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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 508 में से

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पृष्ठ 159

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अरण्यकांड १२६

हमने सुना, तबसे हम आपके आगमन की उत्कट इच्छा लिये हुए थे । आखिर आप
यहाँ आ ही गये हैं । आपके दर्शन कर सके, इससे हम अपने को धन्य मानते हैं ।
दुरात्मा, अत्यधिक बाहुबली राक्षस गर्वोन्मत्त होकर हमारे आश्रम में आये, और हवन-
वेदियो का नाश किया, यूप-काष्ठो को उखाडकर फेंक दिया, पेडो को उखाड डाला, जप-
मालाओ को तोड दिया, हमारे वस्त्र फाड़ डाले, फलो को चुन लिया, फूलो को गिरा दिया,
सरोवरों का पानी गदा कर दिया, कई प्रकार के दुख दिये और कई मुनियो को मार
भी डाला । हमारी रक्षा करनेवाला कोई नही है । हे देव ! आप हमारी रक्षा कीजिए ।
हमें दुख देनेवाले इन राक्षसो को हम अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखकर, चाहें तो भस्म कर
सकते हैं । किन्तु पृथ्वी पर आपके जैसे राजा के रहते हुए हम क्रोध नही करते है ।
अत, आप इन दुष्ट राक्षसो का सहार करके हमारे तप की रक्षा कीजिए।" तब राम ने
उन्हें सात्वना दी कि मैं युद्ध में इन राक्षसो का वध करूँगा, आप खिन्न मत होइए ।
इसके पश्चात् उन्होंने शरभग के आश्रम के निवासी मुनियो को अपने अभयदान का वृत्तान्त
सुनाया, राक्षसो का वध करने की प्रतिज्ञा की और उनकी सगति में वही रात बिताई ।
दूसरे दिन बहुत-से मुनि वहाँ आये और राम से अपने-अपने आश्रमो में आने की
प्रार्थना की । तब राम सुतीक्ष्ण मुनि से आज्ञा लेकर अन्य मुनियो के पुण्याश्रमो को देखने
की अभिलाषा से वहाँ से रवाना हुए । मार्ग में जानकी ने राम को देखकर कहा—
"हे अनघ, (हम) राज्य छोडकर वन में आये है, जटाएँ तथा वल्कल धारण किये मुनियो की
तरह जीवन विता रहे है, ऐसी दशा में आप राक्षसो पर क्यो क्रोध करते है ? विचार
करने पर यह सगत नही मालूम होता है । हे काकुत्स्थ-तिलक, जबसे आपने मुनियो को
राक्षसो का वध करने का आश्वासन दिया है, तबसे मेरा मन बहुत ही खिन्न हो रहा है ।
यह कार्य ठीक नही है, इसलिए आप यह कर्म छोड दीजिए । हे प्राणेश्वर, क्या
प्राणियो को मारने से पाप नही लगेगा ? किसी समय एक मुनि अत्यन्त तपोनिष्ठा से
जीवन-यापन करते थे । इन्द्र ने उन्हें एक खड्ग देकर कहा—'इसे आप रखिए, मै फिर
आकर इसे ले जाऊँगा ।' तदनन्तर उस मुनि ने उस खड्ग से लता, वृक्षो को काटते हुए,
हिंसा में प्रवृत्त हो, जडमति बनकर तपश्चर्या त्याग दी और अत को दुर्गति को प्राप्त
हुआ । इसलिए हे देव, कहाँ तप और कहाँ राजधर्म तथा अस्त्र-शस्त्र ? आप ऐसा कार्य
न कीजिए ।"
तब रामचन्द्र ने हँसकर सीता से कहा—'हे साध्वी, तुम्हारा बताया हुआ मार्ग
ब्राह्मणो का है, क्षत्रियो का नही । मेरा हृदय जानते हुए भी मुझपर अत्यधिक अनुराग
रखने के कारण तुम ऐसा कह रही हो । हे तरुणी, उत्तम राजधर्म का पालन करनेवाले
इसीलिए तो धनुष-बाण धारण करके विचरण करते हैं कि शरणागतो की रक्षा कर सकें ।
तुम इस परम धर्म का विचार क्यो नही करती हो ? मैं उन महामुनियों को दिये गये
वचन का अवश्य ही पालन करूँगा । यही मेरा दृढ सकल्प है । मै अपने प्राण भले ही
छोड दूँ, तुम्हें भी त्याग दूँ*, या लक्ष्मण को भी छोड़ दूँ, किंतु अपना प्रण नही टाल
सकता ।' इन बातो को सुनकर जानकी चुप रह गई और लक्ष्मण विस्मित हो गये ।
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