सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

पर तमाल, रसाल, कपिला, ताल, हिंताल, लसोडा आदि वृक्ष सुशोभित हैं, जिसके पवित्र
तट पर, मुनियो का समूह विराज रहा है और जिसका प्रवाह हंसो के मद गमन से हिल-
सा रहा है।' इस प्रकार कहते हुए वे विभिन्न प्रकार के वृक्षो के नीचे, लता-कुंजो, पर्वत के
शिखरो पर, तराइयो में तथा गुफाओ में अत्यन्त प्रसन्नता से विचरण कर रहे थे।
इसी समय उन्होने भरत की सेना का कोलाहल सुना । भयभीत होकर चारो ओर
भागनेवाले हाथी, वराह आदि मृगो को तथा उड़ती हुई अत्यधिक, धूल को देखा। तब
उन्होने लक्ष्मण से कहा कि तुम पता लगाओ कि इस प्रकार धूल क्यो उड़ रही है ?
लक्ष्मण ने तुरत एक ऊँचे वृक्ष के शिखर पर चढकर देखा कि उत्तर की दिशा से सूर्यवंश के
चिन्हो से युक्त पताकाएँ फहराती हुई एक विशाल सेना आ रही है। उन्होने मन-ही-मन
निश्चय कर लिया कि भरत राम पर आक्रमण करने के लिए आ रहे है। पर्वत पर
वज्रपात होने के समान तुरत वे पेड से उतर पडे और दौडते हुए राम के पास पहुँचकर
अत्यधिक रोष से बोले—'हे देव, आपको वन भेजकर समस्त राज्य को हस्तगत करने से
तृप्त न होकर, आज कैकेयी का पुत्र सारी सेना लेकर आप पर आक्रमण करने आ रहा है।
वह देखिए, कचनार (जैसी लाल) ध्वजाएँ ! वह सुनिए सैनिकों के वीर वचन !
आप शर, चाप तथा कवच धारण करके भरत का सामना कीजिए । नही, नही, आप और
सीता यहाँ से हट जाइए । आपकी सज्जनता ने ही इतना (अनर्थ) किया है। मै अब
सहन नही करूँगा । यदि भरत यहाँ आया, तो मै उसका वध कर डालूँगा ।'
राम बोले—'हे लक्ष्मण, मेरा अनुज होकर जन्म लेने पर भी तुम ऐसे अविनीत
क्यो हो रहे हो ! भ्रातृ-प्रेम की मूर्ति, परम पवित्र, नीति-कोविद तथा धर्म-तत्पर भरत,
मुझसे भी अधिक मेरा भक्त है । भरत के मन में कोई पाप नही है । मुझसे अयोध्या
लौट चलने की प्रार्थना करने के लिए वह आ रहा है । तुम शका छोड़ दो । राम के
आदेश का उल्लघन न कर सकने के कारण लक्ष्मण चुप हो रहे ।
२८. भरत की राम से भेंट
भरत ने नगरवासियो मित्रो, तथा सेना को एक जगह ठहरा दिया, माताओ के
साथ आने के लिए वसिष्ठ मुनि से प्रार्थना करके, स्वय शत्रुघ्न, सुमंत्र और गुह के साथ
उस पर्वत पर चढने लगे । जगल में मार्ग को पहचानने के लिए लक्ष्मण ने जो सकेत
बना रखे थे, उन्हें पहचानते हुए, चारो ओर दृष्टि डालते हुए (उन्होने) समस्त शस्त्रास्त्र-
समूह से युक्त विशाल आँगनवाली सुदर पर्णशाला को देखा । वहाँ पर मुनि-वेष धारण
किये हुए अत्यत हर्ष से विलसित होनेवाले राम को देखकर भरत मन-ही-मन अत्यत
दुखी हुए और शत्रुघ्न से कहने लगे—'हे शत्रुघ्न, देखा तुमने ? स्वर्ण-सौधो में रहनेवाले
राम आज एक पर्णशाला में निवास कर रहे हैं। पुष्प-शय्या पर विराजनेवाले आज धूलि-
युक्त पर्णशाला में रह रहे हैं। मुकुट धारण करनेवाले, प्रेम से जटाएँ धारण किये हुए हैं।
राजाओ की सेवाएँ प्राप्त करते हुए रहनेवाले आज मृगो के मध्य रहते हैं। दिव्य
वस्त्र धारण करनेवाले आज मुनियो के वल्कल पहने हुए हैं। सुस्वादु भोजन करनेवाले,
आज कच्चे फलो पर दिन व्यतीत कर रहे हैं। हाय, शुभप्रद मूर्तिवाले राम आज इस