सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

१९८ रंगनाथ रामायण
यहाँ चले आये। आपके दुख में तड़पते हुए सातवें दिन महाराज दशरथ ने अपन प्राण
छोड़ दिये। मैं पितृ-कर्मों क्रो पूरा करके आपके दर्शनार्थ यहाँ आया हूँ।'
यह समाचार राम को वज्र के संमान लगा, और वे तुरत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर
गिर पड़े। सीता तथा लक्ष्मण भी मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गये। थोड़ी देर के पश्चात्
राम कुछ संभले और वार-वार विलाप करने लगे। तब उन्हें देखकर भरत ने कहा—
'हे देव, धीर होते हुए भी जड़ के समान इस प्रकार विलाप करना आपको शोभा
नही देता। आप, लक्ष्मण तथा सीता महाराज की परलोक-क्रिया विधिवत् पूरा कीजिए। यही
उचित है।'
तब राम मदाकिनी नदी के तट पर पहुँचकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर वडी
निष्ठा से अपने पिता की तिलोदक-क्रिया की, पिंड-दान किया और अत्यधिक शोकाकुल
चित्त से पर्णशाला में लौट आये। उस समय वसिष्ठ, कौसल्या आदि अवरोध-जन (रानवास
की स्त्रियाँ), नगरवासी, नातेदार, सुशील मत्री आदि के साथ पर्णशाला में पहुँच गये।
शोकाग्नि से सतप्त होनेवाले राम, सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनके चरणो में गिरे और
रोने लगे। यह देखकर वे सब भी रोने लगे। तब वसिष्ठ ने सात्वना के शब्दो से उन्हें
शांत किया।
तब वनवास के कारण विवर्ण दीखनेवाली सीता को देखकर कौसल्या मन-ही-मन
विधि को कोसती हुई अत्यत दुःखी होने लगी। उसी समय उस पर्वत पर रहनेवाली
किंनर, यक्ष, गरुड, उरग तथा अमर-कामिनियाँ वहाँ आ पहुँचीं और कौसल्या से कहने
लगीं—'राम की पत्नी, दशरथ की बहू, महाराज जनक की पुत्री (यहाँ) विविध सकटो
का अनुभव कर रही है। विधि-विधान के लिए कोई वात असंभव नहीं है।'
उसके पश्चात् राम ने सीता के साथ अनघ वसिष्ठ के चरणो की वंदना की, मुनियो
माताओ, नातेदारो, मित्रो तथा मत्रियो को कुशासनो पर बिठाया और आप भी कुशासन
पर बैठ गये। तब भरत की वेश-भूषा देखकर राम बोले—'हे वत्स, तुम जटाएँ तथा
वल्कल क्यो धारण किये हुए हो? राजा की आज्ञा का पालन करते हुए तुम शीघ्र जाकर
राज्य-भार ग्रहण करो।' इन वचनो को सुनकर भरत ने राम के मुख-कमल को देखते हुए
हाथ जोडकर कहा—'हे देव, हे राघव, कैकेयी ने असहनशीला हो, आपके महत्त्व से
अनभिज्ञ हो, आपको वन जाने का आदेश देकर महान् पाप किया, तो क्या आपको यह
उचित था कि आप तुरत यहाँ चले आये? आपके वियोग से दुःखी हो, महाराज दशरथ
भी स्वर्ग सिधारे। मेरी माता ने ऐसे घोर पाप किये हैं। क्या इसके कारण वे नरक-कूप
में नहीं गिरेंगी? राज्य आपका है। मैं उसे सँभालने में असमर्थ हूँ। आज ही आप
अयोध्या को लौट चलिए और शुद्ध मन से राज्य-भार ग्रहण कीजिए। पति को खोकर
अत्यधिक शोक से पीड़ित होनेवाली माताओ को सात्वना दीजिए। मित्रो, मत्रियो, वधुओ
तथा प्रजा-जन पर कृपा दृष्टि रखते हुए उनको अपनाइए। हे दयामय, मैं आपका दास हूँ,
मुझे अपनाकर मेरी विनती को स्वीकार कीजिए।' इस प्रकार कहते हुए भरत राम के
चरणो पर गिर पडे।