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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 508 में से

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पृष्ठ 147

प्रकार का दुख का अनुभव कर रहे हैं। कैकेयी के पापी गर्भ से जन्म लेने के कारण
ही मुझे उनकी यह दुर्दशा देखनी पड रही है ।'
इसके पश्चात् उन दोनो ने (राम के निकट पहुँचकर) उनको प्रणाम किया । राम ने
उन्हें गले से लगा लिया और नेत्रो से आनदाश्रु बहाते हुए बडे स्नेह के साथ उनकी पीठो
पर हाथ फेरा और उन्हें आशीर्वाद दिये । तब सुमत्र तथा गुह ने उस सूर्यवशी को बडी
भक्ति के साथ प्रणाम किया । भरत तथा शत्रुघ्न ने तब जानकी तथा लक्ष्मण को प्रणाम
किया । उसके पश्चात् उन्हें कुशासन पर बैठने का आदेश देकर राघव बार-बार पिता तथा
माता का कुशल समाचार पूछते हुए बोले- "हे भरत, तुम क्यो इतनी दूर चलकर आये ?
राजा की आज्ञा से राज्य-भार ग्रहण करके नीति के साथ राज-काज चला रहे
हो न ? सत्यनिष्ठ महाराज दशरथ की सेवा नित्य प्रति करते हो न ? माताओ को
सात्वना देते हुए बडे आदर के साथ उनकी देखभाल करते हो न ? हमारे कुलगुरु तपो-
निष्ठ वसिष्ठ की पूजा करके सध्या के समय अग्निहोत्र की विधि का नियमपूर्वक पालन
करते हो न ? सज्जन मंत्रियो का परामर्श लेकर विजय-साधक मार्ग को समझ रहे हो न ?
प्रतिदिन रात्रि के पिछले पहर में जागकर तुम अर्थ-सिद्धि का चिंतन करते हो न ? उत्तम,
मध्यम और अधम, जनो का विचार करके उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें काम में लगाते
हो न ? अपराध का विचार करके अपने लोगो के सबध में भी न्यायदड का पालन
ठीक तरह से करते हो न ? मतिमान्, लोकप्रिय, स्वामिभक्त तथा पराक्रमी को तुमने अपना
सेनापति बनाया है कि नही ? सेवको के वेतन बिना विलब के उन्हें देते हो न ? दूतो
के द्वारा राज्य का समाचार तथा शत्रुओ की गति-विधि का ज्ञान रखते हो न ? गर्व
त्यागकर दीन तथा निर्धन व्यक्तियो की पुकार सुनते हो न ? वर्णाश्रम-धर्म में किसी
प्रकार का व्यतिक्रम लाये बिना आवश्यक व्यवस्था करते हो न ? चोरो और जारों की
बढती को रोककर उन्हें कारावास में रखकर उचित दड देते हो न ? समय-समय पर
चतुरंगिणी सेना की पटुता का निरीक्षण करते हो कि नही ? दुर्गों को धन-धान्य तथा
सेना से युक्त रखते हुए उनका बल बढाते रहते हो न ? अन्याय से (पर) धन-सचय
न करके, किसानो को प्रेम से साथ रक्षा करते हो न ? धन-लोभ में पडकर विप्रो की
जागीरो का किंचित् भाग भी अपहरण नही करते हो न ? सतत गो-ब्राह्मणो के हित की
कामना करते हुए धर्म-निष्ठा में तत्पर रहते हो कि नही ? जो राजा (इच्छा, क्रिया,
ज्ञान) शक्तित्रय का, चार उपायो (साम, दाम, भेद, दड), पचागो, षड्गुणो तथा राजा के
चौदह दोषो का ज्ञान रखते हुए, दयालु होते हुए, मनु-धर्मशास्त्र के अनुसार देवताओ,
पितरो तथा ब्राह्मणो की पूजा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है, वही स्वर्ग प्राप्त
करता है । तुम भी उसी प्रकार राज्य करते हो न ?"

२९. भरत का राम को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना

तब भरत गद्गद कठ से हाथ जोडकर बोले- 'हे राजकुलाधीश, मैं यह धर्म-मार्ग
कुछ नही जानता । हे धर्मनिपुण, और एक समाचार सुनिए । कैकेयी ने निर्दयतापूर्वक
आपको बुला भेजा और आपको वन जाने का आदेश दिया । आप बिना विलब किये