रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ रंगनाथ रामायण
इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होंने वडे प्रेम से उनका अतिथि-सत्कार किया और
असमान दिव्यास्त्र, शस्त्र, कोदड तथा कवच आदि प्रदान किये । उन सवको ग्रहण करके
रामचंद्र ने वही उनके सत्सग में रात्रि विताई ।
दूसरे दिन सध्या आदि से निवृत्त होने के पश्चात् परमात्मा राम ने उस मुनिश्रेष्ठ
को प्रणाम किया । तब उनको आशीर्वाद देकर भविष्य के कार्य की सभावना करके उस
धीमान् कुभसभव ने अत्यत आदर के साथ रामचद्र को सबोधित करके कहा—'हे राम !
तुम उस पचवटी में जाकर रहो, जिसके प्रागण में गोदावरी नदी के पुण्य जल से शीतल
वनाये गये तथा मद-मद चलनेवाले पवन के प्रभाव से लता-रूपी नर्त्तकियां नृत्य करती
रहती है, और जो जटाधारी धूर्जटि के लिए पूज्य है । कुभसभव की आज्ञा लेकर रघुवर
उस स्थान के लिए रवाना हुए ।
८. जटायु से मित्रता
मार्ग के मध्य में उन्होंने एक खगराज को देखा, जो पखो से युक्त कुल-पर्वत के
समान था । राम ने सोचा कि यह भी कोई राक्षस होगा, इसलिए उससे प्रश्न किया कि
तुम कौन हो ? तब वह पक्षी वडे हर्ष से कहने लगा—'हे राम, मेरे पिता, गरुड के
अग्रज, कश्यप के पुत्र तथा सूर्य के सारथी महात्मा अरुण हैं । सपाति मेरे अग्रज हैं ।
मैं आपके पिता का मित्र हूँ, आपका हितैषी हूँ, पराया नहीं हूँ और मैं महान् साहसी हूँ।
मेरा नाम जटायु है । यह वन असुर-राजा के अधीन है, इसलिए (आप) सीता की
रक्षा सावधानी से करते रहिएगा ।' तब राम ने उसे अपने पिता दशरथ के समान
मन में मानकर वडे स्नेह से उसकी पूजा की और वहाँ से चलकर पचवटी में जा पहुँचे ।
वहाँ के श्रेष्ठ तपस्वी तथा मुनियो को वडी भक्ति से प्रणाम करके राम ने उनका सत्कार
ग्रहण किया और फिर लक्ष्मण तथा सीता को देखकर बोले—'हमने कई प्रकार के पुण्य
आश्रमो को देखा है, किन्तु ऐसी गौतमी गगा (गोदावरी), ऐसे सरोवर, ऐसे वृक्ष और
ऐसे आश्रम कही नही देखे । हम आज से यही रहेंगे ।'
इस प्रकार वे अत्यत हर्षित हुए और वहाँ के मुनियो की अनुमति प्राप्त करने के
पश्चात् स्वय तथा लक्ष्मण ने उसी दिन वडी तत्परता से एक सुदर पर्णशाला वनाई ।
तत्पश्चात् आप और लक्ष्मण ने उसकी पूजा की और भूसुता (सीता) के साथ उस पर्ण-
शाला में प्रवेश किया । इस प्रकार वे छह मास तक वडे सुख से वहाँ रहे ।
९ हेमत-वर्णन
तब समस्त पृथ्वी को तथा दसो दिशाओ को कुहरे से आच्छादित करते हुए हेमत
ऋतु का आगमन हुआ । एक दिन प्रात काल ही सीता के साथ स्नान करने के लिए
जाते समय राम ने लक्ष्मण को देखकर कहा—'हे लक्ष्मण, तुमने शीतकाल की महिमा देखी है ?
चारो ओर हिम इस प्रकार आच्छादित हो गया है, मानो सभी दिशाएँ ठड से
भीत होकर श्वेत कौशेय धारण किये हो । सारी पृथ्वी पर गिरी हुई ओस की वूँदें जमकर
ऐसी दिखाई दे रही हैं, मानो हेमत ऋतु-रूपी वादल ने समस्त आकाश में व्याप्त होकर