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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 508 में से

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पृष्ठ 158

१२८ रंगनाथ रामायण
अश्वो से युक्त, श्वेत छत्र से आवेष्टित, देवताओ से भरे एक विमान को चारो ओर उज्ज्वल
मणियो की आभा विकीर्ण करते जाते हुए देखा । उस विमान में विराजमान कल्याणगुण-
सपन्न व्यक्ति को देखने की इच्छा से राम तेजी से आगे बढ़े, किन्तु इतने में वह विमान
आँखो से ओझल हो गया ।
राम ने मुनि के आश्रम में पहुँचकर, मुनि को प्रणाम किया और मुनि का सत्कार
ग्रहण करने के पश्चात् बड़े प्रेम से मुनि को देखकर पूछा—'हे मुनीश्वर आपके दर्शनार्थ
हमारे आते समय एक विमान अपना प्रखर तेज विकीर्ण करते हुए यहाँ से निकल गया था ।
वह यहाँ क्यो आया था और कहाँ चला गया है ? उस विमान में कौन विराजमान थे ?
आप कृपया बतावें ।'
तब मुनि बोले—'हे देवेन्द्र-शत्रु । वह देवेन्द्र था । हे देव, ब्रह्मलोक जाने का
आमंत्रण देने के लिए वह देवताओ के साथ देवलोक से यहाँ आया था । हे रामचंद्र,
मुझे मालूम था कि आप यहाँ पधारेंगे । आपका पूजा-सत्कार करने के पश्चात् जाने का
निश्चय करके मैने उससे कह दिया कि मै अभी नही आऊँगा । तुम चाहो तो जा सकते हो ।
इन्द्र भी बहुत दुःखी होकर, वनवास (के दुःख) से खिन्न आपको न देख सकने के
कारण, यहाँ से चला गया है । इतने में आप भी यहाँ आ पहुँचे । हे राजन्, आपके
प्रसाद से मैने बड़ी निष्ठा से, अपना तप निर्विघ्न समाप्त किया है । यज्ञ भी सफल हुआ ।
मै आपके दर्शन कर सका । आप अब सयमी सुतीक्ष्ण के दर्शन करके उनके यहाँ रहिए ।
मै अब ब्रह्मलोक में जाऊँगा ।' इस प्रकार कहने के पश्चात् उस मुनीश्वर ने राम के
सम्मुख ही अपने शरीर को मत्र-रत करके, अग्नि में दहन कर दिया और इन्द्र आदि
देवताओ की सेवाएँ प्राप्त करते हुए ब्रह्मलोक को चले गये ।
तब उस आश्रम के निवासी संयमी, वायुसेवी, वैखानस, मौनव्रती, पर्णशाला-विहीन,
भूमिशायी, मननशील, उदात्त मुनि, एकांतवासी, अनशनव्रती और पंचाग्नियो के मध्य
तपस्या करनेवाले, सभी तपस्वी झुंड-के-झुंड दयालु रामचंद्र के पास आये और बोले—
'हे राम, आप पिता की आज्ञा का पालन करने में अत्यंत तत्पर है, सत्यव्रती है और
निर्मल यश के आगार है । आप जैसे राजा के रहते हुए क्या हमें राक्षसो के उपद्रवो से
पीड़ित होना चाहिए ? व्रत की रक्षा करनेवाले राजा को भी उस व्रती के पुण्य का एक
चौथाई भाग मिलता है । अब आप सभी दैत्यो का सहार करके हमारे तपोव्रत को सफल
बनाइए । हम आपकी शरण में आये है ।' शरणागत के रक्षक होने के कारण राम ने
उन आश्रमवासी मुनियो को अभयदान दिया और कहा—'आपकी कृपा से बलवान्
राक्षसो के उपद्रवो को मै दूर करूँगा । आप दुःखी मत होइए ।'
५. श्रीराम का सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुँचना
इसके पश्चात् वे भयंकर वन-प्रात में से होते हुए महान् मतिमान् सुतीक्ष्ण मुनि के
आश्रम में पहुँचे । उस मुनि की परिक्रमा की और अपना नाम कहकर उन्हें प्रणाम किया ।
सुतीक्ष्ण मुनि ने राम को आशीर्वाद देकर उनका उचित आदर-सत्कार किया और उसके
पश्चात् बोले—"हे अनघ, जबसे आपके मुनि-वेश धारणकर चित्रकूट में पहुँचने का समाचार