रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
.घाट के निकट झाड़ियो में छिपा बैठा था । विविध मृग-समूहो के पानी पीने का शब्द
मुझे सुनाई पडने लगा । जैसे-जैसे शब्द सुनाई पडने लगा, वैसे-वैसे मैने शब्दवेधी वाण
चलाकर उनका वध कर डाला । मै इससे सतुष्ट न होकर वही ताक में बैठा रहा । उस
समय यज्ञदत्त नामक एक मुनि-पुत्र वहाँ आया और अपना जल-कलश पानी में डुबोया ।
कलश के डूबने से जो 'गट्गट्' की ध्वनि सुनाई पडी, उसे सुनकर मुझे भ्रम हुआ कि वह
कोई मत्त गज है । तुरन्त मैने (शब्दवेधी) वाण चलाया । उस तीव्र शर के लगते ही—
'हे पिता, हे माता, का आत्तंनाद मेरे हृदय को चीरकर निकल गया । वह मुनि-पुत्र पृथ्वी
पर गिरकर कहने लगा—'हाय, मै वनो में कन्द-मूल-फल खाते हुए तपस्वी का जीवन
व्यतीत करते, अपने माता-पिता की सेवा करता रहता हूँ । मैने किसी का अहित
नही चाहा । मुझे ऐसी घोर मृत्यु क्योकर प्राप्त हुई ? कोई पापी रात के समय, रति-
केलि में प्रवृत्त मृगो का वध नही करता । कौन है वह मदान्ध, जिसने अर्द्ध-रात्रि के समय
मुझपर बाण चलाया है । न जाने उसकी क्या दुर्गति होगी ? अब मेरी मृत्यु को वह
कैसे रोक सकेगा ? हाय मेरे अंधे, दीन तथा वृद्ध माता-पिता इस पुत्र-शोक को कैसे
सह सकेंगे ? 'रात अधिक बीत गई है, अकेले गया हुआ है, उसके आने में इतना विलम्ब क्यो
हो रहा है'—ऐसे सोचती हुई न जाने मेरी माता कितना दुख करती रहेगी ? मेरे पिता
मेरे नही लौटने का समाचार मेरी माता से कहकर न जाने शकाकुल मन से कितने व्याकुल
होते होगे ? वे सोचते होगे कि बाल-सुलभ-कौतुक में व्यस्त, हमारा पुत्र अभी तक लौटा
नही है । या सोचते होगे कि शायद जल लाने में असमर्थ होकर वह वही रह गया है ।
यदि वे मेरी मृत्यु का समाचार सुन लें, तो न जाने उनकी क्या दशा होगी ? उन्हें कौन
जल ले जाकर देगा ? उनकी रक्षा आगे कौन करेगा ? हाय, इस एक शर से हम
तीनो की मृत्यु एक साथ हो गई । विधि के क्रूर विधान को मै क्या दोष दूँ ?'
“उस मुनि-पुत्र का आर्त्तनाद सुनकर मैं अत्यत क्षोभ-युक्त हो, उस महापुरुष को
देखने की तीव्र उत्कण्ठा लिये हुए अधकार के दूर होने की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में
उस वनधि (वन) में मेरी शोक-वनधि (शोक-समुद्र) उमडाते हुए चन्द्रोदय हुआ । तब मैने
सरयू नदी को पार किया और उत्तर की दिशा में ढूँढने लगा । वहाँ मैने एक स्थान पर
मुनि-कुमार को अपने हाथ में जल-कलश को नीचे रखकर अपना कपोल कलश के मुंह पर
टेककर पडे हुए पाया । उसके वक्ष तथा पीठ से बहनेवाली रक्त-धाराओ से सारा शरीर
भीग गया था । उसकी शिखा खुल गई थी और अत्यधिक पीडा से उसका मुख कान्ति-
हीन हो गया था । शर के भीतर प्रवेश करने से वह इस प्रकार पडा हुआ था, जैसे कोई
योगी आत्मचिंतन में लीन हो और वह दैहिक व्यापारो को रोक, इंद्रियो की गति का दमन
करके अतिम योग-क्रिया में विस्मृत होकर पडा हो ।
“उस सुंदर आकृतिवाले मुनि-कुमार को तथा अपने बाण को देखकर मै घबडा गया ।
तुरत मैने नदी से जल लाकर उस मुनि-कुमार की आँखे पोछी तथा इसका सारा
शरीर पोंछ डाला और फिर वहने लगा--'हाय मुनिनाथ ! प्रमादवश मेरे शर ने आपका वध
कर डाला। इस नदी में जल के लिए आप क्यो आये ? मै अब इस पाप से कैसे मुक्त होऊँगा?'
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१०६ रंगनाथ रामायण
"इस प्रकार मैं अपना दुःख प्रकट कर रहा था कि मुनि-कुमार ने आँखें खोलीं ।
उसने अपनी ओर, फिर मेरी ओर देखा, और मेरे भय को देखकर कहा—'हे राजन् !
आप क्या करेंगे ? आप क्यों दुःखी होते हैं ? मुझे मारने की शक्ति आपमें कहाँ है ?
दैवयोग से ही मेरी ऐसी गति हुई है । इसके लिए आप क्यों शोक करते हैं ? आपने
तो हाथी समझकर बाण चलाया था । जान-बूझकर तो नहीं चलाया । ब्रह्म-हत्या का दोष
भी आपको नहीं लगेगा; क्योंकि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ । मैं वैश्य-पिता और शूद्र-माता से उत्पन्न
हुआ हूँ । मेरी मृत्यु देखकर आप विचलित मत होइए । आप मेरे माता-पिता को मेरी
मृत्यु का संवाद न भी दें, तो भी वे योग-दृष्टि से सभी बातें जान लेंगे । तब यदि वे
क्रुद्ध होकर आपको शाप देंगे, तो उसमें रघुकुल का क्षय हो सकता है । हे राजेन्द्र, इस
पहाड़ के निकट पश्चिमी कोने में एक वटवृक्ष है । उसी वटवृक्ष के पास में एक काँवर में
बिठाकर बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा-शुश्रूषा में लगा रहता हूँ । आज रात भी मैं उन्हें
उस वृक्ष के कोटर में बिठाकर आया हूँ । आप शीघ्र इस कलश का जल लेकर वहाँ
जाइए और उन्हें सावधानी से नीचे उतारकर निर्भय होकर उन्हें सारा वृत्तांत सुनाइए ।
हे राजन् ! इस अस्त्र के साथ मेरी मृत्यु अनुचित है । इसलिए धीरे-धीरे यह बाण निकाल
दीजिए । शरीर की पीड़ा अब मुझसे सही नहीं जाती । मेरे प्राण अब नहीं रहेंगे ।'
"मुनि कुमार के इन वचनों को सुनकर मैं धीरे-धीरे उनके निकट पहुँचा । अत्यधिक
आत्म-ग्लानि से पीड़ित होते हुए मैंने उस शर को निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, किन्तु
भय से मेरा हाथ रुक गया । फिर साहस बटोरकर काँपते तथा दुःखी होते हुए मैंने उस
शर को निकाल दिया । उसी क्षण मुनिकुमार की मृत्यु हो गई ।
"मन-ही-मन दुःखी होते हुए मैं जल-कलश लेकर मुनि के आश्रम में पहुँच गया और
वहाँ अपने सुत की प्रतीक्षा करते हुए पर-कटे पक्षियों की तरह पड़े हुए वृद्ध तथा अंधे
पुण्यात्माओं को देखा । निकट सुनाई पड़नेवाली आहट सुनकर मुनि कहने लगे—'हे पुत्र,
इस प्रकार कहीं विलम्ब किया जाता है ? मैं तुम्हारी माता के साथ यही सोच रहा था
कि इतना विलंब करने का क्या कारण है ? क्या तुम एक ही स्थान में इतने समय
तक ठहर सकते हो ? तुमने कहाँ इतनी देर लगाई ? तुम्ही तो हमारी आँखें हो ।
हम अत्यंत वृद्धों के लिए तुम्ही आधार हो । हम गतिहीनों के लिए तुम्ही सद्गति हो ।
भला, तुम बोलते क्यों नहीं ? मैंने तुम्हें कहा ही क्या है ? हे पुत्र, मैं तो केवल जल
माँग रहा हूँ ।'
"मुनि के ये वचन मेरे मन के भय और शोक को बढ़ाने लगे । मैंने शीघ्र वृक्ष पर
चढ़कर काँवर नीचे उतारा और अत्यंत दीन होकर थर-थर काँपते हुए, एक क्षण तक इस
दुविधा में पड़ा रहा कि सारा समाचार कहूँ या न कहूँ । फिर यह सोचकर कि किसी
भी तरह मुझे कहना ही पड़ेगा, मैंने गद्गद स्वर से कहा—'हे उत्तम तपस्वी, मैं राजा
दशरथ हूँ । मैं आपका पालक हूँ, पुत्र नहीं हूँ । मैंने आज एक ऐसा नीच कर्म किया है,
जिसे सुनकर नीच व्यक्ति भी मेरी निंदा करेंगे । किसी भी युग में किसी और ने जो पाप
नहीं किया होगा, वैसा पाप करके मैं आज आपके पास आया हूँ । मैं कैसे कहूँ ? विधि ने
अयोध्याकांड १०७
ही मुझसे ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित किया है । सरयू नदी के तट पर में अँधेरी
निशा में मृगया के लिए गया था और मृगों के आने के स्थान के पास छिपकर उनकी
आहट सुनकर उनपर शब्दवेधी बाण चलाकर उनका शिकार करता था । संयोग की बात,
उसी समय आपके पुत्र ने नदी के प्रवाह में जल के लिए कलश डुबोया । उसकी ध्वनि
सुनकर मुझे हाथी का भ्रम हुआ और मैंने बाण चला दिया । हे अनघ, मेरे उस शक्ति-
शाली बाण ने आपके पुत्र के प्राण हर लिये ।'
“इतना सुनना था कि मुनि का हृदय धक् से रह गया और वे मूर्च्छित हो गये ।
मुनि-पत्नी 'हाय पुत्र !' कहकर भूमि पर निश्चेष्ट हो गिर पड़ी । थोड़ी देर के बाद मेरा
विलाप सुनकर उनकी मूर्च्छा छूटी, तो उन्होंने मुझे देखकर कहा—'हे दशरथ ! तुमने हमको
शोकाग्नि में जलाने के लिए हमारे पुत्र को कहाँ छिपा रखा है ? वन में तपस्या करते हुए
हम अंधे तथा वृद्ध को मारकर तुमने घोर पाप किया है । तुम्हारा बाण लगते ही
न जाने हमारे पुत्र ने क्या कहा होगा ? कौन जाने कि उस हृदय-पीडा से उसके प्राण
निकल गये या अभी तक वह तड़प रहा है ? क्या मृत्यु का कोई कारण नहीं होना चाहिए
क्या बाण बिना कारण ही मुनि-पुत्र के प्राण हर सकता है ? वानप्रस्थ-आश्रम में जीवन
व्यतीत करनेवालों का वध, चाहे इन्द्र भी करें, तो उसका भी नाश हो जाता है, तो राजा
की क्या गिनती ? हे राजन्, तुमने अनजान में हमारे पुत्र का वध किया है, इसलिए तुम
पर क्रोध करना उचित नहीं है । अपने पुत्र को देखे बिना हमारी शोकाग्नि शांत नहीं
होगी । हमें अपने पुत्र के पास ले चलो ।'
“इस प्रकार शोक-विह्वल उन वृद्ध तपस्वियों को ले जाकर उन्हें उनके पुत्र को
दिखाकर मैंने कहा—'यही आपका पुत्र है । मुनि-पत्नी हाथों से टटोलते हुए कहने लगी,
'कहाँ है वह दयालु, उदार और विमलचेता ? कहाँ है वह तपोधन तथा पुण्यवान् ?
कहाँ है वह विद्वानों की प्रशंसा के योग्य आचरणवाला ? कहाँ है वह सतत वेदाध्ययन
में तत्पर ?' यों कहती हुई वह अपने पुत्र पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर उन्होंने
उसे अपनी गोद में लिटाकर उसके भीगे हुए केशों पर सिर रखकर रोती हुई
कहने लगी—'हे विमलात्मा, हे यज्ञदत्त, हे सदाचरणवाले, हे धर्म-निपुण, तुम हमसे कहे बिना
कभी कहीं नहीं जाते थे । आज तुमने ऐसा क्यों किया ? आज स्वर्गलोक की यात्रा
के लिए जाते समय तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा ? हे मेरे वंश-तिलक ! मैं बड़ी पापिनी हूँ ।
अर्द्ध-रात्रि के समय मैंने तुमसे (जल के लिए) जाने को कहा । गुरुजनों की भक्ति
में संसार में अद्वितीय पुत्र को मैंने खो दिया । मेरे लिए अब तपस्या किसलिए ? तुम्हारे
साथ परलोक जाने में ही मेरी सद्गति है । कहाँ तीक्ष्ण बाण और कहाँ तुम्हारे प्राण ?
कहाँ राजा दशरथ और कहाँ तुम ? हाय ! अन्त में तुम्हारे कर्म-फल ने इन सबका
संयोग करके तुम्हारे प्राण ले लिये हैं ।'
“शोक-संतप्त माता के इस तरह के आर्तनाद को सुनकर मुनि अपने पुत्र पर गिरकर
कहने लगे—'हाय पुत्र ! तुम तो मेरे पास आकर मेरी सेवा करते थे । आज मैं तुम्हारे
पास आया हूँ, तो भी तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा नहीं करते हो, क्या तुम्हें यह उचित है ?
इस वाण से जो घाव तुम्हें लगा, उसके द्वारा क्या तुम्हारा सारा निर्मल गुण-समूह निकल
गया ? मैं अब किसे वेद पढाऊँगा ? किसे अब शास्त्र समझाऊँगा ? किसे धर्म सुनाऊँगा ?
काव्य किसे समझाऊँगा ? हमारी आवश्यकता पहचानकर हमें कौन फल तथा जल
लाकर देगा ? मैंने सदा तुम्हें चिरायु रहने का ही तो आशीर्वाद दिया है ? कब मैंने वज्रसम
‘शक्तिशाली वाण से तुम्हारी मृत्यु की कल्पना की थी ? हे पुत्र, तुम मुझे भी अपने साथ
ले चलो, तो मैं यम से भी पुत्र-भिक्षा देने की प्रार्थना करूँगा । संसार की यही रीति है
कि पुत्र अपने माता-पिता के परलोक-संबधी क्रिया-कर्म करते है । आज विधि ने उस
क्रम को उलट दिया और तुम्हारे क्रिया-कर्म करने के लिए हमें नियोजित किया । जबतक
तुम रहे, तुमने बड़ी भक्ति से हमारी सेवा करके हमारी रक्षा की । हे पुण्यचरित्र !
मैं किस युग में तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करूँगा ? तुम पाप-रहित हो, श्रेष्ठ तपोनिधि हो,
गुरुभक्त, परमार्थी, आर्य, धर्मनिष्ठ, दानी, पर-दुःखनिवारण करनेवाले, अन्न आदि महादान
करनेवाले जो पुण्य लोक प्राप्त करते हैं, वही तुम भी प्राप्त करो ।'
“इस प्रकार शोक करते हुए उन्होंने अपने पुत्र का यथाविधि अग्नि-संस्कार किया ।
यज्ञदत्त ने देवताओ के विमान में आरूढ हो आकाश की ओर प्रस्थान करते हुए कहा—
'हे गृहजनो, मैंने स्वर्गलोक का भोग प्राप्त किया है आपकी सतत सेवा करते हुए पुण्य-
वान् हुआ हूँ । अब मेरी मृत्यु का आप शोक मत कीजिए । जिस समय जो होना चाहिए,
वह हुए बिना नहीं रहता । होनहार होकर ही रहता है । आप इन पर (राजा पर)
क्रोध न कीजिए ।' इस प्रकार कह उसके स्वर्गलोक चले जाने के बाद, उन्होंने पुत्र-प्रेमजन्य
दुःख से प्रेरित होकर मुझे शाप दिया—‘हे राजन् ! लो, हम पुत्र-शोक से मर रहे हैं,
तुम भी हमारे समान ही पुत्र-शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे ।’ इस प्रकार, कहकर
उन्होंने वहीं अपने प्राण छोड़ दिये ।”
२३. दशरथ का स्वर्गवास
'यही मेरा कर्म-फल है, जिसे भोगने का समय आसन्न है । अग्निसम पवित्र उन
तपस्वियो का अग्नि-संस्कार करके मैं नगर में लौट आया । मेरा धैर्य छूट गया है । मेरी
बुद्धि भ्रमित हो रही है, कंठ सूख रहा है, आँखें देखने में असमर्थ हो रही हैं, दूसरे के
शब्द सुनाई नहीं पड़ रहे हैं, अब मेरे प्राण रोकने पर भी इस शरीर में नहीं रुकेंगे ।
मेरे लिए कल्पतरु, बुद्धिमान्, पराक्रमी, गुणवान्, मेरा भाग्य-प्रद, शुभ-गुण-संयुक्त राम को
इस समय मैं नहीं देख पा रहा हूँ । आज सात दिन हुए, मैंने राम को नहीं देखा । राम
को छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?’ इस प्रकार 'हा राम ! हा राम !' का आर्तनाद
करते हुए दशरथ का स्वर्गवास हो गया ।
शोक से अत्यधिक पीड़ित होकर राजा सो गये हैं, ऐसा सोचकर कौसल्या भी
सो गई । प्रभात होते ही बंदी तथा मागध स्तुति-पाठ करने लगे, मंगल-वाद्य बजने लगे और
नगर-निवासी एकत्रित होकर राजा के दर्शनार्थ उत्कंठा से प्रतीक्षा करने लगे । प्रतिदिन
की तरह राजा अबतक जगे क्यों नहीं, यह सोचते हुए परिचारक राजा की शय्या के
निकट गये और राजा को सोई हुई दशा में देख उन्हें कुछ भय हुआ । लंबी साँस भरते हुए
उन्होंने राजा के हाथ-पैर छूकर देखे । उन्हें अब ज्ञात हो गया कि राजा के शरीर में
प्राण नही है । तब वे रुदन करने लगे । कौसल्या हड़बड़ाकर उठी, सुमित्रा भी जागकर आई ।
उन दोनो ने राजा को देखा और ऊँचे स्वर में विलाप करने लगी—'हाय प्राणनाथ,
हाय महाराज ! आप हमें छोड़कर चले गये ।' यह विलाप सुनकर कैकेयी दौड़ी हुई आई ।
दोनो ने सिर पीटते हुए कैकेयी को देखकर कहा--'हाय कैकेयी ! आज तुम्हारी
इच्छाएँ पूरी हुईं । तुमने काकुत्स्थ-वंश का सर्वनाश किया । राम को वन में भेजकर
अपयश का सहन करते हुए तुमने दशरथ के प्राण ले लिये । आज से तुम अपने पुत्र के
साथ समस्त पृथ्वी का उपभोग करो ।'
इस प्रकार, कौसल्या आदि रानियाँ कैकेयी को घेरकर रोने-कलपने लगीं । वह सिर
झुकाये अत्यधिक शोक से अपने पति के शरीर पर गिरकर कई प्रकार से विलाप करने लगी ।
कौसल्या की चेतना जब लौट आई, तब उन्होंने कहा—'हे राजन् ! क्या आप
जैसे धर्मात्मा की ऐसी मृत्यु होनी चाहिए ? आपके आदेश का उल्लघन न करके मैं धोखा
खा गई । आपकी सत्यनिष्टा ने आपकी यह दशा कर दी । अत्यत क्रूर स्त्री कैकेयी को
देखकर और राम के वनवास के दुख से अभिभूत होकर मैं आपकी उचित परिचर्या न
कर सकी । आपकी इच्छा का पालन करते हुए वन में निवास करके राघव महायश का
भागी बना । सत्य का पालन करके आपने स्वर्ग-सुख को प्राप्त किया । अब मुझे केवल
आप जैसे उत्तम पति को कटुवचन सुनाने का पाप मिला ।'
इस प्रकार, कौसल्या को विलाप करते देख सुमित्रा आदि रानियाँ ऊँचे स्वर में रुदन
करने लगीं । बात-की-बात में यह समाचार सारे नगर में फैल गया । स्त्रियों के विलाप
से सारा आकाश गूंजने लगा । सूर्योदय के होते ही अत्यन्त भीत हो राजा के मित्र,
नातेदार, सामंत-राजा, वसिष्ठ आदि मुनि, ब्राह्मण तथा नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति, आकर
शोक व्यक्त करने लगे । वसिष्ठ मुनि मंत्रियों के परामर्श के पश्चात् महाराज दशरथ के
शरीर को तेल में डुबोकर मणिमय सिंहासन पर उसे बैठा दिया, मानो वे दरबार में बैठे
हुए हों । उसके पश्चात् उन्होंने सामंत राजाओं को तथा मंत्री और राजनीतिज्ञों को संबोधित
करते हुए कहा—'महाराज साम्राज्य का पालन करके सुरधाम चले गये । पिता का वचन
पालन करने के लिए राम अपनी स्त्री के साथ वन-वास करने गये । उससे पूर्व ही शत्रुघ्न
के साथ भरत अपने मामा के नगर गये हैं । यदि हम रामचन्द्र को बुला भेजें, तो वे नहीं
आयेंगे । वे अपने प्रण के पालन में पटु हैं । इसलिए हमें राजकाज को संभालने के लिए
भरत को शीघ्र बुलाना चाहिए । राजा के बिना कोई भी देश, नगर या राष्ट्र शोभा
नही देता । दण्डनीति, दान-धर्म आदि की व्यवस्था बिगड़ जायगी । शत्रु प्रबल हो जायेंगे ।
जार-चोर आदि की वृद्धि होगी । दुर्जन सज्जनों को दुख देने लगेंगे । सामंत, दुर्ग-रक्षक
आदि कर नहीं देंगे ।'
ऐसा निश्चय करके उन्होंने धीमान्, जयन्त आदि चार मंत्रियों को बुलाकर कहा—
'तुम लोग भिन्न-भिन्न वस्त्राभरण लिये हुए वज्रपुर जाओ और भरत को यहाँ की घटनाओं
का पता दिये बिना सिर्फ इतना कहो कि गुरु वसिष्ठ ने आपको लिवा लाने के लिए हमें
११० रंगनाथ रामायण
भेजा है । तुम उन्हें अपने साथ अवश्य लिवा लाना, शीघ्र जाओ । वे मंत्री घोड़ों पर सवार हो
रथ की गति से चलने हुए विभिन्न नगरों, जनपदों, नदियों, काननों, पहाड़ों तथा झाड़ियों
को पार करते हुए केकयराज के नगर में जा पहुँचे । दशरथ की मृत्यु के सातवें दिन
रात को वहाँ उन्होंने (भरत और शत्रुघ्न) स्वप्न में देखा कि उनके पिता गोबर तथा
कीचड़ में भरे विशाल गड्ढे में गिर पड़े हैं । समुद्र सूख गया है, चन्द्र पृथ्वी पर गिर गया है,
भद्रगज का एक दाँत टूट गया है । ऐसे दुःस्वप्न देखकर वे जाग पड़े और अत्यंत
भीत होकर अपने इष्ट-मित्रों को स्वप्न का वृत्तांत सुनाकर, उसका फल जानना चाहा ।
इसी समय अयोध्या के दूत वहाँ पहुँचे और भरत को प्रणाम करके साथ लाई हुई भेंट उन्हें
देकर अत्यंत विनीत भाव से बोले—'हे देव, किसी कार्यवश वसिष्ठजी ने आपको शीघ्र
लिवा लाने के लिए हमें भेजा है । अतः आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए ।'
दूतों के कृत्रिम हाव-भाव देखकर वे और भी भीत हो गए । उन्होंने अपने
मामा से सारा वृत्तांत कह सुनाया और सादर उनकी आज्ञा प्राप्त करके रथ पर आरूढ़ हो,
मंत्री तथा चतुरंगिणी सेना के साथ चल पड़े । अत्यंत वेग से यात्रा करते हुए वे सात
दिनों में अयोध्या पहुँच गये ।
२४. भरत का अयोध्या में प्रवेश
अयोध्या में प्रवेश करते ही उन्होंने देखा कि सारा नगर पतिहीना पत्नी के समान
तथा चन्द्रहीन रात्रि के समान श्रीहीन होकर उजड़ा हुआ दीख रहा है । यह ढंग देखकर
वे मन-ही-मन व्याकुल होकर सोचने लगे कि आज सारा नगर शून्य-सा लग रहा है ।
नगर-निवासी मुझे देखकर आँखों से आँसू बहा रहे हैं । मुझसे कतराते हुए जा रहे हैं ।
क्या कारण है कि दुकानों में कोई भी चीज सजाकर नहीं रखी गई है ? यों सोचते
हुए अंतःपुर के फाटक पर वे रथ से उतर गये और आप और शत्रुघ्न शून्य-से दीखनेवाले
अंतःपुर में पहुँचे । उनको देखते ही कैकेयी बड़े प्रेम से उनके सामने आई और उन्हें
हृदय से लगा लिया । तब उन्होंने बड़ी भक्ति से उनको प्रणाम किया और अपने मामा
की दी हुई भेंट उन्हें देकर उनका कुशल-समाचार कह सुनाया । उसके उपरांत भरत ने
माता से पूछा—'हे माता, यह कैसा आश्चर्य है कि सारा अंतःपुर वैभवहीन होकर शून्य-सा
लग रहा है । राम-लक्ष्मण और महाराज सकुशल तो हैं ?' तब बहुत चिंतित होती हुई
कैकेयी ने भरत के संभ्रम को बढ़ाती हुई मंद हास के साथ कहा—'हे वत्स, किसी दिन
तुम्हारे पिताजी ने बड़े प्रेम से मुझे दो वर दिये थे । मैंने एक वर से भरत का राज-
तिलक और दूसरे वर से राम के वनवास की प्रार्थना की । पिता की आज्ञा के अनुसार
राम, जानकी-लक्ष्मण-समेत वन-वास के लिए चला गया । पुत्र के वियोग से महाराज
स्वर्ग सिधारे । ईर्ष्यावश मैंने तुम्हारे लिए यह व्यवस्था कर ली । अब राज्य सँभालो, प्रजा
का पालन करो, ऐश्वर्य प्राप्त करो और अपने बाहुबल से राज्य की रक्षा करो । इसके
विपरीत कुछ मत कहो ।'
इन बातों को सुनते ही भरत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । थोड़ी देर के
बाद सँभलकर उन्होंने अत्यंत क्रोध से कैकेयी को देखकर कहा—"हे माता ! मेरी माता
होती हुई तुम निर्दयता से ऐसा कठोर आचरण कैसे कर सकी ? राम को मुनि-वेष में
वनवास की आज्ञा तुम कैसे दे सकी ? निर्मल धर्माचरण करनेवाले रघुवंशियो की रीति
तुम्हें क्या मालूम नही है ? मै अपने पिता की मृत्यु पर कैसे शोक कर सकता हूँ ? कौन-
सा मुँह लेकर राम को देख सकता हूँ ? हाय ! न जाने मन-ही-मन राम कितने व्याकुल
हुए होगे ? न जाने लक्ष्मण को कितना क्रोध आया होगा ? वन के लिए जाते समय
सीता ने न जाने मुझे कितने अपशब्द कहे होगे ? कौन जाने, माता कौसल्या की क्या
दशा हुई ? माता सुमित्रा तथा अन्य रानियाँ न जाने कितनी दु खी होती होगी ? इनके
सामने विलाप करने के लिए मै कहाँ योग्य रहा ? मै उनके मन की व्यथा दूर कैसे कर
सकूँगा ? मुझे अब यह नगर किसलिए ? मुझे राजभोग किसलिए ? निश्चय, वन ही
अब मेरे लिए शरण है । घोर पापिनी तुम्हारी माता ने एक राक्षस से तुम्हें जन्म
दिया होगा। तुम महाराज केकय से उत्पन्न पुत्री नही हो । अब मै तुमसे क्या कहूँ ?" इन सब
बातो को आड में खडी छिपकर सुननेवाली मथरा को देखकर लोगो ने कहा--'इसीने
इतने सारे पाप कराये' यह सुनते ही शत्रुघ्न ने उस वृद्ध स्त्री की टाँग पकड़कर एकदम
उसे उठाया और बडे जोर से उसे घुमाकर इस तरह नीचे फेंक दिया कि उसकी कूबट
जाती रही, केश बिखर गये और सभी भूषण तितर-बितर होकर गिर पडे । सभी स्त्रियाँ
देखती रह गई । कैकेयी आदि अन्य रानियाँ भागने लगी । कैकेयी का वध करने के लिए
शत्रुघ्न को जाते हुए देख भरत ने कहा—'इस पापिन को मारकर हम पाप क्यो कमायें ?
रामचन्द्रजी सुनेंगे, तो मातृृहता कहकर हमसे घृणा करेंगे । इसलिए तुम यह काम मत करो ।'
२५ भरत का कौसल्या के घर जाना
वहाँ से निकलकर भरत अनुज के साथ कौसल्या के यहाँ गये और उनके चरणो में
सर नवाकर शोक-सन्तप्त हृदय से दोनो भाई उच्च स्वर से विलाप करने लगे । तब भरत
को देखकर कौसल्या बडे क्रोध से इस प्रकार बोलने लगी—'पति को खोकर, सुत से अलग
रहते हुए अत्यत दुख से पीडित मै रोती हूँ, तो वह स्वाभाविक ही है । तुम क्यो रो रहे हो ?
तुमने जैसा चाहा, तुम्हारी माता ने कर दिया । हे वत्स, अंब तुम राज्य सँभालो ।
यह सुनकर अत्यत भीत हो, हाथ जोडे कौसल्या के पीछे चलते हुए भरत कहने लगे—
'माताजी-यदि मैने मन, वचन तथा कर्म मे श्रीराम का अहित किया हो या पृथ्वी
का पालन करना चाहा हो, कैकेयी के मन की इच्छा मुझे मालूम रही हो, एक भी अहित
मैने सोचा हो, तो मैं उस पापी की गति प्राप्त करूँ, जिसने मद्य पिया हो, निर्धन ब्राह्मण
का वध किया हो, गुरु-पत्नी से व्यभिचार किया हो, युद्ध में अपजय प्राप्त की हो, दुष्टता
से सोना चुराया हो, गाय की हत्या की हो, न्याय-रहित होकर राज्य-पालन किया हो,
बराबर चुगली खाई हो, शरणार्थी को शरण नही दी हो, माता-पिता को अपशब्द कहे हो,
श्रेष्ठ धर्म को बेचा हो, स्वामी से द्रोह किया हो, गुरुजनो को अपशब्द कहे हो, सतत
पापी होकर असत्य कहा हो, दूसरो के धन की इच्छा की हो और पर-स्त्री गमन किया हो ।
मै रामचन्द्रजी का अहित क्यो करूँगा ? मै कहाँ और ये नीच कर्म कहाँ ?' इस
प्रकार विलाप करनेवाले भरत के शोक का आभिप्राय समझकर कौसल्या आत्म-ग्लानि का
अनुभव करती हुई सोचने लगी—'हाय ! मैने ऐसे पुण्य-चरित को क्यो कोसा ?' फिर
उन्होंने भरत तथा शत्रुघ्न को हृदय से लगा लिया और परिताप से विलाप करने लगी ।
तब सयमी वसिष्ठ उन्हें लेकर राजा के अत पुर में गये । वहाँ रत्न-पीठ पर राजा
का शव रखा था । राजा की आँखें बन्द थी, मानो राजा ने यह विचार कर लिया हो कि
यह पापिन कैकेयी का पुत्र है, इसे नही देखना चाहिए । पिता का शव देखकर भरत
मूर्च्छित हो गये । थोडी देर में सँभलकर अत्यधिक पीडित हो आर्तनाद करने लगे—
'हे राजन्, मैं कैकेयराज के यहाँ से अनुपम मणि-भूषण आपके लिए ले आया हूँ । इन्हें
स्वीकार क्यो नही करते ? आप नेरी ओर देखते क्यो नही हैं ? मेरा दोष क्या है ?
पापिन कैकेयी का पुत्र हूँ, क्या इसलिए आप मुझे देखना नहीं चाहते ? हे महाराज !
इस सुमित्रा-पुत्र को तो देखिए । वह दुख से कैसे तडप रहा है। शत्रुघ्न को उठाकर उसके
शरीर पर लगी धूल को आप पोछने क्यो नहीं ? इस पर कृपा कीजिए । इससे बोलिए ।
इसने क्या किया है ? इसे अपने हृदय से लगा लीजिए । आपके सद्गुण, आपकी दया
और आपका स्नेह कहाँ छिप गये हैं। हे पिता, क्या कैकेयी ने आपकी बुद्धि को कलुषित
कर दिया है ? क्या ऐसी मृत्यु ही आपके भाग्य में लिखी थी ? राजाओ की मृत्यु तो
होती ही है, किन्तु ऐसी मृत्यु कही नही होती । मै इन कष्टो से कैसे पार पाऊँगा ?
हाय, में क्या करूँ ?'
इस प्रकार विलपते हुए भरत को देखकर वसिष्ठ ने कहा—'तुम्हारे पिता ने साठ
सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर शासन किया और मनु के धर्म-पथ पर चलते हुए समस्त धर्मों
का पालन किया । अत में तुम जैसे पुत्रो को प्राप्त किया । इसलिए तुम शोक मत करो।
इनकी देह का अग्नि-सस्कार करो ?'
मुनि की आज्ञा शिरोधारण कर भरत ने दूसरे दिन, मुनियो, राजाओ तथा अन्य
महात्माओ को बुलाया । दशरथ के शव को तीर्थ-जलो से स्नान कराया और श्रेष्ठ वस्त्र,
तथा भूषणो से उसे सजाया । वेदोक्त विधि से दान आदि देने के पश्चात् उस शव को
अरथी पर रखा । इसके उपरान्त मन्त्र-पूत अग्नि को लिये हुए वे (भरत) अनुज तथा मुनिजनो के
साथ अरथी के आगे-आगे चलने लगे । अरथी के अगल-बगल में उच्च स्वर में रुदन करती
हुई कौसल्या आदि रानियाँ लड़खडाती हुई चलने लगीं । सरयू के निकट श्मशान में चिता
सजाई गई । उसमें त्रेताग्नियो को प्रतिष्ठित करके वेद-विधि से (भरत ने) महाराज
दशरथ के शव का अग्नि-सस्कार किया, तिलोदक दिया, पिंडदान किया और फिर अत पुर
में लौट आये । उन्होंने बारह दिन तक विधि-युक्त क्रिया करते हुए ब्राह्मणो को दान आदि
देकर सतुष्ट किया ।
अन्त्येष्टि-क्रियाओ की समाप्ति के पश्चात् इक्ष्वाकुओ के कुलगुरु मुनि वसिष्ठ आगे
होने योग्य कार्यों का विचार करके, सामत राजाओ तथा मत्रियो को साथ लिये भानु-सम
उज्ज्वल भरत के निकट पहुँचकर बोले—'हे वत्स, तुम्हारे पिता परलोक सिधार गये हैं।
और तुम्हारे भाई राम वनवास के लिए गये हैं । राज्य में कोई राजा नही-रहे, तो राज-
काज चल नही सकते । प्रजा उच्छृङ्खल हो जायगी, पृथ्वी विचलित होगी और समस्त
धर्मों का पतन हो जायगा, शत्रु प्रबल होगे और वर्णसंकर पैदा होगे । राज्य को राजा-
रहित नही रहना चाहिए । तुम विमलमतिमान् हो, तुम राज्य का भार संभालो ।'
मुनि के उपदेश सुनकर भरत ने हाथ जोडकर कहा—'हे मुनिनाथ, क्या मैं इतना
मूर्ख हूँ कि अपने कुल की रीति न जानूं ? मेरी माता ने मेरे अग्रज को वन भेजकर
मेरे पिता के प्राण ले लिये हैं । क्या यह (दण्ड) मेरे लिए पर्याप्त नही है ? क्या अब
राज्य करने की बात भी में सोचूं ? आप आगे कुछ मत कहिए । मैं कैकेयी का पुत्र हूँ,
इसीलिए तो आप मुझसे ऐसी बातें कहते है । अन्यथा आप मेरे संबंध में ऐसे विचार मन
में नहीं लाते ।' मैं तुरत अपने भाई राम के पास जाऊँगा । उनसे प्रार्थना करके उन्हें
लौटा लाऊँगा और उनका राज-तिलक कराऊँगा । यदि मैं ऐसा नही कर सका, तो जैसे मेरे भाई ने
मुनि-वृत्ति ग्रहण की, वैसे मै भी मुनि-वृत्ति लूंगा । इसके सिवा मेरे लिए और कोई मार्ग नहीं है ।'
२६. भरत का राम के पास जाना
इस प्रकार निश्चय करके भरत ने मन्त्रियों को देखकर कहा—'हमें अपने बड़े भाई
के दर्शनार्थ जाना है । मार्गों को ठीक करो और सभी नगरवासियों को मार्ग में जहाँ-
तहाँ ठहरने के लिए उचित व्यवस्था करके आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करो ।' मन्त्रियो ने
उनकी आज्ञा का पालन किया । दूसरे दिन बंदी-मागध, मन्त्री, सुकुमार नर्त्तकी, नट, नौ
सहस्र हाथी, एक लाख अश्व, साठ सहस्र रथ और असंख्य पदचर सेना, सभी नगरवासी
तथा धन एवं रत्नराशियों को साथ लिये वसिष्ठ आदि मुनि, राजा, मन्त्री और प्रतिष्ठित
जनो के संग, भरत, शत्रुघ्न तथा उनकी माताएँ विविध वाहनों पर सवार होकर चले ।
इस प्रकार, चलकर सब गंगातट पर पहुँचे और वहाँ पड़ाव डाला । अत्यन्त बाहुबली
गुह को यह मालूम हुआ कि कैकेयी-पुत्र सेना के साथ राम पर आक्रमण करने के लिए
जा रहे है, तो वह अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और अपने दल-बल-सहित भरत के पास पहुँचकर
बोला—'हे भरत, जब रामचन्द्र आपको अपना सारा राज्य देकर वन में रहते हैं, तब क्या
आपको यह उचित है कि आप अपनी सेना के साथ उनपर आक्रमण करने चलें ? मैं राम
का सेवक हूँ । मैं आपको जाने नहीं दूंगा । मैं आपकी सेना का संहार कर डालूंगा ।
आपसे युद्ध करते हुए मैं मर जाऊँगा । तभी आप राम पर आक्रमण कर सकेंगे ।'
गुह के इन रोषपूर्ण वचनों को सुनकर भरत विमल मन से हँसते हुए बोले—
'हे गुह, मैं परमात्मा रामचन्द्र से प्रार्थना करके उन्हें अयोध्या लौटाकर उनका राज-तिलक
सम्पन्न कराने के उद्देश्य से ही उनकी सेवा में जा रहा हूँ । तुम अपने मन में अन्यथा
समझकर ऐसे वचन मत कहो ।' इस प्रकार कहकर भरत ने गुह को हृदय से लगाया
और उसके मन की राम-भक्ति समझ गये । गुह ने भरत के चरणों पर मस्तक नवाकर
अनुपम वन-वस्तुओं की भेंट की । फिर वह भरत को उस स्थल पर ले गया, जहाँ, पहले
राम गंगातट पर ठहरे थे । भरत ने अपना पड़ाव वही डाल दिया । उसके पश्चात् गुह
उन्हें उस स्थल पर ले गया, जहाँ राम ने जटाएँ धारण की थी । उस स्थल को देखकर
सभी नगरवासी, मुनि, मन्त्री तथा भरत अत्यन्त दुःखी हुए । तब भरत ने अत्यन्त दीन होकर
वट का दूध मँगवाकर अपने भाई शत्रुघ्न के साथ जटाएँ धारण कर लीं ।
१५
दूसर दिन नित्यकर्मों से निवृत्त होकर भरत ने गुह के द्वारा मँगाई गई पाँच सौ
विशाल नावों में चढ़कर माताओं, मुनियों, मन्त्रियों तथा सेना के साथ गंगा नदी पार की ।
वहाँ से गुह को साथ लिये हुए, उसके बताये मार्ग पर चलते हुए भरद्वाज के उस आश्रम
के पास पहुँचे, जहाँ से निकलनेवाले यज्ञ-धूम से सारा आकाश व्याप्त होकर बादलों का
भ्रम उत्पन्न कर रहा था तथा जिन्हें देखकर मोर अपने पंखों को फैलाकर आनंदोन्मत्त हो
नाच रहे थे । उनके पंखों के समूह से सारा आश्रम-स्थल ऐसा दीख रहा था, मानो
विचित्र रत्न-तोरणों से सारा आश्रम अलंकृत किया गया हो ।
२७. भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुँचना
भरत ने अपनी सारी सेना आश्रम से बहुत दूर पर ठहराकर आप स्वयं उस
पुण्यात्मा भरद्वाज मुनि के दर्शनार्थ गये और मुनि को देखकर प्रणाम किया । भरद्वाज
बड़े रुष्ट होकर बोले—'हे भरत जब राम-राघव वन में निवास कर रहे हैं, तब तुम
अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर उनपर आक्रमण करने क्यों जा रहे हो ?' मुनि का क्रोध
समझकर भरत भय तथा विनय के साथ बोले—'हे मुनीश्वर, मैं तो रामचन्द्रजी से राज्य
ग्रहण करने की प्रार्थना करने जा रहा हूँ । दूसरे किसी उद्देश्य से नहीं । आप अन्यथा
न समझें ।'
भरत की बातों से हर्षित होकर भरद्वाज बोले—'हे अनघ, तुम अपनी समस्त सेना
के साथ आज हमारे आश्रम में ठहरकर हमारा सत्कार स्वीकार करो ।' इसके पश्चात्
मुनि ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा—'तुम तुरत एक सुंदर नगर का निर्माण करो, जिसमें
सभी लोगों के लिए उनकी योग्यता के अनुसार निवास रहे । विश्वकर्मा ने तुरत पाँच
योजन विस्तार में एक विशाल नगर बनाया, जो भूमि-देवता के चरण के आभूषण-सा विराज
रहा था । उसमें एक स्वर्णमय राजभवन भी था । उस भवन में श्वेत छत्र-सपन्न
सिंहासन रखा हुआ था और एक रमणीय सभा-भवन भी था । मुनि की आज्ञा से भरत ने
उस राजभवन में प्रवेश किया । वहाँ सिंहासन को देखकर भरत ने उसे राम का सिंहासन
कहकर उसका नमस्कार किया और उसके निकट ही एक पीठ पर आसीन हुए । मुनि की
आज्ञा से किन्नर, गंधर्व तथा खेचर रमणियों ने भरत के सामने आकर नृत्य-गान किया ।
इस प्रकार, मुनि की आज्ञा से सभी निवासों में नृत्य-गीत आदि, पृथ्वी पर जितने मनोरंजन
हो सकते थे, वे सब वहाँ संपन्न हुए । (अयोध्या की) प्रजा ने स्नान आदि से निवृत्त होकर
स्वच्छ वस्त्र पहने, मदार-पुष्प-मालाएँ पहनीं, चंदन का लेप किया और विविध आभूषण
पहने । इसके पश्चात् कामधेनु द्वारा प्रस्तुत किये गये चार प्रकार के भोजन ग्रहण करके
परितृप्त हुए । तब सुरांगनाओं के साथ रति-क्रीड़ाओं में मग्न होते हुए वे अपने जन्म को
सफल मानने लगे । इस प्रकार, मुनि का आश्रम स्वर्ग का भी तिरस्कार करता हुआ-सा
दीखने लगा ।
भरत तथा उनकी सेना ने मुनि भरद्वाज की प्रशंसा करते हुए रात वहीं बिताई ।
प्रातःकाल होते ही उन्होंने देखा कि वहाँ न कोई नगर था, न भवन, न सुरांगनाएँ । भरत
के आश्चर्य की सीमा न रही । वे श्रेष्ठ तपस्वी भरद्वाज के सम्मुख जाकर बोले—
'हे महात्मा, आपके तपोबल की महिमा की प्रशंसा करना ब्रह्मा के लिए भी कठिन है । अब
हम सूर्यवंश-तिलक रघुराम की सेवा में जायेंगे । हमें आज्ञा दें।' यो कहकर भरत ने
अपनी माताओ से मुनि को प्रणाम करवाया । मुनि बोले—'ये कौन-कौन हैं ? अलग-अलग
इनका परिचय मुझे दो ।' तब भरत ने कहा—'हे महात्मा, ये राजा की ज्येष्ठ रानी
सफलजन्मा कौसल्या है, जिन्होंने सब लोगो में कीर्त्ति तथा प्रशंसा पाई है । राम को पुत्र-
रूप में प्राप्त कर अपनी कोख को सफल बनाया है, पर उनके (राम के) वियोग की
अग्नि में तप्त हो रही है । ये लक्ष्मण को जन्म देनेवाली पुण्यशीला सुमित्रा हैं, जो कौसल्या
के बायें हाथ की तरह रहती हैं । पुष्प-रहित कर्णिकार की शाखा के समान अलंकारहीना
होकर राम के वियोग-दुख से दुःखी हैं । ये हतपुण्या मेरी माता कैकेयी हैं, जिनके कारण
मेरे अग्रज वनवास के लिए गये हैं, जिनके कारण मेरे पिता का देहात हुआ और जिनकी
इच्छा ने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी है ।' इतना कहकर उमडते हुए शोक मे विह्वल तथा
गद्गद हो वे चुप हो रहे । मुनि ने उन्हें सांत्वना देते हुए आगे के कार्य का विचार करके
कहा—'कैकेयी ने लोकहित किया है । यह तुम लोगो को आगे स्पष्ट होगा ।' इतना
कहकर उन्होने भरत को राम के निवास-स्थान का मार्ग बताया और उन्हें आशीर्वाद देकर
विदा किया ।
भरत ने अत्यंत श्रद्धा मे युक्त हो सेना के साथ चित्रकूट पर्वत की ओर प्रस्थान
किया । हाथियो के चिंघाडने, अश्वो के हिनहिनाने, सेना के वार्त्तालाप करने, तथा रथो के
चलने से जो विपुल रव होता था, उससे भीत होकर जगली मृग चारो दिशाओ में
भागने लगे । विशाल सेना के चलने से उठी हुई धूलि से आवृत होकर सूर्यमडल भी मलिन
दीखने लगा ।
वहाँ चित्रकूट में कुटिल-कुतला सीता के साथ राम बडे आनंद से वार्त्तालाप कर रहे थे ।
सीता का ध्यान पर्वत की शोभा की ओर आकृष्ट करते हुए वे कह रहे थे—
'हे बिंबाधरवाली, देखा तुमने पर्वत की शोभा, हमारे नेत्रो को कितना अपूर्व आनंद पहुँचा रही है ।
इस पर्वत की महिमा का वर्णन करना क्या शेषनाग के लिए भी संभव है ?
निर्झरो की घन गभीर ध्वनियो को मेघ-गर्जन समझकर अत्यंत आनंद से तुम्हारे केश
की समता रखनेवाले अपनी पंखो को फैलाकर नाचनेवाले उन मयूरो को देखो । क्या,
इन भीलनियो को तुमने देखा, जो अपने कुच-कुंभो को गज-कुंभो की समता प्रदान करने
के लिए, गजो के कुभस्थल को चीरकर उसमें से निकले हुए मणियो को धारण कर रखा है।
देवताओ का संकेत-स्थान होने के कारण इस घाटी में दिव्य सुगंधि फैल रही है ।
वहाँ देखो, वह गंधर्वों का क्रीडा-स्थल उनके पदतलो के महावर-वर्ण से प्रकाशमान दीख
रहा है । हे किन्नर-कंठवाली, यह गिरि-गुफा देखो, जो किन्नर-किन्नरियो के संगीत से
मुखरित है । हे कोकिलकंठी, इस सहकार-वृक्ष को देखो, जो कोयल की कलध्वनि तथा
पल्लवो से युक्त है । हे कोमलांगी, मलया निल विभिन्न प्रकार के फूलो की सुगंधि को
एकत्रित करते हुए मद-मद गति से चलकर हम पर अपना प्रभाव डाल रहा है । वहाँ
उस मंदाकिनी को देखो, जो लाल तथा सफेद कमलो के समूह से अलंकृत है, जिसके कूल
पर तमाल, रसाल, कपिला, ताल, हिंताल, लसोडा आदि वृक्ष सुशोभित हैं, जिसके पवित्र
तट पर, मुनियो का समूह विराज रहा है और जिसका प्रवाह हंसो के मद गमन से हिल-
सा रहा है।' इस प्रकार कहते हुए वे विभिन्न प्रकार के वृक्षो के नीचे, लता-कुंजो, पर्वत के
शिखरो पर, तराइयो में तथा गुफाओ में अत्यन्त प्रसन्नता से विचरण कर रहे थे।
इसी समय उन्होने भरत की सेना का कोलाहल सुना । भयभीत होकर चारो ओर
भागनेवाले हाथी, वराह आदि मृगो को तथा उड़ती हुई अत्यधिक, धूल को देखा। तब
उन्होने लक्ष्मण से कहा कि तुम पता लगाओ कि इस प्रकार धूल क्यो उड़ रही है ?
लक्ष्मण ने तुरत एक ऊँचे वृक्ष के शिखर पर चढकर देखा कि उत्तर की दिशा से सूर्यवंश के
चिन्हो से युक्त पताकाएँ फहराती हुई एक विशाल सेना आ रही है। उन्होने मन-ही-मन
निश्चय कर लिया कि भरत राम पर आक्रमण करने के लिए आ रहे है। पर्वत पर
वज्रपात होने के समान तुरत वे पेड से उतर पडे और दौडते हुए राम के पास पहुँचकर
अत्यधिक रोष से बोले—'हे देव, आपको वन भेजकर समस्त राज्य को हस्तगत करने से
तृप्त न होकर, आज कैकेयी का पुत्र सारी सेना लेकर आप पर आक्रमण करने आ रहा है।
वह देखिए, कचनार (जैसी लाल) ध्वजाएँ ! वह सुनिए सैनिकों के वीर वचन !
आप शर, चाप तथा कवच धारण करके भरत का सामना कीजिए । नही, नही, आप और
सीता यहाँ से हट जाइए । आपकी सज्जनता ने ही इतना (अनर्थ) किया है। मै अब
सहन नही करूँगा । यदि भरत यहाँ आया, तो मै उसका वध कर डालूँगा ।'
राम बोले—'हे लक्ष्मण, मेरा अनुज होकर जन्म लेने पर भी तुम ऐसे अविनीत
क्यो हो रहे हो ! भ्रातृ-प्रेम की मूर्ति, परम पवित्र, नीति-कोविद तथा धर्म-तत्पर भरत,
मुझसे भी अधिक मेरा भक्त है । भरत के मन में कोई पाप नही है । मुझसे अयोध्या
लौट चलने की प्रार्थना करने के लिए वह आ रहा है । तुम शका छोड़ दो । राम के
आदेश का उल्लघन न कर सकने के कारण लक्ष्मण चुप हो रहे ।
२८. भरत की राम से भेंट
भरत ने नगरवासियो मित्रो, तथा सेना को एक जगह ठहरा दिया, माताओ के
साथ आने के लिए वसिष्ठ मुनि से प्रार्थना करके, स्वय शत्रुघ्न, सुमंत्र और गुह के साथ
उस पर्वत पर चढने लगे । जगल में मार्ग को पहचानने के लिए लक्ष्मण ने जो सकेत
बना रखे थे, उन्हें पहचानते हुए, चारो ओर दृष्टि डालते हुए (उन्होने) समस्त शस्त्रास्त्र-
समूह से युक्त विशाल आँगनवाली सुदर पर्णशाला को देखा । वहाँ पर मुनि-वेष धारण
किये हुए अत्यत हर्ष से विलसित होनेवाले राम को देखकर भरत मन-ही-मन अत्यत
दुखी हुए और शत्रुघ्न से कहने लगे—'हे शत्रुघ्न, देखा तुमने ? स्वर्ण-सौधो में रहनेवाले
राम आज एक पर्णशाला में निवास कर रहे हैं। पुष्प-शय्या पर विराजनेवाले आज धूलि-
युक्त पर्णशाला में रह रहे हैं। मुकुट धारण करनेवाले, प्रेम से जटाएँ धारण किये हुए हैं।
राजाओ की सेवाएँ प्राप्त करते हुए रहनेवाले आज मृगो के मध्य रहते हैं। दिव्य
वस्त्र धारण करनेवाले आज मुनियो के वल्कल पहने हुए हैं। सुस्वादु भोजन करनेवाले,
आज कच्चे फलो पर दिन व्यतीत कर रहे हैं। हाय, शुभप्रद मूर्तिवाले राम आज इस
प्रकार का दुख का अनुभव कर रहे हैं। कैकेयी के पापी गर्भ से जन्म लेने के कारण
ही मुझे उनकी यह दुर्दशा देखनी पड रही है ।'
इसके पश्चात् उन दोनो ने (राम के निकट पहुँचकर) उनको प्रणाम किया । राम ने
उन्हें गले से लगा लिया और नेत्रो से आनदाश्रु बहाते हुए बडे स्नेह के साथ उनकी पीठो
पर हाथ फेरा और उन्हें आशीर्वाद दिये । तब सुमत्र तथा गुह ने उस सूर्यवशी को बडी
भक्ति के साथ प्रणाम किया । भरत तथा शत्रुघ्न ने तब जानकी तथा लक्ष्मण को प्रणाम
किया । उसके पश्चात् उन्हें कुशासन पर बैठने का आदेश देकर राघव बार-बार पिता तथा
माता का कुशल समाचार पूछते हुए बोले- "हे भरत, तुम क्यो इतनी दूर चलकर आये ?
राजा की आज्ञा से राज्य-भार ग्रहण करके नीति के साथ राज-काज चला रहे
हो न ? सत्यनिष्ठ महाराज दशरथ की सेवा नित्य प्रति करते हो न ? माताओ को
सात्वना देते हुए बडे आदर के साथ उनकी देखभाल करते हो न ? हमारे कुलगुरु तपो-
निष्ठ वसिष्ठ की पूजा करके सध्या के समय अग्निहोत्र की विधि का नियमपूर्वक पालन
करते हो न ? सज्जन मंत्रियो का परामर्श लेकर विजय-साधक मार्ग को समझ रहे हो न ?
प्रतिदिन रात्रि के पिछले पहर में जागकर तुम अर्थ-सिद्धि का चिंतन करते हो न ? उत्तम,
मध्यम और अधम, जनो का विचार करके उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें काम में लगाते
हो न ? अपराध का विचार करके अपने लोगो के सबध में भी न्यायदड का पालन
ठीक तरह से करते हो न ? मतिमान्, लोकप्रिय, स्वामिभक्त तथा पराक्रमी को तुमने अपना
सेनापति बनाया है कि नही ? सेवको के वेतन बिना विलब के उन्हें देते हो न ? दूतो
के द्वारा राज्य का समाचार तथा शत्रुओ की गति-विधि का ज्ञान रखते हो न ? गर्व
त्यागकर दीन तथा निर्धन व्यक्तियो की पुकार सुनते हो न ? वर्णाश्रम-धर्म में किसी
प्रकार का व्यतिक्रम लाये बिना आवश्यक व्यवस्था करते हो न ? चोरो और जारों की
बढती को रोककर उन्हें कारावास में रखकर उचित दड देते हो न ? समय-समय पर
चतुरंगिणी सेना की पटुता का निरीक्षण करते हो कि नही ? दुर्गों को धन-धान्य तथा
सेना से युक्त रखते हुए उनका बल बढाते रहते हो न ? अन्याय से (पर) धन-सचय
न करके, किसानो को प्रेम से साथ रक्षा करते हो न ? धन-लोभ में पडकर विप्रो की
जागीरो का किंचित् भाग भी अपहरण नही करते हो न ? सतत गो-ब्राह्मणो के हित की
कामना करते हुए धर्म-निष्ठा में तत्पर रहते हो कि नही ? जो राजा (इच्छा, क्रिया,
ज्ञान) शक्तित्रय का, चार उपायो (साम, दाम, भेद, दड), पचागो, षड्गुणो तथा राजा के
चौदह दोषो का ज्ञान रखते हुए, दयालु होते हुए, मनु-धर्मशास्त्र के अनुसार देवताओ,
पितरो तथा ब्राह्मणो की पूजा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है, वही स्वर्ग प्राप्त
करता है । तुम भी उसी प्रकार राज्य करते हो न ?"
२९. भरत का राम को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना
तब भरत गद्गद कठ से हाथ जोडकर बोले- 'हे राजकुलाधीश, मैं यह धर्म-मार्ग
कुछ नही जानता । हे धर्मनिपुण, और एक समाचार सुनिए । कैकेयी ने निर्दयतापूर्वक
आपको बुला भेजा और आपको वन जाने का आदेश दिया । आप बिना विलब किये
१९८ रंगनाथ रामायण
यहाँ चले आये। आपके दुख में तड़पते हुए सातवें दिन महाराज दशरथ ने अपन प्राण
छोड़ दिये। मैं पितृ-कर्मों क्रो पूरा करके आपके दर्शनार्थ यहाँ आया हूँ।'
यह समाचार राम को वज्र के संमान लगा, और वे तुरत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर
गिर पड़े। सीता तथा लक्ष्मण भी मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गये। थोड़ी देर के पश्चात्
राम कुछ संभले और वार-वार विलाप करने लगे। तब उन्हें देखकर भरत ने कहा—
'हे देव, धीर होते हुए भी जड़ के समान इस प्रकार विलाप करना आपको शोभा
नही देता। आप, लक्ष्मण तथा सीता महाराज की परलोक-क्रिया विधिवत् पूरा कीजिए। यही
उचित है।'
तब राम मदाकिनी नदी के तट पर पहुँचकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर वडी
निष्ठा से अपने पिता की तिलोदक-क्रिया की, पिंड-दान किया और अत्यधिक शोकाकुल
चित्त से पर्णशाला में लौट आये। उस समय वसिष्ठ, कौसल्या आदि अवरोध-जन (रानवास
की स्त्रियाँ), नगरवासी, नातेदार, सुशील मत्री आदि के साथ पर्णशाला में पहुँच गये।
शोकाग्नि से सतप्त होनेवाले राम, सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनके चरणो में गिरे और
रोने लगे। यह देखकर वे सब भी रोने लगे। तब वसिष्ठ ने सात्वना के शब्दो से उन्हें
शांत किया।
तब वनवास के कारण विवर्ण दीखनेवाली सीता को देखकर कौसल्या मन-ही-मन
विधि को कोसती हुई अत्यत दुःखी होने लगी। उसी समय उस पर्वत पर रहनेवाली
किंनर, यक्ष, गरुड, उरग तथा अमर-कामिनियाँ वहाँ आ पहुँचीं और कौसल्या से कहने
लगीं—'राम की पत्नी, दशरथ की बहू, महाराज जनक की पुत्री (यहाँ) विविध सकटो
का अनुभव कर रही है। विधि-विधान के लिए कोई वात असंभव नहीं है।'
उसके पश्चात् राम ने सीता के साथ अनघ वसिष्ठ के चरणो की वंदना की, मुनियो
माताओ, नातेदारो, मित्रो तथा मत्रियो को कुशासनो पर बिठाया और आप भी कुशासन
पर बैठ गये। तब भरत की वेश-भूषा देखकर राम बोले—'हे वत्स, तुम जटाएँ तथा
वल्कल क्यो धारण किये हुए हो? राजा की आज्ञा का पालन करते हुए तुम शीघ्र जाकर
राज्य-भार ग्रहण करो।' इन वचनो को सुनकर भरत ने राम के मुख-कमल को देखते हुए
हाथ जोडकर कहा—'हे देव, हे राघव, कैकेयी ने असहनशीला हो, आपके महत्त्व से
अनभिज्ञ हो, आपको वन जाने का आदेश देकर महान् पाप किया, तो क्या आपको यह
उचित था कि आप तुरत यहाँ चले आये? आपके वियोग से दुःखी हो, महाराज दशरथ
भी स्वर्ग सिधारे। मेरी माता ने ऐसे घोर पाप किये हैं। क्या इसके कारण वे नरक-कूप
में नहीं गिरेंगी? राज्य आपका है। मैं उसे सँभालने में असमर्थ हूँ। आज ही आप
अयोध्या को लौट चलिए और शुद्ध मन से राज्य-भार ग्रहण कीजिए। पति को खोकर
अत्यधिक शोक से पीड़ित होनेवाली माताओ को सात्वना दीजिए। मित्रो, मत्रियो, वधुओ
तथा प्रजा-जन पर कृपा दृष्टि रखते हुए उनको अपनाइए। हे दयामय, मैं आपका दास हूँ,
मुझे अपनाकर मेरी विनती को स्वीकार कीजिए।' इस प्रकार कहते हुए भरत राम के
चरणो पर गिर पडे।
अयोध्याकांड ११९
राम अपने भाई को उठाकर हृदय से लगाते हुए बोले—“हे भरत, यह कैसी बात है
कि तुम बालको की तरह धर्म-मार्ग को छोड़ने की सलाह दे रहे हो ? माता कैकेयी
को अपशब्द क्यो कह रहे हो ? अब तुम स्वंय पिता की मृत्यु के लिए क्यो दुख
कर रहे हो ? मिट्टी, मिट्टी में मिल गई है । ऋणानुबंध (पूर्वजन्म का ऋण) रूप में
पुत्र, मित्र, कलत्र प्राप्त होते तथा बिछुड़ते रहते हैं। मनुष्य के लिए पृथ्वी पर जन्म लेते
ही मृत्यु निश्चित है । यह जानकर जो नर अपने कुलोचित धर्म के मार्ग में प्रवृत्त रहता है,
वह परम भव्य होता है । हमारे पिता ने सत्यनिष्ठा से नीतिनय-सपन्न होकर महान्
यज्ञ-दान आदि कितने ही सत्कार्य किये, राजभोग का प्रचुर अनुभव किया, हम जैसे पुत्रो
का मुंह जी भरकर देखा, और तब वे प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए स्वर्ग सिधारे है ।
उनके लिए शोक करना उचित नही है ।, उनके आदेश को ठुकराना ठीक नही है ।
पितृ-वचन का पालन करना पुत्र का प्रिय धर्म होना चाहिए । जो पुत्र ऐसा करता है,
वही विख्यात होता है । पिताजी ने मुझे चौदह वर्ष तक वन में रहने तथा तुम्हें राजसुख
का भोग करने का आदेश दिया है । अत, हम वैसे ही रहें । इसके विरुद्ध तुम और कुछ
भी न कहो ।”
तबतक सूर्यास्त हो चला था । रात्रि अत्यंत प्रीति से कटी । दूसरे दिन प्रात काल
ही सध्या आदि से निवृत्त होकर रघुराम कुशासन पर विराजमान हुए । वसिष्ठ आदि मुनि
तथा अन्य मंत्री चारो ओर बैठे । सभा में भरत उठे और हाथ जोडकर बोले--“हे देव,
आपकी आज्ञा को शिरोधारण कर पिता के वचन के अनुसार सारा राज्य-भार मैंने ग्रहण
कर लिया है । मैं अपना वह राज्य आपको दे रहा हूँ । अब आप और कुछ न कहें ।
समस्त पृथ्वी का भार अपने सिर पर धारण करने की क्षमता आदिशेष को हो सकता है,
किन्तु जल-सर्प का बच्चा उसे कैसे वहन कर सकता है ? मै वैसा ही एक बालक हूँ ।
इतनी विशाल पृथ्वी का भार कहाँ और मै कहाँ ? क्या सत्पुरुषो की रक्षा का भार मै
सँभाल सकता हूँ ? बालारुण से सुशोभित होनेवाले उदयाचल पर जुगनू का प्रकाश जैसा
दिखाई देगा, आप श्रीनिधि के सिंहासन पर मेरा बैठना भी वैसा ही दिखाई देगा ।
इसलिए, आप मुनि-वेश को त्यागकर अयोध्या लौट चलिए और अपने शील से राज्य करते
हुए सारी प्रजा की इच्छा पूर्ण कीजिए । आप इसके विरुद्ध कुछ मत कहिए । यदि आप
इसे स्वीकार नही करेंगे, तो मै आपके सम्मुख ही प्राण-त्याग कर दूंगा या सौमित्र की तरह
आपकी सेवा करते हुए यही रह जाऊँगा ।” इस प्रकार कहते हुए भरत दर्भासन पर (प्राण
त्याग करने को) लोट गये ।
राघव ने अपने अनुज को उठाकर कहा--“भरत, यह कैसी बात है ? ऐसा कहना
क्या तुम्हारे लिए उचित है ? अपने पिताजी की आज्ञा का विचार तुम बिलकुल करना
नही चाहते हो ? महाराज दशरथ के साथ तुम्हारी माता का विवाह करते समय तुम्हारे
नाना ने महाराज से यह वचन माँगा था कि आप मेरी पुत्री द्वारा उत्पन्न संतान को ही
राजा बनायेंगे । राजा के वचन देने पर ही विवाह संपन्न हुआ था । उस वचन को दृष्टि
में रखकर ही कैकेयी ने देवासुर-युद्ध में राजा के द्वारा दिये गये वरो को माँगा । तुम्हें
१२० रंगनाथ रामायण
पृथ्वी और मुझे वनवास देनेवाले राजा ने अपनी सत्यनिष्ठा की रक्षा करने के लिए ही
ऐसी व्यवस्था दी है । इससे उनकी कीर्त्ति शाश्वत हो गई । इसलिए हम भी महाराज की
आज्ञा का पालन करते हुए महान् यश को प्राप्त करें । सभी पिता इसीलिए पुत्र प्राप्त
करते हैं कि वह गया की यात्रा करे, कन्यादान करे और वृषभ छोड़े । पुन्नाम नरक से
(पितरो की) रक्षा करनेवाला होने से ही वह पुत्र कहलाता है । यदि मैं ही अपने पिता के
वचन का पालन नही करूँगा, तो इस पृथ्वी पर पिता के आदेश का पालन कौन करेगा ?
'यथा राजा तथा प्रजा' वाली उक्ति के अनुसार प्रजा भी हमारे समान ही आचरण
करेगी । मैंने जो व्रत लिया है, उसको पूरा करके लौटूंगा । तुम हठ का त्याग करो ।
मेरी बातें मानो और मेरे कथन के अनुसार राजा बनो । अब तुम नगर को लौट जाओ।”
तब सभा म उपस्थित मुनि, सुर तथा ब्राह्मणो ने (मन-ही-मन) निश्चय कर
लिया कि अब युद्ध में रावण की मृत्यु निश्चित है । ऐसा सोचकर उन्होने भरत से कहा—
'हे उज्ज्वल धर्म-निरत भरत, तुम राम के आदेश का पालन करो ।'
३०. श्रीराम को जाबालि का उपदेश
तब मुनि जाबालि ने राम को देखकर कहा—'यह तुम्हारा कैसा व्यर्थ विचार है ?
तुमने मुनि-वेश धारण किये, नृप-वेश छोड़ दिया, राजभोग त्याग दिया और नियमो का
पालन करते हुए इस ढंग से जीवन व्यतीत करते हो ? कहाँ के माँ-बाप और कहाँ के
पुत्र ? कहाँ का सत्य और कहाँ का पुत्र-धर्म ? यह सब मिथ्या हैं । माता-पिता अपने
सुख के लिए आपस में मिलते हैं । शुक्र तथा रक्त के संयोग से मनुष्य-का जन्म होता है।
पिता केवल बीज का दान देता है । बहुत क्यो, बुझे हुए दीप में तेल देना जितना
निरर्थक है, वेद-विधि से परलोक-क्रियाएँ करना भी उतना ही निरर्थक है । इसलिए मेरी
बात मानकर तुम अयोध्या लौट जाओ और राज्य ग्रहण करो ।'
जाबालि के इन वचनो को सुनकर रघुवीर ने क्रोध में आकर कहा—'हे मुनींद्र,
ऐसे नास्तिकतापूर्ण विचार आप किसी दूसरे को समझावें । हमारे लिए वही आचरणीय हैं
जिसे हमारे पूर्वजो ने किया है। सब धर्म सत्य के आधार पर निर्भर हैं । सत्य से
बढकर दूसरा धर्म और क्या हो सकता है ? ऐसे सत्य का पालन करने के लिए मेरे
पिताजी ने मुझे वन में भेजा है । यदि उनके आदेश का तिरस्कार करूँ तो मुझसे बढ़कर
नीच और कौन हो सकता है ? ज्ञानियो का कहना है कि सत्य, धर्म, शम, दम, भूत-दया,
नीति, विक्रम, प्रिय वचन तथा देव-पितृ-पूजन स्वर्ग के साधन है । इन सब को मिथ्या
घोषित करनेवाले आप अग्रजन्मा कैसे कहला सकते हैं ? आपको क्यो दोष दूँ ? आप
जैसे नास्तिक का आदर करनेवाले मेरे पिता ही दोषी थे ।
राम के वचनो को सुनकर जाबालि ने बड़े स्नेह से कहा—'हे राजन्, मैने आपको
नास्तिक मानकर ऐसा विचार इसलिए प्रकट किया है, कि आप किसी प्रकार भी अयोध्या
लौट चलिए । इसलिए आप धैर्य धारण करें ।'
३१. पादुका-दान
तब संयमी वसिष्ठ ने इक्ष्वाकु से सूर्यवंश तक के सभी राजाओ - की चर्चा
अरण्यकाण्ड एवं किष्किन्धाकाण्ड
अयोध्याकांड १२१
करते हुए कहा—'हे अनघ, तुम्हारे वंश में ऐसा कभी नही हुआ कि अग्रज के रहते हुए अनुज
राजा बने । पूर्वजो की परंपरा के अनुसार तुम्हारा राज्य ग्रहण करना ही उचित है ।
किन्तु पिता के आदेश का उल्लघन न करने का तुम्हारा दृढ सकल्प है, तो जैसे भरत प्रेम
से तुम्हारी सेवा करता रहा है, वैसे वह तुम्हारी पादुकाओ की पूजा करते हुए शाति से रह
सकेगा । अत, तुम अपनी पादुकाएँ उसे प्रदान करो ।'
तब माता, मित्र, आश्रित, मत्री, प्रजा आदि सबने कहा—'हे राम, ऐसा
करना ही उचित है ।' तुरत भरत ने स्वर्ण-विलसित पादुकाएँ राम के सामने रख दी ।
तब राम ने उत्फुल्ल अरुण कमल के गर्भ के वैभव को भी परास्त करनेवाले मुनि-वधू के शाप
का मोचन करनेवाले, सृति-शिरोभाग पर विलसित होनेवाले, सतत सनकादि मुनिजनो के
विवाद के कारणभूत, अपने चरण उन पादुकाओ पर रखकर उन्हें भरत को दे दिया ।
उन दोनो को सिर पर धारण किये हुए भरत राघव से बोले—'हे देव, नृप-वेश त्याग
करके, मुनि-वेश धारण किये हुए, राज्य का भार इन पादुकाओ पर रखकर, में चौदह वर्ष
तक राज्य की रक्षा करूँगा । आपके चरणो की सौगध खाकर कहता हूँ कि यदि अवधि
के समाप्त होते ही आप अयोध्या नही लौटेंगे, तो मै अग्नि में प्रवेश करूँगा ।' यो कहकर
उन्होने अत्यत भक्ति से अपने अग्रज को प्रणाम किया । राम ने उन्हें हृदय से लगाकर
आशीर्वाद दिया । उसके पश्चात् उन्होने अपनी माताओ को सात्वना दी और पुण्यात्मा
मुनि-पुगवो, मित्रो, मत्रियो, वधु-बाधवो तथा सभी प्रजा को बडे प्रेम से विदा किया ।
अत्यधिक उमडते हुए शोकाकुल हृदय से भरत ने पादुकाओ की परिक्रमा की, उन्हें भद्रगज पर
प्रतिष्ठित किया और आप तथा शत्रुघ्न छत्र-चामर लिये हुए उसके पार्श्व में खडे हो गये ।
सब लोग वहाँ से रवाना हुए । भद्रगज के चारो ओर सेना चलने लगी ।
भरत इस प्रकार चित्रकूट से चलकर भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचे । वहाँ
उन्होने भरद्वाज मुनि को प्रणाम करके सारा वृत्तात उन्हें कह सुनाया । उनकी आज्ञा लेकर
आगे चले और गगा नदी पार करके शृगवेरपुर पहुँचे । बडे आदर से वहाँ गुह को
विदा करके, वे अयोध्या नगर पहुँच गये । रनवास में माताओ को छोडकर उन्होने अत पुर
की रक्षा के लिए सेना रख दी । मणि-रहित रत्न-मजूषा की तरह तथा सूर्य-रहित दिन की
तरह रामचन्द्र-रहित शून्य अयोध्या को देखकर उन्हें उस नगर में रहने की किंचित् भी
इच्छा नही रह गई थी । इसलिए वे नदीग्राम में जाकर निवास करने लगे । रघुराम की
पादुकाओ पर समस्त राज्य-भार रखे हुए, राम के समान ही उनकी सतत सेवा करते हुए, वल्कल
तथा जटाएँ धारण किये हुए, राघव के पुनरागमन की कामना करते हुए और उनके सद्गुणो
की प्रशसा करते हुए सरस सज्जन मत्रियो के परामर्श से भरत राज-काज सँभालने लगे ।
यह् अयोध्याकाड समस्त लोक में विख्यात होते हुए विद्वज्जनो की प्रशसा का पात्र
बन जाय । आध्र-भाषा के अधीश्वर, विमलचेता, आचारवान्, अनुपम धीमान्, भूलोकनिधि
गोनबुद्ध राजा ने, कमनीय गुण तथा धैर्य में मेरुपर्वत, शत्रु के लिए भैरव-रूप, महात्मा,
अपने पिता विट्ठल-नरेश के नाम पर आचद्रार्क ससार में पूज्य रहने योग्य रीति से,
असमान भाव तथा ललित शब्दार्थों से युक्त रामायण के अयोध्या-काड की रचना की ।
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रंगनाथ रामायण
ऋषि-आदिकाव्य और रसिकजनो के लिए आनंददायक होकर पृथ्वी पर विलसित इस
पुण्य-चरित्र को जो पढ़ते हैं, या सुनते हैं, उन्हें साम आदि बहुवेदो का धाम, रामनाम-
रूपी चिंतामणि की महिमा से समस्त भोग, परहित बुद्धि, उदार विचार, परिपूर्ण शक्ति,
साम्राज्य, विमल यश, नित्य सुख, धर्मनिष्ठा, दान में प्रेम, चिरायु, ऐश्वर्य तथा स्वास्थ्य,
अक्षय कल्याण, पापो का क्षय, श्रेष्ठ पुत्रो की प्राप्ति, शत्रु-नाश और धन-धान्य-समृद्धि
आदि प्राप्त होगे । उन्हें बिना किसी विघ्न-बाधा के लावण्यवती स्त्रियो का प्रेम तथा पुत्रो
के साथ जीवन प्राप्त होगा । उनके सब संकट दूर होगे । नातेदारो से उनका प्रेमपूर्ण
मिलन होता रहेगा और उनकी सब कामनाएँ पूर्ण होगी । उनके गृहो में देवता तथा
पितृ-देवताओ की तृप्ति होती रहेगी । यह (रामायण) मोक्षसाधक है, पापनाशक है,
दिव्य है, भव्य है, श्रीकर है । इसके रचयिता की श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति होगी और वे
इंद्र-भोगादि को प्राप्त करेंगे । जबतक कुल-पर्वत, नक्षत्र, रवि, चन्द्र तथा दिशाएँ रहेंगी,
जबतक वेद रहेंगे, पृथ्वी तथा समस्त लोक रहेंगे, तबतक यह कथा अक्षय आनंद-समूह
को देने में समर्थ होगी ।
: अयोध्याकांड समाप्त :
श्रीरंगनाथ रामायण
(अरण्यकांड)
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