रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकांड ११९
राम अपने भाई को उठाकर हृदय से लगाते हुए बोले—“हे भरत, यह कैसी बात है
कि तुम बालको की तरह धर्म-मार्ग को छोड़ने की सलाह दे रहे हो ? माता कैकेयी
को अपशब्द क्यो कह रहे हो ? अब तुम स्वंय पिता की मृत्यु के लिए क्यो दुख
कर रहे हो ? मिट्टी, मिट्टी में मिल गई है । ऋणानुबंध (पूर्वजन्म का ऋण) रूप में
पुत्र, मित्र, कलत्र प्राप्त होते तथा बिछुड़ते रहते हैं। मनुष्य के लिए पृथ्वी पर जन्म लेते
ही मृत्यु निश्चित है । यह जानकर जो नर अपने कुलोचित धर्म के मार्ग में प्रवृत्त रहता है,
वह परम भव्य होता है । हमारे पिता ने सत्यनिष्ठा से नीतिनय-सपन्न होकर महान्
यज्ञ-दान आदि कितने ही सत्कार्य किये, राजभोग का प्रचुर अनुभव किया, हम जैसे पुत्रो
का मुंह जी भरकर देखा, और तब वे प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए स्वर्ग सिधारे है ।
उनके लिए शोक करना उचित नही है ।, उनके आदेश को ठुकराना ठीक नही है ।
पितृ-वचन का पालन करना पुत्र का प्रिय धर्म होना चाहिए । जो पुत्र ऐसा करता है,
वही विख्यात होता है । पिताजी ने मुझे चौदह वर्ष तक वन में रहने तथा तुम्हें राजसुख
का भोग करने का आदेश दिया है । अत, हम वैसे ही रहें । इसके विरुद्ध तुम और कुछ
भी न कहो ।”
तबतक सूर्यास्त हो चला था । रात्रि अत्यंत प्रीति से कटी । दूसरे दिन प्रात काल
ही सध्या आदि से निवृत्त होकर रघुराम कुशासन पर विराजमान हुए । वसिष्ठ आदि मुनि
तथा अन्य मंत्री चारो ओर बैठे । सभा में भरत उठे और हाथ जोडकर बोले--“हे देव,
आपकी आज्ञा को शिरोधारण कर पिता के वचन के अनुसार सारा राज्य-भार मैंने ग्रहण
कर लिया है । मैं अपना वह राज्य आपको दे रहा हूँ । अब आप और कुछ न कहें ।
समस्त पृथ्वी का भार अपने सिर पर धारण करने की क्षमता आदिशेष को हो सकता है,
किन्तु जल-सर्प का बच्चा उसे कैसे वहन कर सकता है ? मै वैसा ही एक बालक हूँ ।
इतनी विशाल पृथ्वी का भार कहाँ और मै कहाँ ? क्या सत्पुरुषो की रक्षा का भार मै
सँभाल सकता हूँ ? बालारुण से सुशोभित होनेवाले उदयाचल पर जुगनू का प्रकाश जैसा
दिखाई देगा, आप श्रीनिधि के सिंहासन पर मेरा बैठना भी वैसा ही दिखाई देगा ।
इसलिए, आप मुनि-वेश को त्यागकर अयोध्या लौट चलिए और अपने शील से राज्य करते
हुए सारी प्रजा की इच्छा पूर्ण कीजिए । आप इसके विरुद्ध कुछ मत कहिए । यदि आप
इसे स्वीकार नही करेंगे, तो मै आपके सम्मुख ही प्राण-त्याग कर दूंगा या सौमित्र की तरह
आपकी सेवा करते हुए यही रह जाऊँगा ।” इस प्रकार कहते हुए भरत दर्भासन पर (प्राण
त्याग करने को) लोट गये ।
राघव ने अपने अनुज को उठाकर कहा--“भरत, यह कैसी बात है ? ऐसा कहना
क्या तुम्हारे लिए उचित है ? अपने पिताजी की आज्ञा का विचार तुम बिलकुल करना
नही चाहते हो ? महाराज दशरथ के साथ तुम्हारी माता का विवाह करते समय तुम्हारे
नाना ने महाराज से यह वचन माँगा था कि आप मेरी पुत्री द्वारा उत्पन्न संतान को ही
राजा बनायेंगे । राजा के वचन देने पर ही विवाह संपन्न हुआ था । उस वचन को दृष्टि
में रखकर ही कैकेयी ने देवासुर-युद्ध में राजा के द्वारा दिये गये वरो को माँगा । तुम्हें