रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 157, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंआरण्यकांड १२७
में ब्राह्मणों को खानेवाला हूँ । मेरा नाम विराध है । में क्रोध में आता, हूँ, तो इन्द्र आदि
देवताओ को भी निगल जाता हूँ; फिर मनुष्यो की क्या बात ? अब तुम्हारा कुशल इसी में है
कि इस रमणी को मुझे सौंपकर, तुम यह वन छोड़कर चले जाओ । अन्यथा मेरे हाथ के
शूल के वार की प्रतीक्षा करो ।'
सौमित्र ने सीता की भीति, तथा राक्षस का गर्व देखकर कहा—'हे राक्षस, ये
पृथ्वी की पुत्री, पुण्यवती, साध्वी, राम की पत्नी हैं, उन्हें ले जाना तुम्हारे लिए उचित नही है ।
अब तुम ले भी कहाँ जा सकते हो ? मैं अभी तुम्हें पकड़कर तुम्हारा वध कर डालूँगा ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होंने क्रोध से धनुष पर बाण-संधान करके उसके
वक्ष स्थल पर चलाया । तब विचित्र ढंग से अट्टहास करते हुए बड़े क्रोध से उसने शूल को
घुमाकर उनपर फेंका । घने बादलो से छूटकर नीचे गिरनेवाली बिजली के समान
आनेवाले उस शूल को राम ने अपने दो बाणो से काट दिया । इसपर और भी क्रुद्ध होकर
उसने सीता को पृथ्वी पर गिरा दिया । उस राक्षस के हाथो से मुक्त होकर बादलो से
निकलकर आकाश-मार्ग से पृथ्वी की ओर बिजली की तरह आनेवाली छटपटाती हुई सीता
को राम ने गरुड-अस्त्र की सहायता से पृथ्वी पर उतार लिया ।
इसके पश्चात् राम ने उस राक्षस पर कई बाण चलाये, किन्तु वह उनकी जरा
भी परवाह न करके अट्टहास करने लगा । वह बड़े वेग से आया और अपने हाथो से
राम और लक्ष्मण को उठाकर अपनी पीठ पर लादकर वहाँ से शीघ्रता से जाने लगा ।
जानकी यह देखकर विलाप करने लगी । राम और लक्ष्मण ने अत्यत क्रोध से बिजली के
समान चमकनेवाले अपने खड्गों को म्यान से निकालकर उसके दोनो हाथो को काट डाला ।
तब धराशायी होनेवाले पहाड़ की तरह वह राक्षस पृथ्वी पर लोटने लगा । फिर भी
उसे जीवित देखकर राम-लक्ष्मण ने अपने पदाघात तथा मुष्टियो के प्रहार से उस राक्षस
को चूर-चूर कर दिया । (यह देखकर) सभी मुनि साधुवाद देते हुए उनकी प्रशंसा
करने लगे ।
इसके पश्चात् राक्षस गंधर्व का रूप धारण किये हुए विमान में बैठकर राम से
बोला—'मैं गंधर्व हूँ, मेरा नाम तुम्बुरु है । रंभा के साथ रति-क्रीड़ा में तल्लीन रहने हुए,
कुबेर की सभा में उपस्थित न हो सकने के कारण कुबेर ने मुझे राक्षस का जन्म लेने का
शाप दिया था । आपके बाहुबल के प्रताप से मेरा शाप-मोचन हुआ । अब मैं जा रहा हूँ ।
आप मेरे शरीर को यही गाडकर शरभंग मुनि के आश्रम में जाइए ।'
इस प्रकार कहकर प्रणाम करके वह वहाँ से चला गया । उसके शरीर को वही
गाड़कर श्रीराम ने सीता को बड़े स्नेह से गले लगा लिया और उनका भय दूर किया ।
उसके पश्चात् उन्होने अपने अनुज से कहा—'क्या इस पृथ्वी में ऐसे दुर्गम वन कही हो
सकते हैं ? हमें शीघ्र ही सीता को लिये हुए इस वन को पार कर जाना चाहिए ।
४. श्रीराम का शरभंग के आश्रम में पहुँचना
इस प्रकार सोचकर, शरभंग के दर्शन करने की अभिलाषा से राम उनके आश्रम
की ओर चले । उस समय उन्होने उस आश्रम के ऊपर से उदित सूर्य की भाँति प्रकाशमान