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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 508 में से

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पृष्ठ 151

अयोध्याकांड १२१
करते हुए कहा—'हे अनघ, तुम्हारे वंश में ऐसा कभी नही हुआ कि अग्रज के रहते हुए अनुज
राजा बने । पूर्वजो की परंपरा के अनुसार तुम्हारा राज्य ग्रहण करना ही उचित है ।
किन्तु पिता के आदेश का उल्लघन न करने का तुम्हारा दृढ सकल्प है, तो जैसे भरत प्रेम
से तुम्हारी सेवा करता रहा है, वैसे वह तुम्हारी पादुकाओ की पूजा करते हुए शाति से रह
सकेगा । अत, तुम अपनी पादुकाएँ उसे प्रदान करो ।'
तब माता, मित्र, आश्रित, मत्री, प्रजा आदि सबने कहा—'हे राम, ऐसा
करना ही उचित है ।' तुरत भरत ने स्वर्ण-विलसित पादुकाएँ राम के सामने रख दी ।
तब राम ने उत्फुल्ल अरुण कमल के गर्भ के वैभव को भी परास्त करनेवाले मुनि-वधू के शाप
का मोचन करनेवाले, सृति-शिरोभाग पर विलसित होनेवाले, सतत सनकादि मुनिजनो के
विवाद के कारणभूत, अपने चरण उन पादुकाओ पर रखकर उन्हें भरत को दे दिया ।
उन दोनो को सिर पर धारण किये हुए भरत राघव से बोले—'हे देव, नृप-वेश त्याग
करके, मुनि-वेश धारण किये हुए, राज्य का भार इन पादुकाओ पर रखकर, में चौदह वर्ष
तक राज्य की रक्षा करूँगा । आपके चरणो की सौगध खाकर कहता हूँ कि यदि अवधि
के समाप्त होते ही आप अयोध्या नही लौटेंगे, तो मै अग्नि में प्रवेश करूँगा ।' यो कहकर
उन्होने अत्यत भक्ति से अपने अग्रज को प्रणाम किया । राम ने उन्हें हृदय से लगाकर
आशीर्वाद दिया । उसके पश्चात् उन्होने अपनी माताओ को सात्वना दी और पुण्यात्मा
मुनि-पुगवो, मित्रो, मत्रियो, वधु-बाधवो तथा सभी प्रजा को बडे प्रेम से विदा किया ।
अत्यधिक उमडते हुए शोकाकुल हृदय से भरत ने पादुकाओ की परिक्रमा की, उन्हें भद्रगज पर
प्रतिष्ठित किया और आप तथा शत्रुघ्न छत्र-चामर लिये हुए उसके पार्श्व में खडे हो गये ।
सब लोग वहाँ से रवाना हुए । भद्रगज के चारो ओर सेना चलने लगी ।
भरत इस प्रकार चित्रकूट से चलकर भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचे । वहाँ
उन्होने भरद्वाज मुनि को प्रणाम करके सारा वृत्तात उन्हें कह सुनाया । उनकी आज्ञा लेकर
आगे चले और गगा नदी पार करके शृगवेरपुर पहुँचे । बडे आदर से वहाँ गुह को
विदा करके, वे अयोध्या नगर पहुँच गये । रनवास में माताओ को छोडकर उन्होने अत पुर
की रक्षा के लिए सेना रख दी । मणि-रहित रत्न-मजूषा की तरह तथा सूर्य-रहित दिन की
तरह रामचन्द्र-रहित शून्य अयोध्या को देखकर उन्हें उस नगर में रहने की किंचित् भी
इच्छा नही रह गई थी । इसलिए वे नदीग्राम में जाकर निवास करने लगे । रघुराम की
पादुकाओ पर समस्त राज्य-भार रखे हुए, राम के समान ही उनकी सतत सेवा करते हुए, वल्कल
तथा जटाएँ धारण किये हुए, राघव के पुनरागमन की कामना करते हुए और उनके सद्गुणो
की प्रशसा करते हुए सरस सज्जन मत्रियो के परामर्श से भरत राज-काज सँभालने लगे ।
यह् अयोध्याकाड समस्त लोक में विख्यात होते हुए विद्वज्जनो की प्रशसा का पात्र
बन जाय । आध्र-भाषा के अधीश्वर, विमलचेता, आचारवान्, अनुपम धीमान्, भूलोकनिधि
गोनबुद्ध राजा ने, कमनीय गुण तथा धैर्य में मेरुपर्वत, शत्रु के लिए भैरव-रूप, महात्मा,
अपने पिता विट्ठल-नरेश के नाम पर आचद्रार्क ससार में पूज्य रहने योग्य रीति से,
असमान भाव तथा ललित शब्दार्थों से युक्त रामायण के अयोध्या-काड की रचना की ।
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