रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकांड १३५
तब राघव ने उन मुनियो से पूछा--'हे महात्मा, कृपया बतलाइए कि उसने किस
देवता के प्रति इतना घोर तप किया और वह खड्ग कहाँ से आया ?' तब मुनियो ने
राम से कहा--"पूर्वकाल में अपने बल-विक्रम से सभी दिशाओ को जीतने के लिए जाते
समय दशकंठ ने किसी दूसरे पर विश्वास न करके, अपने बहनोई, पराक्रमी विद्युज्जिह्व
को बुलाकर कहा था--'सावधान होकर लका की रखवाली करते रहना ।' इस प्रकार
उसे लका की रखवाली करने के लिए नियुक्त करके वह चला गया ।
"इसके पश्चात् विद्युज्जिह्व ने मन-ही-मन सोचा--मै सभी मायाओ को जानकर
दशकंठ को लकापुर में प्रवेश नही करने दूंगा और खुद लका को हस्तगत कर लूंगा । यो
सोचकर वह पाताल-लोक में चला गया और वहाँ प्रमुख राक्षसो के पास रहते हुए महान्
माया-युक्त मंत्र-तंत्र, ग्रहवाद, अखिलवाद, गारुड क्रियाएँ, विषवाद, रसवाद आदि विद्याएँ
सीखी और वही रहते हुए तरह-तरह की मायाओ को सीखने में तत्पर रहा । इधर रावण
सभी दिक्पालो को जीतकर लका लौट आया । विद्युज्जिह्व का सारा हाल जानकर वह
अत्यंत क्रुद्ध हुआ और आँखो से अग्नि-वर्षा करते हुए कहने लगा--'मेरी आज्ञा का पालन
किये बिना ही यह (विद्युज्जिह्व) मायाओ के जानने गया है । मै भी देखूंगा, उसकी
समस्त मायाओ को आज मै मटियामेट कर दूंगा ।' यो कहते हुए वह पाताल-लोक में
गया तो 'असमय' नगरवासी सभी राक्षस भयाकुल हो गये । रावण ने अत्यधिक क्रोध से
अपनी तलवार को म्यान से निकालकर, इसका विचार भी नही करके कि यह मेरा बहनोई है,
मेरी बहन का पति है, विद्युज्जिह्वा का पीछा करके उसका वध कर डाला ।
"इसके बाद वह लका लौट आया और अपनी बहन शूर्पणखा को बुलवाकर उसे
सात्वना दी और कहा--'तुम अपनी स्वेच्छा से विचरण करती हुई, अपनी इच्छा के अनु-
कूल किसी भी पति का वरण करके निर्भय ससार में रहो ।' उस समय शर्पणखा को
छह मास का गर्भ था । यथासमय उसने जबुकुमार नामक एक भयंकर तथा बलशाली
पुत्र को जन्म दिया । वह जब बडा हुआ, तब उसने अपनी माता से अपने पिता की मृत्यु
का समाचार जान लिया और अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया ।
उसने सोचा--यदि मै ब्रह्मा की तपस्या करूँ, तो वे मेरी इच्छा पूरी नही करेंगे, शिव की
तपस्या करूँ, तो रावण शिवभक्त होने के कारण वे उस पर क्रोध नही करेंगे, यदि विष्णु
की तपस्या करूँ, तो न जाने कब वे प्रसन्न होगे और कब मै प्रतिशोध ले सकूँगा । कहते है
कि हरि, हर तथा ब्रह्मा ये तीनो सूर्य के रूप में रहते हैं । इसलिए में सूर्य के प्रति
तपस्या करके उनकी कृपा प्राप्त करूँगा तथा दनुजो के नेता दशकंठ का वध करूँगा ।
यो सोचकर वह सूर्य की तपस्या करने लगा ।
"सूर्य ने उसकी तपस्या से सतुष्ट होकर प्रतिशोध लेने के लिए उस राक्षस के पास
एक खड्ग भेजा । किन्तु गवान्ध होकर उसने वह खड्ग नही लिया । इस तरह वह खड्ग
आपके अनुज को मिल गया । ऐसा न होकर यदि वह राक्षस के हाथ में पड जाता, तो
वह सभी लोगो को त्रास देता । दैवयोग से वह राक्षस नष्ट हुआ । हे सूर्यवश-तिलक,
अब इसके बारे में चिंता क्यो करते है ? युद्ध में कार्तवीर्य ने रावण को जीता था ।