रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० रंगनाथ रामायण
६. मंदकर्णी का वृत्तांत
इसके पश्चात् रामचंद्र प्रत्येक आश्रम में, कही तीन महीने, कही चार महीने, आराम
से रहते हुए, पुण्याश्रमों के दर्शन करते हुए आगे बढ़े । मार्ग में उन्होंने एक स्थान पर
एक तड़ाग देखा, जिसके जल के मध्य से संगीत का निनाद अत्यधिक सुनाई पड़ रहा था ।
अत्यंत विस्मय-चकित होकर वे उस तड़ाग के किनारे पहुँचे और उसके निकट निवास करने-
वाले धर्ममृत नामक मुनि को देखकर बोले—'हे मुनिनाथ, यह कैसी विचित्र बात है
कि इस तड़ाग के जल में से ऐसा शब्द सुनाई दे रहा है ? 'तब धर्ममृत ने अत्यंत
उत्साह से रामचंद्र से कहा—'किसी समय मदकर्णी नामक मुनि इस तडाग के जल के बीच
खड़े होकर बड़ी निष्ठा से अनेक वर्ष तक अत्युग्र तपस्या करते रहे । उस तप को देखकर
इंद्रादि देवता भयभीत हो गये । उस मुनि के महत्त्व को क्षीण करने के लिए उन्होंने
पाँच अप्सराओं को भेजा । वे अप्सराएँ मुनि की परिणीता वधुएँ बन गईं और वे जल के
मध्य मुनि के द्वारा निर्मित स्वर्ण-सौधों में, मुनि के सम्मुख बड़े मोद-मग्न हो नृत्य कर
रही हैं । इसी कारण से यह सरोवर पंचाप्सर के नाम से विख्यात है । जो मधुर ध्वनि
अब सुनाई पड़ रही है, वह उनके वाद्यों की ध्वनि है ।
इन वचनों को सुनकर राम ने अत्यंत भक्ति से पुण्यात्मा मंदकर्णी को प्रणाम किया
और उस घोर वन के मार्ग में आगे बढ़े । मार्ग में उन्होंने कई मुनियों का दर्शन करके
उनको प्रणाम किया । बहुत-से पुण्य तपोवनों को देखकर मुग्ध हुए, कमल और कमलिनियों
से भरे सरोवरों में स्नान किया; मद-मंद गति से चलनेवाले पवन की प्रशंसा और
झिल्लियों की झकार की निंदा की । शुक, मयूर आदि पक्षियों को पकड़ते हुए, वे हाथी,
वराह आदि मृगों का शिकार करते जाते थे । कभी मेघास्त्र का प्रयोग करके गर्मी को
दूर करते और कभी अपने दर्शन करनेवाले के पाप मिटाते । कभी यौवन को प्राप्त लताओं
से फूल चुनते, कभी झकार करनेवाले भ्रमरों को दूर भगाकर गगनचुंबी पर्वत-शिखरों
पर चढ़ जाते । जब जानकी थक जाती थीं, तब उनका परिहास करते हुए बड़ी मृदुल गति
से गुफाओं को पार करते हुए, चढ़ाव पर चढ़ने की क्रिया (जानकी को) सिखाते । वहाँ
की भीलनियों के साहस की प्रशंसा करते हुए, अभेद्य घाटियों में प्रवेश करते हुए ऐसी
घाटियों में भ्रमण करने लगे, जहाँ सूर्य की किरणें भी नहीं पहुँच पाती थीं । इस तरह
राम, लक्ष्मण तथा जानकी के साथ पुण्य तीर्थों, पुण्य नदियों तथा पुण्य तपोवनों में
भ्रमण करते हुए दस वर्ष के उपरान्त फिर से सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में लौट आये
और उस मुनि के यहाँ बड़े आराम से कुछ वर्ष तक रहे ।
७. अगस्त्य से भेंट
एक दिन रामचंद्र ने अगस्त्य के दर्शन की इच्छा से प्रेरित होकर (सुतीक्ष्ण) मुनि
को देखकर पवित्र भक्ति के साथ कहा—'हे महात्मा, मुनिश्रेष्ठ, अगस्त्य कहाँ रहते हैं ?
उनका आश्रम कहाँ है ? कृपया बतलाइए ।' सुतीक्ष्ण ने उन्हें उस आश्रम के मार्ग की
दिशा तथा चिह्न बताये और आशीर्वाद देकर उन्हें विदा किया । अपने प्रिय अनुज तथा
पत्नी के साथ दक्षिण की ओर चार योजन का रास्ता तय करके, बहुत-से जंगलों, पहाड़ों