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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 508 में से

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पृष्ठ 161

अरण्यकांड १३१

तथा नदियो को पार करते हुए वे अगस्त्य के भ्राता के आश्रम में पहुँचे । वहाँ वड़ी श्रद्धा
मे उस यतीश्वर के चरणो में सिर झुकाकर वे उस रात को वही ठहरे । मुनि के सत्संग
में रहते हुए राम ने उनसे प्रश्न किया—'हे यतीश्वर, पहले इस स्थान पर अगस्त्य ने
वातापि का सहार कैसे किया ?' तब वह मुनींद्र रामचंद्र को देखकर उस पुण्य-कथा को इस
प्रकार कहने लगे—"किसी समय वातापि और इल्वल नामक दो प्रचंड राक्षस इस पृथ्वी
पर रहते थे । उनमें वातापि मेष का रूप धारण कर लेता था और इल्वल ऋषि के
रूप में मार्ग में अड़ा रहता था । वह मार्ग में जानेवाले ब्राह्मणो को श्राद्ध के वहाने
अपने घर में आमंत्रित करता था और वड़े प्रेम से घर बुला लाता था । उसके पश्चात्
उस मेष को मारकर बड़े प्रेम से उसका भोजन वनाकर उसे अतिथियो को खिलाता था ।
भोजन के पश्चात् वह वातापि का नाम लेकर पुकारता था—'हे वातापि । जल्दी चले
आओ ।' तब वह ब्राह्मणो का पेट चीरकर बाहर निकल पडता था । इस प्रकार, उन्होने
कितने ही मुनियो को मार डाला । एक दिन कुभसंभव (अगस्त्य) उस मार्ग से आये,
तो उसने कपट से उन्हें भी भोजन कराया और भोजन के पश्चात् वातापि को पुकारा ।
तत्र अगस्त्य ने कहा—'अव वातापि कहाँ से निकलेगा । वह तो कभी का पच गया है ।'
इस पर क्रुद्ध होकर इल्वल ने राक्षस का रूप धरकर उनपर आक्रमण करने के लिए
निकला, तो कुभसंभव ने अपने हुंकार-मात्र से देखते-देखते उसको भस्म कर दिया और
सब मुनियो को हर्षित किया । इतना ही नही, इन्होंने विंध्याचल को दवा दिया, अद्वितीय
ढंग से समस्त सागर को पी गये और नहुष को साँप वन जाने का शाप दिया । ऐसे
पुण्यमूर्त्ति अगस्त्य केवल मुनि नही हैं । वे मुनि के रूप में (रहनेवाले) शिवजी हैं ।"

इन बातो को सुनकर रघुराम हर्षित हुए । दूसरे दिन मुनि ने रामचन्द्र का उचित
आदर-सत्कार करने के वाद उन्हें आशीर्वाद देकर अगस्त्य मुनि के आश्रम का मार्ग वताया
उस मार्ग से एक योजन तक जाने के पश्चात् उन्होंने अगस्त्य के उस रमणीय आश्रम को
देखा, जो कटहल, दाड़िम, शमी, वेर, अश्वत्थ, साल, द्राक्षा (किशमिश), रसाल, तमाल,
बेल, खर्जूर, मदार आदि वृक्षो से और उन वृक्षो पर लदे हुए सुगन्धित फूल, और
उन फूलो के मकरंद पर आसक्त भ्रमर, सुन्दर पुष्पो के पौधे, और उन पौधो के मध्य
मित्रता के साथ विचरण करनेवाले मृगो, कोकिलो का कल-कूजन, शास्त्र तथा वेद-ध्वनि,
तथा विविध तपोविनोदो से दीप्तिमान् था ।

आश्रम में पहुँचकर राम ने एक मुनि के द्वारा अपने आगमन का समाचार अगस्त्य
मुनि को जनाया, और उसके पश्चात् उनके सम्मुख उपस्थित होकर उनके चरण-कमलो में
वड़ी भक्ति से वंदना की । अगस्त्य ने उन्हें हृदय से लगाया, आशीर्वाद दिये और विविध
प्रकार से सन्तुष्ट किया । तदुपरान्त मुनि बोले—'हे शुभ नामवाले राम, हे उत्पल-श्याम,
हे गुणधाम, तुम क्रूर दानवो में भय उत्पन्न करनेवाले हो । मुनियों का सौभाग्य है कि
तुमने मुनि-वेश में तपस्वी की तरह वन में निवास करते हुए, मुनियो को अभयदान दिया है
कि तुम राक्षसो का सहार करोगे, अत वे दुःखी न हों। तुम्हारे इन दयापूर्ण वचनों को
सुनकर मुझे परम हर्ष हुआ ।'