रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ रंगनाथ रामायण
भार्गव ने उसे मार डाला । ऐसे भार्गव राम को आपने युद्ध में हराकर उनका मद चूर्ण
किया । ऐसे (शक्ति-सपन्न) आपके द्वारा राक्षस युद्ध में अवश्य ही मारे जायेंगे ।” इन
वातो को सुनकर रघुराम आश्चर्य-चकित हुए और विनम्र होकर मुनियो को प्रणाम करके
उन्हें विदा किया ।
११. शूर्पणखा का वृत्तांत
शूर्पणखा प्रतिदिन के जैसे वडिया भोजन, विविध मिष्टान्न आदि से भरा हुआ टोकरा
लिये हुए आई और कटी हुई वांस की झाडी के बीच खड-खड होकर गिरे अपने पुत्र को
देखकर मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पडी । संभलने के वाद वह उन खडों को एकत्र
करके वडी देर तक विलाप करती रही । उसके पश्चात् वह कहने लगी—'हे कुमार,
तुम्हारे लिए क्या यह उचित है कि तुम अपनी आँखें खोलकर मेरी ओर न देखो और
मुझे न अपनाओ । रावण तुम्हारे मामा हैं, इसका भी विचार किये विना तुम उस प्रतापी
(रावण) का वध करना चाहते थे, किन्तु वह तुम से नही हो सका । क्या तुम ऐसा
कर सकोगे ? क्या वे (रावण) कार्त्तवीर्य से पराजित हुए थे ? क्या अनरण्य की शापाग्नि
से वे नष्ट हुए ? क्या ब्रह्मा के वनुष की अग्नि से उनका अत हुआ ? क्या नलकूवर से
वे पराजित हुए ? क्या वे शिव के वाहन नदीश्वर के क्रोध का शिकार वने ? क्या
शाण्डिल्य मुनि का क्रोध उनका नाश कर सका ? इतना क्यो, क्या कुवेर लका में रह
सका ? तुमने वात पर ध्यान नही दिया कि वलवान् से विरोध करना उचित नही ।
उनकी मृत्यु अव नही होने की । क्या पापी चिरायु की लोकोक्ति झूठी होगी ? (अर्थात्
पापी चिरायु होता है, यह लोकोक्ति प्रचलित है) ? मैने तुम्हें कितना समझाया कि (उन
से) वैर मत ठानो, किन्तु तुमने मेरी वातो की परवाह न की, और इस प्रकार नष्ट
हो गये । भला, रावण तुम्हारे हाथ क्योकर मरने लगे ? कहते हैं कि माता का वचन
धर्म-देवता का वचन होता है । हे निर्मलात्मा, तुमने उसकी (माता के वचन की) परवाह
न की । गधर्व, सुर, सिद्ध आदि (रावण के) कारागार में रहते-रहते अंधे हो गये हैं ।
क्या कही राक्षसो को जीता जा सकता है ? हे विद्युज्जिह्व के कुल-दीपक, हे महातपस्वी,
हे पुण्यवान्, तप के सिद्ध होते समय तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी । अब भगवान् की
निंदा क्यो कहूँ ? मैं तो पतिहीना पापिनी हूँ । यदि सुत का मुंह देखती रहती, तो शोक
कुछ कम हो जाता । स्त्रियो के लिए कुल का उद्धार करनेवाली संतान वहुत ही
आवश्यक है ।”
इस प्रकार विलाप करती हुई उसने अपने पुत्र के शरीर का अग्नि-सस्कार किया ।
उसके पश्चात् थोडी दूर पर तप करते रहनेवाले महात्माओ के पास जाकर वोली—'हे नीच
तपस्वियो, तुम शिर पर जटाएँ धारण किये, शरीर पर विभूति मले हुए, जनेऊ धारण
करके, आँखें वद किये, घोर निष्ठा-युक्त तपस्या का बहाना करते हो । सवलोग मिलकर
वकरो का सिर काटते हो, उन्हें अच्छी तरह पकाकर पेट भर खा लेते हो और उनकी
सूखी खालो को पहनकर कपट-वेष धारण किये निरपराधी की तरह रहते हो । हे गर्व
से अंधे, तुमलोगो ने पाप-बुद्धि से प्रेरित होकर मेरे पुत्र को किस प्रकार और क्यो मारा ?