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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 508 में से

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पृष्ठ 163

अरण्यकांड १३३
अत्यधिक ओले बरसाये हो । कही-कही ओस-कण दूर्वांकुरो के सिरो पर ऐसे दिखाई पड
रहे हे, मानो मरकत की शलाकाओ की पक्तियो पर सुदर ढग से पिरोये गये मोतियो की
लडियाँ हो । उस पुष्प-लताओ को देखो, जो कामदेव के सम्मोहनास्त्र के समान, स्पर्श करनेवाले
पवन से भयभीत होकर, मानो विरहिणियो की तरह चचल गति से डोल रही हैं ।
ओस में रहनेवाले कमल, आँसुओ में निमग्न विरहिणियो के मुखो का उपहास कर रहे हैं ।
वहाँ देखो, पानी के ऊपर तैरनेवाले कमलो के पराग पर मँडरानेवाले भ्रमर और लाल
कमल, ठंड से पीडित सरोवर के देवताओ के लिए धुएँ से युक्त अगीठियो के समान दीख
रहे है । हे अनुज, वहाँ देखो, जगली हाथी प्यास से व्याकुल होकर मद गति से दौडते
हुए इस नदी में आते है, नदी के जल को अपनी सूँडो में भरकर चिघाडते हुए अपनी
सूँडो को समेटे हुए भाग रहे है । अब भरत भी मेरे प्रति भक्ति रखने के कारण राज-
भोग छोडकर, वल्कल तथा जटाएँ धारण करके, मेरे आगमन की प्रतीक्षा करते हुए तडप
रहा होगा । न जानें, वह महान् व्यक्ति, परम पावन भ्रातृ-प्रेमी, अपने पिता तथा अग्रज
की आज्ञा का पालन करनेवाला परम यशस्वी, आश्विनो का रक्षक भरत, उषाकाल में कैसे
सरयू-नदी में स्नान करता होगा ? न जाने, वह मुनि की तरह कैसे पृथ्वी पर सोता होगा ?
मेरे पिता के सत्य वचन तथा मेरा दृढ सकल्प उनके कारण ही सभी लोको में इतने प्रख्यात हुए ।
जिस माता की आज्ञा के कारण में सभी सयमी मुनियो के आशीर्वाद प्राप्त कर सका, ऐसी
माता को न जाने कटु वचनो से वह कितना दुख देता होगा । नही, भला वह पुण्यात्मा
ऐसा क्यो करने लगा ? राज्य के अधिकार से अलग होकर में तपस्वी हुआ, किंतु राज्य
का अधिकारी होते हुए भी वह तपस्वी हुआ । उस पुण्यात्मा को देखकर दूसरो को सीखना
चाहिए कि भाइयो में परस्पर कैसा व्यवहार उचित है । ऐसे भरत तथा स्नेहपूर्ण
माताओ, तथा अन्य नातेदारो को न जाने हम कब देख पायेंगे ।” इस प्रकार उनके सबंध
में सोचते हुए बडी श्रद्धा से उन्होंने गौतमी नदी में जी भरकर स्नान किया, सूर्य को अर्घ्य
दिया, गायत्री-मंत्र का जप करने के पश्चात् ब्रह्म-यज्ञ किया और पर्णशाला को लौटकर बडी
प्रसन्नता से रहने लगे ।

१०. जंबुमालि का वृत्तांत

एक दिन लक्ष्मण प्रात काल ही उठे और बडे पवित्र चित्त से अपने भाई को प्रणाम
किया और कद, मूल, फल आदि लाने वन में चले गये । वनो में घूमते-घामते उन्होंने एक
ऊँचे पहाड को देखा और उसके निकट विचरण करने लगे । इसी समय समस्त पृथ्वी को
देदीप्यमान करते हुए सूर्य से उत्पन्न एक खड्ग आकर भीषण जलद के गंभीर गर्जन की-सी
वाणी में कहने लगा—‘हे राक्षस-कुमार, तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर सूर्य ने शत्रुओ का
नाश करने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है । तुम मुझे ग्रहण करो ।' तब उस राक्षस-
कुमार ने कहा—'सूर्य ने स्वय तुम्हें मुझे न देकर, मेरा अनादर किया है । में तुम्हें
ग्रहण नहीं करूँगा । मेरे सारे तप पर पानी फिर गया है । हे सूर्य के खड्ग, तुम
जहाँ चाहो, जा सकते हो ।' यो कहकर वह पूर्ववत् अचल समाधि में लीन
हो गया ।