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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

१. चित्रकूट से प्रस्थान
चित्र-विचित्र वस्तुओ के आगार 'चित्रकूट' में निवास करते हुए और मुनियो की
प्रशसा प्राप्त करते हुए राम ने भरत के आगमन की बात सोचकर निश्चय किया कि अब
मुझे यहाँ निवास नही करना चाहिए । वे सोचने लगे कि अगर मै यहाँ रहूँ, तो अयोध्या-
वासी यहाँ पर अक्सर आते रहेंगे । अब भी गज, रथ तथा अश्वो के आने से वन का
बहुत-सा भाग नष्ट हो गया है । इसके अतिरिक्त परम सयमी मुनि मुझसे अनुरोध कर
रहे है कि मै खर-दूषण आदि राक्षस-समूह के अत्याचार दूर करूँ । (इसलिए मेरा यहाँ
से चला जाना आवश्यक है ।)
इस प्रकार सोचकर दूसरे दिन उन्होने चित्रकूट के मुनियो की आज्ञा प्राप्त की और
वहाँ से चलकर अत्रि मुनि के आश्रम में पहुँच गये । मुनि ने अपने शिष्यो के साथ बडे
स्नेह से राम की अगवानी की और उन्हें आश्रम में ले जाकर कई प्रकार से उनका आदर-
सत्कार किया । मुनि-पत्नी अनसूया ने बडे प्रेम से सीता का आतिथ्य किया । उन्होने
सीता को पातिव्रत्य-धर्म का उपदेश किया, अपने सगे-सबंधियो को छोडकर पति के साथ
वन में रहने के उनके निश्चय की प्रशसा की । इसके पश्चात् अनसूया ने सीता को विभिन्न
प्रकार के अगराग, कभी न मुरझानेवाले फूल और कभी मैले न होनेवाले वस्त्र दिये ।