रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० रंगनाथ रामायण
पृथ्वी और मुझे वनवास देनेवाले राजा ने अपनी सत्यनिष्ठा की रक्षा करने के लिए ही
ऐसी व्यवस्था दी है । इससे उनकी कीर्त्ति शाश्वत हो गई । इसलिए हम भी महाराज की
आज्ञा का पालन करते हुए महान् यश को प्राप्त करें । सभी पिता इसीलिए पुत्र प्राप्त
करते हैं कि वह गया की यात्रा करे, कन्यादान करे और वृषभ छोड़े । पुन्नाम नरक से
(पितरो की) रक्षा करनेवाला होने से ही वह पुत्र कहलाता है । यदि मैं ही अपने पिता के
वचन का पालन नही करूँगा, तो इस पृथ्वी पर पिता के आदेश का पालन कौन करेगा ?
'यथा राजा तथा प्रजा' वाली उक्ति के अनुसार प्रजा भी हमारे समान ही आचरण
करेगी । मैंने जो व्रत लिया है, उसको पूरा करके लौटूंगा । तुम हठ का त्याग करो ।
मेरी बातें मानो और मेरे कथन के अनुसार राजा बनो । अब तुम नगर को लौट जाओ।”
तब सभा म उपस्थित मुनि, सुर तथा ब्राह्मणो ने (मन-ही-मन) निश्चय कर
लिया कि अब युद्ध में रावण की मृत्यु निश्चित है । ऐसा सोचकर उन्होने भरत से कहा—
'हे उज्ज्वल धर्म-निरत भरत, तुम राम के आदेश का पालन करो ।'
३०. श्रीराम को जाबालि का उपदेश
तब मुनि जाबालि ने राम को देखकर कहा—'यह तुम्हारा कैसा व्यर्थ विचार है ?
तुमने मुनि-वेश धारण किये, नृप-वेश छोड़ दिया, राजभोग त्याग दिया और नियमो का
पालन करते हुए इस ढंग से जीवन व्यतीत करते हो ? कहाँ के माँ-बाप और कहाँ के
पुत्र ? कहाँ का सत्य और कहाँ का पुत्र-धर्म ? यह सब मिथ्या हैं । माता-पिता अपने
सुख के लिए आपस में मिलते हैं । शुक्र तथा रक्त के संयोग से मनुष्य-का जन्म होता है।
पिता केवल बीज का दान देता है । बहुत क्यो, बुझे हुए दीप में तेल देना जितना
निरर्थक है, वेद-विधि से परलोक-क्रियाएँ करना भी उतना ही निरर्थक है । इसलिए मेरी
बात मानकर तुम अयोध्या लौट जाओ और राज्य ग्रहण करो ।'
जाबालि के इन वचनो को सुनकर रघुवीर ने क्रोध में आकर कहा—'हे मुनींद्र,
ऐसे नास्तिकतापूर्ण विचार आप किसी दूसरे को समझावें । हमारे लिए वही आचरणीय हैं
जिसे हमारे पूर्वजो ने किया है। सब धर्म सत्य के आधार पर निर्भर हैं । सत्य से
बढकर दूसरा धर्म और क्या हो सकता है ? ऐसे सत्य का पालन करने के लिए मेरे
पिताजी ने मुझे वन में भेजा है । यदि उनके आदेश का तिरस्कार करूँ तो मुझसे बढ़कर
नीच और कौन हो सकता है ? ज्ञानियो का कहना है कि सत्य, धर्म, शम, दम, भूत-दया,
नीति, विक्रम, प्रिय वचन तथा देव-पितृ-पूजन स्वर्ग के साधन है । इन सब को मिथ्या
घोषित करनेवाले आप अग्रजन्मा कैसे कहला सकते हैं ? आपको क्यो दोष दूँ ? आप
जैसे नास्तिक का आदर करनेवाले मेरे पिता ही दोषी थे ।
राम के वचनो को सुनकर जाबालि ने बड़े स्नेह से कहा—'हे राजन्, मैने आपको
नास्तिक मानकर ऐसा विचार इसलिए प्रकट किया है, कि आप किसी प्रकार भी अयोध्या
लौट चलिए । इसलिए आप धैर्य धारण करें ।'
३१. पादुका-दान
तब संयमी वसिष्ठ ने इक्ष्वाकु से सूर्यवंश तक के सभी राजाओ - की चर्चा