास्त्रादि का ज्ञाता है । इसके संभाषण तथा रूप अतुल शुभ लक्षणों से समन्वित हैं ।
ऐसा दूत यदि हमें मिल जाय, तो हमारे सभी कार्य सफल होने में कोई संदेह नहीं रहेगा ।
इसलिए तुम इसे मेरे सभी कार्यों का विवरण क्रमशः सुना दो ।'
तब रामानुज ने अत्यंत प्रसन्न होकर हनुमान् को संबोधित करके कहा—'हे अनघ,
हम इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न दोनों भाई हैं । ये मेरे भाई राम हैं और मैं लक्ष्मण हूँ ।
हम दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं । राजा दशरथ की आज्ञा से तपस्वियों का-सा जीवन
व्यतीत कर रहे हैं । दुर्मति रावण हमें धोखा देकर राम की स्त्री, भूमिसुता को ले गया है ।
उसके मार्ग का अन्वेषण करते हुए हम वन में फिर रहे थे तो एक स्थान पर शबरी ने
हमें सुग्रीव का समाचार सुनाया था । वह महाबली हमारा मित्र बन जाय, ऐसी कामना
करके हम यहाँ आये हैं । अब तुम हमें स्पष्ट रूप से बताओ कि तुम कौन हो और
तुम्हारा क्या परिचय है ?'
३. हनुमान् का अपने जन्म का वृत्तांत सुनाना
तब हनुमान् ने उन रघुवंशियों को प्रणाम करके निवेदन किया—"हे महात्माओ,
अपनी प्रिय माता के गर्भ से जन्म लेने के कुछ वर्षों के पश्चात् मैंने किसी उद्देश्य से ब्रह्मा
की तपस्या की थी । तब मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर सरसिजभव ने मुझे दर्शन दिये और
बोले—'कोई इच्छा हो तो कहो ।' तब मैंने उनकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया,
सहस्रों प्रकार से उनकी स्तुति की और फिर कहा—'हे विमलात्मा, इस पृथ्वी पर मेरे
मोक्ष तथा इच्छित कार्यों की सिद्धि का आधार तथा मेरा आराध्य कौन है ? मैं किसकी

किष्किन्धाकांड १७७
प्रार्थना तथा सेवा करूँ ?' तब कमलसभव ने अपने मन में विचार करक कहा—'जो
तुम्हारे शरीर के आभूषणो को देख सकेगा, वही तुम्हारा स्वामी और प्रभु होगा । (भाव
यह है कि हनुमान् के आभूषण दूसरो के लिए अदृश्य थे ।) वही हम सब के इष्टदेव,
समस्त प्राणियो तथा इस ससार के कर्त्ता हैं, वे ही विष्णु हैं । जान लो, वे ही तुम्हारे
त्राता तथा प्रभु हैं ।'
'इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्मा चले गये । तब से मैं समस्त लोक में विचरण
करता रहता हूँ । हे राजन् ! मेरे आभूषणो की दीप्ति स्वर्ग के निवासी भी नही देख सकते ।'
'तब सौमित्र ने मारुति को देखकर कहा—'हे अनघ, सुनो, राघव की शक्ति लोक-
विख्यात है । वे अनुपम दिव्यास्त्र के ज्ञाता तथा अतुल साहसी हैं, वे करुणा के समुद्र हैं
और गंभीर प्रकृति के हैं, वे शरणागत-त्राता तथा सद्धर्म में तत्पर हैं । वे जगन्नाथ हैं,
अशरणशरण हैं, अगणित गुणों से विभूषित हैं, तेजस्वी, दिव्य पराक्रमी तथा सत्यवादी हैं ।
ऐसे महान् व्यक्ति का सेवक तथा हितेच्छु होकर मे रहता हूँ । राघव के लिए कोई कार्य
असाध्य नही हैं । कुटिल राक्षस का पता लगाकर हम स्वय सीता को ला सकते हैं ; किन्तु
परिश्रम उठाकर अकेले जाना उचित नहीं है और वह राजनीति भी नही है । इसलिए
मेरे प्रभु का विचार है कि तुम्हारे सुग्रीव को अपना मित्र बनाया जाय । अब तुम इस
कार्य को किसी तरह सम्पन्न करो ।'
तब पवन-पुत्र ने अत्यत प्रसन्न होकर अपना निज रूप दिखाया । राम-लक्ष्मण न
उसे अपनाया, इससे उसने अपने को कृतार्थ समझा । तब उसने अपनी आँखो में आनंदाश्रु
भरकर उनकी अत्यधिक स्तुति की । तत्पश्चात् राम और लक्ष्मण ने अत्यत हर्ष से अनिल-
कुमार को विदा किया । हनुमान् अत्यधिक आनद तथा उत्साह से सुग्रीव के पास पहुँचे
और उसे रघुवश के राजकुमारो का वृतात इस प्रकार कहने लगा—'हे सुग्रीव, रमणीय
रूपवाले राम-लक्ष्मण, महनीय गुणो से अलकृत होते हुए इस जगत् में विद्यमान हैं । शोक-
सागर में निमग्न होनेवाले तुम्हें, रघुराम एक नौका के रूप में मिल गये हैं । हे सुग्रीव,
अब तुम सुरक्षित हो गये । तुम्हारा प्रतिशोध पूर्ण होगा । तुम्हें पूर्ण सतोष होगा । मैं
तुम्हारे पुण्य की प्रशसा कैसे करूँ ? सच्चरित्रवान्, दयामूर्ति, सत्यवादी, आजानुबाहु, महा-
विष्णु, श्रीनिवास और पुण्यनिधि, दशरथात्मज राम ही तुम्हारे प्रभु हैं । वे महात्मा जब
अपने पिता की आज्ञा से दडकवन में रहते थे, तब दशानन उनकी पत्नी को चुराकर ले गया ।
उससे युद्ध करके उसका सहार करने के उद्देश्य से वे तुमसे मित्रता करने यहाँ आये हैं ।
इन वातो को सुनकर सुग्रीव हर्षित हुआ । उसने अनिलकुमार को देखकर कहा—
'हे पवनसुत, मेरा सारा भय दूर हो गया । मेरी तपस्या सफल हुई । तुम्हारे जैसे अजन
के प्राप्त होने से मैं राघव-रूपी निधि को देख सका । तुम्हारे जैसे कर्णधार के रहने से
मैं इस शोक-सागर को पार करने में समर्थ हुआ । तुम उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर लिवा
लाओ और मेरे मन का सताप दूर करो । अब तुम जाओ ।'
वायु-पुत्र तुरत रघुराम के पास गया और प्रणाम करके उनसे निवेदन किया—'हे
देव, श्रीमान् का मित्र सुग्रीव, आपके दर्शनो का अभिलाषी है, अत आप पधारें ।' राम
२३

१७८ रंगनाथ रामायण
मन-ही-मन हर्षित हुए और हनुमान् की प्रशंसा करने लगे । तत्पश्चात् एक पुण्य मुहूर्त्त म
अपने अनुज के साथ वे हनुमान् के कंवों पर बैठकर ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचकर अत्यत
हर्षित हुए । हनुमान ने उन्हें किसी निर्जन स्थान में ठहरा दिया और मलयाद्रि पर पहुँचकर,
श्रीराम के दर्शनों के लिए उत्कंठित सुग्रीव को देखकर कहा—'हे देव, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई ।
राम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर आ गये । तुम अब चलो । तब सूर्यपुत्र ने आनंद से
फूलकर मनुष्य-रूप धारण किया । मुकुट, केयूर आदि आभूषणों से सुसज्जित होकर अपने
मंत्रियों के साथ शीघ्र ही ऋष्यमूक पर जा पहुँचा । वह बड़ी भक्ति के साथ राम के
सामने पहुँचा और साष्टांग प्रणाम करके संतुष्ट होकर, हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़ा
रहा ।
तब राम ने सुग्रीव को गले से लगाया और मद हास की अमृत-वृष्टि करते हुए
वे सुग्रीव से बोले—'हे सूर्यपुत्र, में वायु-पुत्र के मुख से तुम्हारे पराक्रम, बाहुबल आदि को
सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ । अब तुम भयभीत मत होओ । तुम पर आक्रमण करनेवाल
तुम्हारे - शत्रु का संहार मैं करूँगा । अब तुम्हारे सिवा मेरा आप्तबंधु और विश्वास-
पात्र मित्र दूसरा कौन है ?'
इस प्रकार सांत्वना देने पर सूर्यनंदन ने कहा—'हे देव, आपने मुझे अपना प्रिय
सेवक स्वीकार किया है, आपकी करुणापूर्ण दृष्टिमात्र से में धन्य हुआ । हे सूर्य-कुल-नाथ,
मेरे जैसा सेवक आपको मिल गया है, अब आप निश्चय जानिए कि आपने रावण का वध
करके सीता को प्राप्त कर लिया । तब राम तथा सुग्रीव अग्नि के समक्ष परस्पर (एक
दूसरे की सहायता करने का) वचन देकर संतुष्ट हुए ।
उस समय अंगद ने, जो क्रीड़ा करने योग्य आयु का था, और जो विनोदार्थ वहीं
पर विचरण करते हुए खेल रहा था, राम तथा सुग्रीव के अग्नि-समक्ष दिये हुए वचनों को
सुन लिया । उसने घर जाकर अपनी माता तारा से सभी बातें कह सुनाईं । वह मन-ही-
मन अत्यंत दुःखी होती हुई कितनी ही दुःशंकाओं से पीड़ित हो उठी ।
४. सुग्रीव का सीता के आभूषणों को देना
तब वायुपुत्र ने एक विशाल वृक्ष की शाखा को तोड़कर, सुग्रीव तथा राघव के
लिए एक आसन बनाया । उस पर बैठकर वे दोनों वार्तालाप करने लगे । कुछ समय के
पश्चात् सूर्यपुत्र दोनों राजकुमारों को गुफा के भीतर ले गया और बड़े प्रेम से उन सभी
आभूषणों को लाकर दिखाया, जिन्हें सीता ने फेंका था । उसने कहा—'हे देव, जिस समय
राक्षस दण्डकवन में आपको धोखा देकर, आपकी देवी को आकाश-मार्ग से उठाकर लिये
जा रहा था, उन्होंने (सीता ने) हमें इस पहाड़ पर देखकर, ऊँचे स्वर में आपका नाम
लेकर पुकारा और अपने झीने अंचल का एक भाग फाड़कर इन आभूषणों को बाँधा और
उन्हें यहाँ गिरा दिया ।'
इतना कहते ही राम शोक-सागर में डूब गये और अश्रुधारा बहाकर उन आभूषणों
का सारा मैल धो दिया । उन्होंने उन आभरणों को अपने वक्ष पर जहाँ-तहाँ रखकर देखा।
सीता का स्मरण आते ही उनके सभी अंग शिथिल-से हो गये । उन्होंने लड़खड़ाते हुए

स्वर में लक्ष्मण को बुलाकर कहा—'लक्ष्मण, देखा तुमने ? सीता के सभी श्रृंगार इस
प्रकार मिट्टी में मिल गये हैं । भला, आभूषणों को गिरा देने का क्या अर्थ है ? इनको
साथ रखने में उसे क्या कष्ट होता ? सीता तो मेरी प्राणेश्वरी है । हाय, इस अंचल की
दशा को तो देखो ! जो भीना अंचल उसके सुडौल कुचों पर सतत रहता था, उसकी ऐसी
दशा हुई ! मेरे चरणों को गुलाबजल से धोकर, उन्हें इसी से वह पोछती थी । इसे
विजन बनाकर, अत्यन्त सुंदर ढंग से मेरे श्रम-बिंदुओं को सुखा देती थी । अपनी प्रभा-
समन्वित तनुलता की कांति बिखेरती हुई वह इसी के पाँवड़े बिछा देती थी ।' इस प्रकार
शोक करते हुए राम अश्रु बहाने तथा बार-बार मूर्च्छित होने लगे । फिर संभलकर भक्ति
के साथ सिर झुकाये खड़े सुग्रीव को देखकर रघुनाथ बोले—'हे सुग्रीव, बतलाओ कि मेरी
देवी को लेकर आनेवाला वह इन्द्र का शत्रु किस देश में रहता है ? उसका नगर कौन-सा है ?
मैं अभी उस राक्षस का संहार करके सीता को छुड़ा लाऊँगा ।'
यह सुनकर सुग्रीव बोला—'हे देव, मैं उस द्रोही का निवास नहीं जानता । फिर
भी कोई चिंता नहीं । अब मैं सब बातें जानने का प्रयत्न करूँगा । आप शोक त्यागकर
धैर्य धारण कीजिए । अत्यंत पराक्रमी वालि के द्वारा अपनी पत्नी के हरे जाने पर भी
मैं इतना दुखी नहीं हूँ । हे देव, विपत्ति-रूपी सागर को आत्मधैर्य-रूपी नौका से ही पार
किया जा सकता है । हे प्रभो, हम जैसे साधारण मानवों की तरह आप भी शोक करें,
यह कहाँ उचित है ?'
सुग्रीव के आप्त वचन सुनकर रघुवीर धैर्य धारण करते हुए सोचने लगे—'सीता के
खो जाने का ढंग जानने के पश्चात् मन-ही-मन दुखी होते रहना शूरता नहीं है । यों सोचकर
उन्होंने संताप त्याग कर सीता को किसी भी प्रकार प्राप्त करने के कार्य में प्रवृत्त होने
का निश्चय किया । किन्तु उसके पूर्व उन्होंने सुग्रीव के शत्रु का अंत करने का निश्चय
किया । सीता के आभूषण लक्ष्मण को सौंपकर वे सुग्रीव को देखकर बोले—'हे मित्र,
विद्वानों का कहना है कि विपत्ति के समय मित्र के समान कोई सहायक नहीं होते । चाहे
मित्र गुणवान् हो, या गुणहीन, विपत्ति के समय वही सहायक होता है । तुम्हारी मित्रता
प्राप्त करके मुझे किसी भी वस्तु के अभाव की चिंता नहीं रही, यह तो निश्चित है ।
अब मैं उस पापी वालि का वध करूँगा, जो तुम्हारी स्त्री का अपहरण करके तुम्हारा वध
करना चाहता है । भाइयो में स्नेह का भाव हो, तो उससे श्रेष्ठ सुख और कुछ नहीं है ।
किन्तु ऐसा स्नेह तुम में क्यों नहीं रह पाया ? तुम्हारे और तुम्हारे अग्रज में शत्रुता
क्यों हुई ? इसका वृत्तांत मुझे सुनाओ ।'
तब सुग्रीव ने कहा—'हे राम, मैं अपने और वालि की शत्रुता का वृत्तांत सुनाता हूँ,
सुनिए । (समुद्र-मंथन के समय) मंद्राचल को मथानी बनाकर, वासुकि को नेती बनाकर
जब देवताओं ने हमारे बाहुबल को जानकर हमसे प्रार्थना की, तब मैं और वालि, दोनों
मंथन के लिए एक ओर खड़े हो गये और दूसरी ओर देवता, गरुड़, उरग, असुर, सिद्ध
आदि थे । इस प्रकार जब हम क्षीरसागर का मंथन करने लगे, तब उसमें से हलाहल
निकलकर समस्त लोक को जलाने लगा, तो महादेव ने सबको आश्चर्यचकित करते हुए

उसे पी गये । उसके पश्चात् उसमें से ज्येष्ठा देवी का जन्म हुआ, तो उसे कलि
महाराज ने बड़े प्रेम से अपनाया । इसके उपरान्त कितनी ही वस्तुए उसमें से उत्पन्न हुई ।
सब ने अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार उन वस्तुओ को बडे हर्ष से ग्रहण किया । आगे
चलकर ऐरावत, मेष, महिष, मकर, करेणु (हथिनी), हय, वृषभ आदि उस सागर से उत्पन्न हुए,
तो इन्द्रादि दिक्पालो ने बडे हर्ष से उन्हें अपने-अपने वाहनो के रूप में ग्रहण किया ।
महनीय सौभाग्यवती तथा महिमामयी लक्ष्मी का जब जन्म हुआ, तब लक्ष्मीनारायण ने उन पर
आसक्त होकर अपनी पत्नी के रूप में उन्हें ग्रहण किया । तत्पश्चात् चन्द्र तथा देव-
कामिनियो का जन्म हुआ । देवताओ ने उन सुदरियो में से 'तारा' नामक सुदरी को हमें दिया,
तो हमने उसे ग्रहण किया । उसके उपरान्त हमारे मथने पर अमृत का जन्म हुआ ।
देवताओ ने बड़े प्रेम से उस सुधारस को कामधेनु और कल्पवृक्ष के साथ चन्द्र को भी लेकर
अपने निवास-स्थानो में चले गये । हम भी वहाँ से विदा हुए ।
हम अपने निवास को लौटकर बडे आनन्दपूर्वक उस सुदरी के साथ रहने लगे ।
कुछ दिनो के पश्चात् सुषेण की प्रिय पुत्री रुमा के साथ विवाह करके बड़े उत्साह से मै
जीवन व्यतीत करने लगा । मेरे पिता तथा अन्य मत्रियो ने ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण
वालि को वानर-राज्य का अधिपति बना दिया । वालि भी मेरा बडा आदर करते हुए,
राज्य करने लगा और मै भी उसका सेवक बनकर उसे पिता के समान मानते हुए दिन-
रात उसकी सेवा में लगा रहा । इस प्रकार हम परस्पर प्रेम-भाव रखते हुए जीवन व्यतीत
करने लगे ।
एक दिन की बात है कि पुरानी शत्रुता से प्रेरित होकर दुदुभि का पुत्र मायावी
नामक भयंकर राक्षस अर्द्ध-रात्रि के समय किष्किंधा नगर को भयभीत करते हुए आया,
और दुर्वार गर्व मे उसने हमें युद्ध के लिए चुनौती दी । अनुपम शील-सपन्न वालि ने क्रुद्ध
होकर मुझे साथ लेकर युद्ध के लिए निकला । हम दोनो को आक्रमण करने के लिए आते
देखकर वह राक्षस भयभीत होकर भागा और अपनी गुफा में छिप गया । तब वालि ने
मुझसे कहा—'मै इस गर्वोद्धत राक्षस को पकडकर उसका वध करके लौटूँगा, मेरे आने
तक तुम सावधान होकर यहाँ रहो, जिससे अन्य कोई यहाँ प्रवेश न कर पाये । इस प्रकार,
मुझे गुफा के द्वार पर नियुक्त करके वालि ने गुफा में प्रवेश किया । एक वर्ष पर्यन्त गुफा
में घोर युद्ध होता रहा । रक्त उमडकर गुफा के द्वार तक बहने लगा और राक्षस के
हुंकार मुझे सुनाई पडने लगे । तब मैने निश्चय कर लिया कि वालि राक्षस के हाथो मे
मारा गया है । यदि वह जान जाय कि मै यहाँ हूँ, तो वह बाहर आकर मेरा भी वध कर
डालेगा । इस प्रकार सोचकर मै एक पहाडी से उस गुफा का द्वार बद कर दिया और
वालि की तिलोदक-क्रिया करके किष्किंधा लौट आया । मत्रियो ने यह कहकर कि -वालि
की मृत्यु के बाद इस राज्य के अधिकारी तुम ही हो, विवश करके मुझे वानर-राज्य का
राजा अभिषिक्त किया । तब से मै वानरो का चक्रवर्त्ती होकर राज्य करता रहा ।
'हे राजन्, वहाँ वालि मायावी (राक्षस) का सहार करके, मुझे पुकार-पुकार कर,
हार गया । उसके पश्चात् वह द्वार पर मेरे द्वारा स्थापित पहाडी को पदाँघातो से चूर-चूर

किष्किन्धाकांड १८९
करके बाहर निकल आया । मुझे वहां न देखकर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और किष्किन्धा में
प्रवेश किया । मेरे प्रणाम को भी स्वीकार किये बिना वह गरज उठा—‘क्यों रे, तुम्हें
अपना अनुज समझकर तुम पर विश्वास करके मैं शत्रुओं से युद्ध करने गया, तो तुम इस
प्रकार मुझे धोखा देकर मेरे राज्य का अपहरण करके, उसका शासन करने लगे ? क्या
तुम्हारे लिए यह उचित है ? तुम महा पापात्मा हो । तुम्हें मारने से भी कोई दोष नहीं
लगेगा ।'
तब मैंने उसके चरणों पर गिरकर भक्ति तथा विनय के साथ निवेदन किया—
'हे भाई, एक वर्ष तक आप और मायावी युद्ध करते रहे । तब (एक दिन) मैंने गुफा से
रक्त का प्रवाह उसके द्वार तक आते देखा, तो भयभीत तथा मतिभ्रष्ट हो भागकर यहाँ
आया । मुझे देखकर मंत्रियों ने विवश करके मेरा राज्याभिषेक कर दिया । इसके अति-
रिक्त मैं कोई कपट नहीं जानता । आपका आगमन मेरे लिए शुभप्रद है । यह वानर-राज्य
आप पुनः ग्रहण कीजिए । मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि नाते से मैं आपका
भाई हूँ, किन्तु वस्तुतः मैं आपका सेवक तथा पुत्र हूँ । हे करुणानिधि, मुझसे कोई भूल
हो गई हो, तो उसे क्षमा कीजिए ।'
इस प्रकार के वचनों से मैंने बालि की बहुत विनती की, किन्तु उसका क्रोध
पग-पग पर बढ़ता ही गया । मंत्रियों ने भी उसे बहुत समझाया कि अनुज के प्रति इतना
क्रोध उचित नहीं है, किन्तु उसने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया । उसने मेरी पत्नी
रूमा को मुझसे छीन लिया, मेरा राज्य ले लिया और मेरा वध करने के लिए तैयार
हो गया । मैं भयभीत होकर भागने लगा, तो वह मेरा पीछा करने लगा । मैं सारे भूलोक में
शरण ढूंढ़ते हुए भागा और अंत में इस पर्वत पर रहने लगा, क्योंकि बालि इस पर्वत
पर चढ़ नहीं सकता ।'
तब राम ने आश्चर्य से पूछा—‘हे सूर्यपुत्र, इस पर्वत पर बालि क्यों नहीं चढ़
सकता ? इसकी कथा मुझे सुनाओ ।" तब सुग्रीव विनम्र भाव से यों कहने लगा—'पूर्व-
काल में दुंदुभि नामक दुष्ट राक्षस, वरदानों के प्रताप से प्रबल होकर तीन लोकों को
भयभीत करने लगा था । वह जंगली भैंसे का रूप धारण करके समुद्र के पीछे पड़ गया
और उसे युद्ध के लिए चुनौती दी । तब समुद्र व्याकुल हो उठा और करोड़ों रत्नों की
भेंट देकर कहा—'तुम्हारे साथ युद्ध करके श्रेष्ठ हिमाद्रि ही जीवित रह सकता है । मैं
तुम से युद्ध नहीं कर सकता ।' तब वह उस हिमाद्रि से युद्ध करने चला गया, जिसके
शृंगों ने इंद्र के बाहुस्तंभ से सम्मानित वज्रायुध के तेज को भग्न किया था । तब उस
पर्वतेश्वर ने कहा—'क्या मैं तुम्हारी बराबरी कर सकता हूँ ? इस संसार में तुम्हारा
सामना करके, तुम्हारे साथ युद्ध करने का बाहुबल केवल बालि में है । वह अपनी प्रबल
शक्ति के साथ किष्किन्धा पर राज्य कर रहा है । यदि तुम युद्ध करने की इच्छा रखते हो,
तो हे महाबली, वहीं जाओ ।'
तब वह राक्षस बड़े उत्साह से किष्किन्धा आया और प्रलय-काल के बादल के समान
गर्जन करके अपने साथ युद्ध करने के लिए बालि को चुनौती दी । तब बालि क्रुद्ध होकर

१९२ रंगनाथ रामायण
बाहर आया और गर्जन करते हुए दुंदुभि के समान ध्वनि करनेवाले उस दुंदुभि का सामना
करके बोला—'देखूँ अब तुम कहाँ जाते हो ?' इस प्रकार कहकर वालि ने शिलाओ तथा
वृक्षों को उखाड़-उखाड़कर फेंका और मुष्टि के प्रहारो से उसे व्याकुल कर दिया । जब
उसने अपने तीक्ष्ण शृंगो से वालि पर आक्रमण करना आरंभ किया, तब वालि ने क्रुद्ध
होकर, भयंकर रूप धारण करके एक पर्वत उठाकर उस पर फेंका । राक्षस ने उसे बचाकर,
स्वयं एक और पहाड़ उठाकर वालि पर फेंका । तब कपिराज ने एक बहुत बड़ा पर्वत
उस पर फेंका । राक्षस ने अपने सींगों से उन पहाड़ो को हटाते हुए, वालि के कंठ को
पकड़कर ऐसा धक्का दिया कि वालि विचलित हो उठा । तब वालि ने उसका पीछा किया
और एक वृक्ष उखाड़कर उस राक्षस पर फेंका । राक्षस उससे भी बच गया और छिपकर
वालि पर आक्रमण करने लगा । तब वालि ने एक मोटे ताड़ के वृक्ष से उस पर प्रहार
किया । राक्षस ने अपने सींगो से उसे भी उठाकर फेंक दिया, तो कपिराज ने अपनी
कठोर मुष्टिसे उस पर प्रहार करना आरंभ किया । राक्षस भी अपने सींगो से वालि को मारने लगा ।
इस प्रकार एक दूसरे पर प्रहार करते हुए एक सौ वर्ष तक दोनो घोर युद्ध करने लगे ।
तब वालि ने उसके दोनो सींगो को पकड़ कर नीचे गिरा दिया और उसका वध कर डाला ।
उसके पश्चात् उसने अपना सारा बल लगाकर लात मारी, तो उसका शव मुंह तथा
नाक से रक्त बहाते हुए वज्राघात से गिरनेवाले पर्वत की तरह, एक योजन दूर पर
जा गिरा । गेरू रंग के झरने के समान गिरनेवाली उस रक्त-धारा की कुछ बूंदें, इस
पर्वत पर भी गिरी । तब इस पर्वत पर तपस्या में निरत भयंकर शक्तिशाली मतंग मुनि ने
क्रोध में आकर शाप दिया कि वालि इस पर्वत पर न चढ़ सकेगा । हे जगन्नाथ, मैं इसी
कारण से निर्भय हो सतत इस ऋष्यमूक पर ही निवास करता हूँ । हे राजन्, दुंदुभि के
उस शरीर को एक योजन तक फेंक सकने की शक्ति वालि के सिवा और किसी में नही हैं।
यदि आप उस शव को, उससे भी दूर, न फेंक सकें, तो मैं आपकी शक्ति पर विश्वास
नही कर सकता ।'
तब राम ने मंद-मंद हँसकर कहा—'हे सूर्यपुत्र, मैं उस दुंदुभि के शरीर को वैसे ही
फेंककर तुम्हारा संदेह दूर करूँगा । मुझे वह शव दिखाओ । मेरु-मंदराकारवाले उस शव को
सुग्रीव के दिखाने पर, राम उसके पास पहुँचे और उसकी परवाह किये बिना ही, केवल
अपने अंगूठे से उठाकर उसे दस योजन दूर फेंक दिया । तब भी सुग्रीव को रघुराम की
शक्ति के महत्व पर विश्वास नही हुआ । उसने कहा—'हे देव, जब वालि ने इसे फेंका
था तब यह बहुत से रक्त-मांस से भरा था, आज तो केवल इसकी अस्थियाँ रह गईं हैं।
इसलिए आप इसे बड़े वेग से फेंक सके, इसलिए विश्वास नही होता कि आपका
बल वालि से भी अधिक है । इतना ही नही, बिना थके वालि पहाड़ो को गेंदो की तरह
उछाल सकता है; चारो समुद्रो में संध्या-वंदन करता है और शिवजी के चरणो को अपने
सिर पर धारण करता है । वायु से भी अधिक वेग से वह सभी समुद्रो को पार कर
सकता है । ऐसे वालि की, जिसे इन्द्र ने स्वर्ण-माला प्रदान की थी, कौन समता कर
सकता है ? हे राजन्, और एक बात सुनिए । यहाँ जो सात ताल-वृक्ष खड़े है, इन सभी

को बालि अपनी वर-शक्ति से एक साथ अपने हाथो में पकड़कर उनके सभी पत्तो को तोड
सकता है । इन्द्रादि देवता इन में से किसी एक ताल को भी हिला नही सकते । हे वसुधेश,
यदि आप एक बाण से इस सातो ताल-वृक्षो को गिरा सकते है, तो हम विश्वास कर सकते है
कि आपकी शक्ति बालि की शक्ति स भी अधिक है । मातग मुनि ने मुझसे कहा था कि
जो इन सातो ताल-वृक्षो को एक ही बाण से गिराने की शक्ति रखता है, उस व्यक्ति
के हाथो से बालि का नाश होगा ।'
तब राम ने मदहास करके कहा—'हे वनेचरेश्वर, उन ताल-वृक्षो को तुम अवश्य
मुझे दिखाओ । तब निपुण राम ने वज्र-सम अद्वितीय तथा निशित बाण सधान करके
चलाया, तो वह बाण, पृथ्वी पर टेढे-मेढे ढग से खडे उन ताल-वृक्षो को एक साथ ऐसे
काटकर गिरा दिया, मानो रावण की नाडियो को ही काट दिया हो । उसके पश्चात् वह
शर निकट के पर्वत को भी पार करके पृथ्वी में प्रवेश किया और पाताल तक पहुँचकर
किंचित भी अपनी गति मद किये बिना, बडे वेग से रघुराम के तूणीर में वापस आ गया ।
यह देखकर सुग्रीव आश्चर्यचकित हो अत्यधिक आनद में डूब गया और मन-ही-मन यह
सोचकर फूल उठा कि जिन ताल-वृक्षो के मूल सप्त पातालो तक गये थे, जिनके पत्र सप्त
वायुमडलो तक फैले थे, ऐसे तालो को इन्होने एक ही शर से गिरा दिया । अब मेरा सदेह
दूर हो गया । अब अवश्य ही राघव के हाथो वालि का वध होगा । मैं अब वानर-राज्य
पर शासन कर सकूँगा । तब सूर्यवश के प्रभु राम को देखकर सूर्यपुत्र ने हाथ जोडकर
कहा—'हे देव, आपका रूप देखकर मैने आपकी शक्ति की कल्पना नही करके पशु-बुद्धि
का परिचय दिया । मै सूर्यपुत्र हूँ और आप सूर्य-वश-म्भव है । अत मैने आपकी समानता
करने का विचार करने का अपराध किया । आप त्रिलोकीनाथ है । मुझ मूर्ख को अपना
सेवक मानकर मेरे शत्रु का संहार कीजिए और मुझे मेरा राज्य दिलाकर मेरा दुख दूर
कीजिए ।'
५ वालि-सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध
तब राम ने अत्यधिक कृपा-दृष्टि से सुग्रीव को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, तुम शीघ्र
ही किष्किंधा को जाओ और वहाँ बालि से युद्ध करते रहो । मैं एक ही वाण से ( वालि
का वध करके) सहज ही तुम्हें राज्य दिला दूँगा । तुम निर्भय होकर जाओ । तब विना
किसी सकोच के तथा अत्यत उत्साह से सुग्रीव ने, नल, नील, हनुमान् तथा बलवान् तार
आदि को साथ लिये युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर किष्किंधा के लिए प्रस्थान किया । राम
तथा लक्ष्मण उसके पीछे-पीछे चले । किष्किंधा के निकट एक वन में प्रवेश करके उन्होने
वहाँ से सुग्रीव को वालि पर आक्रमण करने के लिए भेजा । सुग्रीव शीघ्र किष्किंधा पहुँचा
और नगर के बाहर खडे होकर भयकर गर्जन किया और अपने साथ युद्ध करने के लिए
बालि को चुनौती दी । हाथी का चिघाडना सुनकर जिस प्रकार सिंह क्रोध में आ जाता है,
वैसे क्रुद्ध होकर, शिवजी के चरण-कमलो को प्रणाम करके, रावण के कठो को अपनी
बगल में दबानेवाले वालि ने आकर सुग्रीव का सामना किया । अप्रतिहत पराक्रमी, समान
रूप, समान क्रोध, समान शक्ति तथा समान पराक्रम रखनेवाले दोनो वानर जूझ गये और

१८४ रंगनाथ रामायण
एक दूसरे के घुटनो, जांघो, वक्षो, नाभियो तथा कटि-प्रदेशो को विचित्र ढंग से झुकाकर
इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे पूर्व तथा पश्चिम के समुद्र आपस में युद्ध करते हो ।
उसी समय राम ने अपने धनुष पर वाण का संधान करके, उसे चलाने के विचार से,
उन दोनो को देखा । किंतु उनके वदन तथा रदन, पूँछ तथा बाहु, उदर तथा अवर, उरु
तथा पार्श्व, कक्ष तथा वक्ष, पैर तथा उँगली, वीक्षण तथा शिक्षण, वेष तथा भाषा, नाक
तथा गाल, सिर तथा स्कंध, पिंडली तथा चरणयुग्म, कर्ण तथा वर्ण, कठ तथा अग, इन
सब को एक समान देखकर, यह निर्णय नही कर सके कि इन दोनो में वालि कौन है
और सुग्रीव कौन ? तब राम ने मन-ही-मन आश्चर्यचकित होकर सोचा कि यदि में
वाण चलाऊँ, तो न जाने इनमें से कौन मृत्यु-मुख को प्राप्त हो जायें । यो सोचकर वे
बिना वाण चलाये ही रह गये ।
युद्ध करते-करते अत्यधिक थक जाने पर भी सुग्रीव ने अपनी सारी शक्ति तथा
निपुणता लगाकर युद्ध किया, किन्तु वालि से परास्त हो गया । वालि की बलिष्ठ मुष्टियो
के आघातो के कारण वह घोघो की थैली के समान हो गया और लबी साँसें लेता हुआ
सोचने लगा—‘हाय रे, राम का विश्वास करके में क्यो आया ? इसका मुझे अच्छा
पुरस्कार मिला । वस, वस, अव अपना रास्ता नापने में ही मेरा कल्याण है।' यो सोचते
हुए वह सुध-बुध खोकर, अपनी पूँछ को कठ में लपेटे हुए, चारो ओर देखते तथा भूलते
हुए ऋष्यमूक पर्वत पर भागा और मन-ही-मन दुःखी होने लगा ।
ठीक इसी समय राम वहाँ पहुँचे । अनन्त विक्रमधाम राम को देखकर सूर्यपुत्र ने
सिर झुकाकर कहा—‘हे राजन्, मैने आपका विश्वास करके अपना असमान बल-विक्रम
दिखाकर वालि से युद्ध किया । किन्तु आपने मेरी उपेक्षा की, मेरी रक्षा नही की, चुप-
चाप देखते ही रह गये । सूर्य-वंश में जन्म लेकर ऐसा अधर्म करना, क्या, आपको शोभा
देता है ? हे देव, आपके सत्य तथा तेज का विश्वास करके मैंने वालि को छेडा । नहीं
तो में कहाँ और वालि कहाँ ? वालि को चुनौती देकर फिर बचकर आना असंभव था ।
शायद किसी पूर्व-पुण्य के फल से बचकर में पूर्ववत् इस पर्वत पर पहुँच सका। आपका विश्वास
करने के कारण शत्रु के हाथो से पराजय और जग-हँसाई मुझे प्राप्त हुई । आपमें दया,
साहस और शक्ति की अधिकता देखकर मैंने आपका विश्वास किया था ।'
इन वचनो को सुनकर राम बोले—'हे सुग्रीव, तुम अपने मन में इतना संदेह क्यो
करते हो ? इसमें मेरा कोई दोष नही है । क्या मैं तुम्हें शत्रु के हाथ में सौंप दूंगा ?
एक बात सुनो । विश्व-विमोहक आकारवाले विख्यात अश्विनीकुमारो के समान तुम्हारी
और वालि की रूप-रेखा समान होने के कारण मैं तुम दोनो में भेद नहीं कर सका और
बाण चलाने में मुझे भय हुआ; क्योकि यह अस्त्र अमोघ है । इसलिए तुम इसे बुरा मत
समझो । इस बार तुम इन गज-पुष्पो की माला पहनकर वालि से युद्ध करो । मैं अवश्य
ही वालि का वध करूँगा । संदेह मत करो, दृढ़ निश्चय से युद्ध के लिए किष्किंधा
के लिए प्रस्थान करो।' यो कहकर उन्होने अपने प्रिय अनुज से गज-पुष्पो की माला मँगवाकर
उसे सुग्रीव के कंठ में पहनाया । तब सुग्रीव नक्षत्रो से घिरे हुए चन्द्र के समान,