रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ रंगनाथ रामायण
फिर उन्होंने सीता से कहा—'हे रमणी, तुम मुझे यह बताओ कि स्वयंवर में राघव ने
तुम्हें कैसे प्राप्त किया।' तब (सीता) अपने पति की ओर देखकर व्रीड़ा से अभिभूत हुई
और मंद-मंद मुस्कुराती हुई बोली—'हे माता, सुनिए। मिथिला के अधिपति जनक के,
यज्ञ-शाला के लिए भूमि जोतते समय मेरा जन्म हुआ। इस कारण मेरा नाम सीता पड़ा।
संतानहीन होने के कारण राजा ने बड़े स्नेह से मेरा पालन-पोषण किया। युवावस्था
को प्राप्त होनेवाली मुझे देखकर उन्होंने सोच-विचारकर घोषित किया कि हमारे
घर में स्थित शिव-धनुष का जो संधान करेगा, उसी के साथ मैं इस कन्या-रत्न का विवाह
करूँगा। इस समाचार के पाते ही अनेक राजा वहाँ आये, किन्तु वे शिव-धनुष को उठाकर
उसका संधान न कर सकने के कारण वापस चले गये। कुछ दिनों के पश्चात् विश्वामित्र
की सेवा करने के उपरान्त राघव वहाँ आय। उन्होंने शिव-धनु को इस प्रकार तोड़ दिया,
जैसे हाथी ईख को तोड़ डालता है। तब उन्होंने मेरा पाणि-ग्रहण किया।'
इस प्रकार सीता के अपने विवाह का वृत्तांत सुनाने पर अनसूया हर्षित हुईं।
तबतक रवि पश्चिम समुद्र में डूबने लगा। राम ने संध्या आदि नित्य-कर्मों को पूरा किया
और अत्रि का सत्कार ग्रहण किया तथा उनकी सत्संगति में रात वहीं बिताई।
२. राम का दण्डक-वन की यात्रा करना
दूसरे दिन प्रातःकाल ही संध्या आदि कर्मों से निवृत्त हो अत्रि की आज्ञा लेकर
राम ने उस दण्डक-वन में प्रवेश किया, जो सरल ताल, तमाल, साल, कपिला, कुरवक,
अगर, कुटज आदि वृक्षों से भरा हुआ था, जो सूर्य के समान तेजस्वी मुनियों का निवास-
स्थान था और जो गेंडा, सिंह, हाथी, नीलगाय जैसे मृगों तथा 'गंड भेरुण्ड' (दो शिरो-
वाला एक पक्षी) जैसे पक्षियों से पूर्ण था। ऐसे वन में प्रवेश करके वेद-घोष से प्रति-
ध्वनित होनेवाली तथा हवनकुंडों से पवित्र पर्णशालाओं में पवन, जल तथा सूखे पत्तों
का आहार करते हुए तपश्चर्या में लीन मुनियों के निवासों तथा तपस्वियों के आश्रमों
के दर्शन करते हुए, राम अपने अनुज के साथ मुनियों का आतिथ्य ग्रहण करते हुए यात्रा
करते रहे।
३. विराध का वध
इस प्रकार उस दण्डक-वन में जाने समय, पर्वत के समान आकार, भयंकर आँखें,
बड़ा मुंह और नासिका तथा दीर्घकाय विराध नामक भयंकर राक्षस, अपने अट्टहास से सारे
आकाश को कँपाते हुए और वन को चीरते हुए आया और अपनी बलिष्ठ तथा पैनी चोंच
तथा बाहुओं में कुंचित केशोंवाली सीता को इस प्रकार आकाश की ओर उड़ा ले गया, जैसे
गरुड पक्षी सँपोले को उड़ा ले जाता है। फिर, जानकी की दशा देखकर दुःखी होनेवाले
राम तथा लक्ष्मण को संबोधित करके उसने कहा—'क्यों रे, तुम्हारा कितना साहस है कि
तुम वीरों की तरह निर्भय होकर धनुष-बाण धारण किये इस वन में विचर रहे हो, जिसमें
मैं रहता हूँ। आखिर तुम्हारा भुजबल कितना है? मेरी माता शतह्रद है और मेरे
पिता जय हैं। किसी भी आयुध से न मरने का वर मैंने पहले ही ब्रह्मा से प्राप्त किया है।'