रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकांड ९३७
यदि यह नही बताओगे, तो में तुम्हें अवश्य निगल जाऊँगी और अपना क्रोध शान्त करूंगी ।
आज में तुम्हें छोडनेवाली नही हूँ ।'
इस प्रकार गरजती हुई वह उन मुनियो के निकट पहुँची । मुनि भयभीत होकर
उससे बोले—'हे शूर्पणखा, सुनो । मुनि-वेष धारण किये हुए एक मानव, तुम्हारे पुत्र का
वध करके, फल आदि इकट्ठा करके, उस पर्णशाला में जाकर अविचलित मन से रहता है ।
वहाँ जाओ, तो तुम्हें सभी बातो का पता चल जायगा ।'
तब वह दुर्मति राक्षसी क्रोध से लक्ष्मण के चरण-चिह्न का अनुसरण करती हुई
(राम की पर्णशाला की ओर) चली । इधर मुनि लोग हर्षित होने लगे कि यह बाघ
को छेडेगी और अवश्य ही रघुवशी इसे उचित दड देकर भेजेंगे । सभी दैत्यो के नाश
का यह मूल कारण बनेगी ।
तब राक्षस राजा की बहन शूर्पणखा ने समय का विचार करके ऊँची नाक, उग्र
भाव, बडी-बडी आँखें, दाढो से युक्त जबडे, विशाल उदर, बिखरे केश, खुला हुआ मुँह,
काला शरीर, लबी जीभ, विशाल काया और क्रूर दृष्टि आदि धारण किये और स्त्री-
रूप में राम के निकट इस प्रकार पहुँची, मानो वह अत्यत भयकर गति से आनेवाला विष हो
या समस्त लोको को निगलने के निमित्त आनेवाला भूत हो, या दैत्य-वश के नाश का
समय आसन्न जानकर पृथ्वी पर उतर आई हुई मृत्यु ही हो ।
उसने जब इदीवरश्याम, सूर्य-प्रभा-सम तेजस्वी, सौंदर्य में काम को भी लजानेवाले,
जगदभिराम, दैत्यो का नाश करनेवाले, राम को देखा, तो तुरत वह काम-पीडित हो गई ।
वह अपने-आपको भूल गई और तमोगुण से प्रेरित होकर अपने को समस्त लोक की सुदरी
मानने लगी । उस राक्षसी ने अपने चौडे मुख से उनके (राम के) मनोज्ञ मुख की,
अपने विशाल उदर से उनके क्षीण उदर की, और अपनी तिरछी आँखो से उनके
विशाल नेत्रो की तुलना करके अपने में और रामचन्द्र में बिलकुल समानता देखने लगी ।
तब उसने निश्चय कर लिया कि यही मेरे लिए उचित पति है । तदुपरान्त उसने सूप-
जैसे अपने मुख पर हँसी प्रकट करते हुए कहा—'धनुष-बाण धारण किये, पत्नी के साथ
तुम इन अगम्य वनो में क्यो भ्रमण कर रहे हो ? इस वेश में तुम क्यो रहते हो ? तुम
कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है ?
इन वचनो को सुनकर राम ने मद-मद हँसकर उस राक्षस-रमणी से कहा—
हे मनोहरसुदरी, मेरा नाम राम है । मेरे पिता महाराज दशरथ है । इस पर्णकुटी में रहने-
वाला मेरा अनुज है । यह पद्माक्षी मेरी पत्नी सीता हे । पिता की आज्ञा से में इस
वन में तपस्वियो की तरह रहता हूँ । हे युवती, तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?
आज हमारे यहाँ तुम क्यो आई हो ? तुम्हारे हाव-भाव, तुम्हारा यौवन-रूप तथा तुम्हारी
सुदरता, क्या अन्य किसी रमणी में है ?'
इन बातो को सुनकर शूर्पणखा ने राम को सबोधित करके कहा—'मैं विश्रवसु के
पुत्र, समस्त ससार का शत्रु, विक्रम-यशोधन, अमित शक्तिशाली रावण की बहन हूँ ।
मेरा नाम शूर्पणखा है । मैने तुम्हारे रूप की अपने रूप के साथ तुलना की है और मुझे
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