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रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, गुरु-परम्परा एवं पूजा-संकल्प

श्रीसीतारामाभ्या नम
श्रीहनुमते नम
प्रस्थानत्रयानन्दभाष्यकाराय नमोनम
जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य प्रणीत
श्रीवैष्णवमतोब्जभास्कर परिशिष्ट
✤ श्रीरामर्चनपद्धतिः ✤
तदित्थं मुमुक्षुरुपासको मुहूर्त्तमात्रावशिष्टाया रात्रौ प्रतिबुध्यनिरालसः प्रातः
समुत्थाय धौतपाणिपादः प्राङ्मुखः स्थित्वा—
हरिः ॐ सचन्तयदुपसः सूर्येणचित्रामस्य केतवोराम विन्दन् ‘
आयन्नक्षत्रं ददृशेदिवो न पुनर्यतो नकिरद्वानुवेद ॥
हरिः ॐ अर्वाचीसुभगे ? भव सीते ? वन्दामहेत्वा ।
यथानः सुभगाऽससि यथानः सुफलाऽससि ॥
इत्यादिकमनुसन्धाय बहिर्निर्गत्य दक्षिणकर्णे यज्ञसूत्रं संवेष्ट्य उत्तराभिमुखो
भूत्वा मूत्रपुरीषोत्सर्जनं कुर्यात् । ततोऽतन्द्रितो गन्धलोपकरं शौचं विधायसप्तकृत्वः
सजलामलकमात्रमृत्तिकाभिर्गुदप्रक्षालनं कुर्यात् । त्रिः सजलमृत्तिकाभिर्लिङ्गशौचं च
ततो दक्षिणवामहस्तौ प्रत्येकं दशकृत्व सजलंमृत्तिकाभिः प्रक्षाल्यदक्षिणवामपादौ च
पञ्चकृत्वस्ताभिः प्रक्षाल्यषोडशकृत्वार्गण्डूषमाचरेत् । ततोद्विराचम्य शरीरशुद्धयेस्नानं
प्रोक्षणादिकं वा यथाशक्तिविधाय गुरुपरंपरानु सन्धानपूर्वकंतत्तन्मन्त्रानुच्चार्योर्ध्व-
पुण्ड्रान्धृत्वा पुनः स्वाचार्यं ध्यात्वा गुरुपरंपरानुसन्धानपूर्वकं रहस्यत्रयं चानुसन्धाय
पश्चात् सन्ध्यावन्दनादिकर्मतत्प्रयोगविधिना भगवदाज्ञया भगवत्कैंकर्यत्वेन च कुर्यात् ।
पश्चिमाम्नाय श्रीरामानन्दाचार्यपीठाधीश्वर
卐 स्वामीरामेश्वरानन्दाचार्य 卐
𑁍 प्रणीता गङ्गा 𑁍
सीताकान्तसमारम्भां रामानन्दार्यमध्यमाम् । रामप्रपन्नगुर्वन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ॥
अनादि काल से संसार सागर मे स्वकर्म जालाभिभूत होकर संसरणशील जीवों के उद्धार हेतु
जगद्गुरु श्रीसुरसुरानन्दाचार्यजी ने जगदुद्धार हेतु अवतरित "रामानन्द स्वयं राम प्रादुर्भूतो मही
तले" इस आगम शास्त्र बोधित करुणाशील जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्यजी महाराज से "तत्वं किम्"

८०४ | गङ्गा संहिता
१।४ आदि दश प्रश्न किये थे । उन प्रश्नों मे पाचवा प्रश्न 'धर्म एकोऽस्ति कश्च" १।४ श्री
वैष्णवमताब्जभास्कर के इस पाचवे प्रश्न के जवाब मे आनन्द भाष्यकार महाप्रभुजी ने सर्वधर्म
मुख्यात्मक श्रीवैष्णवधर्म निरूपण प्रसंग मे अर्चावतार की चर्चा 'अर्चावतारोऽपि च' ५।११ तथा
'स्वयं व्यक्तश्च' ५।१२ इन श्लोको से कर-
"आवाहनासनाभ्या च पाद्याद्याचमनैस्तथा ।
स्नानवस्त्रोपवीतैश्च गन्धपुष्पसुधूपकैः ॥५.१३
दीपनैवेद्यताम्बूलप्रदक्षिणविसर्जनैः । षोडशार्चाप्रकारैस्तमेतैरर्चेत्सदासुक्रीः ॥५.१४"
का उपदेश किया। अर्थात् मुमुक्षु भजनानन्दी महापुरुष प्रात उठकर के शौचादि स्नानान्त
प्रात्यहिक कर्मकर लेने के वाद समार्जित पूजा स्थानादि म उपस्थित होकर आवाहन आसन पाद्य
अर्घ्य आचमन स्नान वस्त्र यज्ञसूत्र गन्ध पुष्प धूप दीप नैवेद्य ताम्बूल प्रदक्षिणा और विसर्जनान्त
षोडशोपचार-विधि से समन्त्रक सर्वेश्वर श्रीरामजी की सर्वदा पूजा करे । पूजक यदि द्विज होतो
पुरुषसूक्त विधान से पूजन करे द्विजेतर होतो पौराणिक विधि से नियतरूप से अचेना करे । इस
प्रकार अति संक्षिप्त रूप से अर्चाश्रीविग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा का उपदेश महा प्रभुजी
ने किया । पर इस सूत्रात्मक उपदेश से सामान्य जन जिस प्रकार से सर्वेश्वरजी की सेवा होनी
चाहिये उस प्रकार नही कर पायेगे ऐसा विचार कर कारुणिक आचार्य श्रीने श्रीमुख से ही 'श्रीरा-
मार्चपद्धति' का उपदेश किया । जो कुछ विस्तृत तथा गद्य पद्य मय होने से स्वमुखारविन्द से ही
उपदिष्ट श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर के खिल-परिशिष्ट भाग के रूप म प्रसिद्ध है । कई एक व्यक्ति
इस श्रीरामार्चनपद्धति को भाष्यकार की अलग कृति के रूप मे परिगणित करते हैं क्रिया सौविध्य
के लिये अलग से मुद्रित भी हे पर यह है एक ग्रन्थ भास्कर का परिशिष्ट भाग ही महाभारत
का शेषभाग हरिवंश के समान । अत आचार्य प्रवर- "तदित्थम्" इत्यादि से पूर्वोपदिष्ट प्रसंगानु
सन्धानपूर्वक उपदेश प्रारम्भ कर रहे है ।
भवसागर से मुक्ति की इच्छा वाले साधक को चाहियेकि दो घडी रात्रि शेष रहते ही
प्रात काल मे सर्वथा आलस्य रहित होकर उठ जाय । अनन्तर हाथ पैर धोकर यथेच्छ कुल्लाकर पूर्व-
दिशा के तरफ मुख कर बैठ जाय । तब अत्यन्त तन्मयता से- "हरि ॐ सचन्त' तथा "अर्वाची"
इन मन्त्रो का तथा प्रात स्मरण के पाच श्लोको का मधुर स्वर से अर्थानुसन्धानपूर्वक कीर्तन करे।
अनन्तर बाहर दूर जाकर दाहिने कान मे यज्ञसूत्र को वेष्टित-चढाकर उत्तराभिमुख होकर मल-
मूत्रका त्याग करे । पुन शौच तथा दुर्गन्ध निवारणार्थ आलस्य रहित होकर आवले के दाने के
बराबर विशुद्ध मिट्टी तथा शुद्ध जल से प्रत्येकवार सात बार गुदा को तीन बार लिंग को विधिवत्
प्रक्षालन कर फिर पूर्व क्रम से ही दशवार दोनो हाथ तथा पांचवार दोनोंपैर का प्रक्षालन करे ।
अनन्तर शुद्ध जल से सोलह कुल्ला करके शुद्ध हो जाय । इसके बाद दो वार आचमन कर देह
शुद्धि के लिये विशुद्ध जल से स्नान करे-देश काल स्वास्थ्यादि के आनुकूल्य से प्रोक्षणादि को
सम्पन्न करे । इसके बाद "श्रीराम जनकात्मजामनिन वेधो वशिष्ठावृपी यागीश च पराशर श्रुतिविद्
व्यास जिताक्ष शुकम् । श्रीमन्त पुरुषोत्तम गुणनधि गङ्गाधराद्यान्यतीन् श्रीमद्राघवदेशिकञ्च वरद
स्वार्यवर्यं श्रये ॥ इत्यादि समस्त पूर्वाचार्यो को अपने आचार्य-अपने दीक्षा गुरु तक सभी का
अनुसन्धान सादर स्मरण कर उन-उन मन्त्रो के उच्चारण पूर्वक बारह ऊर्ध्व पुण्ड्रों को धारण करके
अपने आचार्य-दीक्षागुरु तथा आचार्य परपरा के-

श्रीरामर्चनपद्धति ८०५
सीताकान्तसमारम्भां रामानन्दार्य मध्यमाम्।
अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ॥
इस श्लोक के स्मरणपूर्वक रहस्यत्रय-मन्त्रराज पढ़कर चरम मन्त्र तथा शरणागति मन्त्रों का
सार्थ स्मरण कर अनन्तर भगवान् की आज्ञा से सर्वेश्वर श्रीरामभद्रजी का कैङ्कर्य बुद्ध्या सन्ध्या
वन्दनादि नित्य कर्मों को शास्त्रीय विधान के अनुसार सम्पादन करे।
ततो दिव्यमङ्गलविग्रहस्यसाङ्गसायुधसपरिवारस्य श्रीसीतालक्ष्मणसमेतस्य भगवतो
रामभद्रस्य मनसैव एकैकमङ्गं ब्रह्मसृष्टिलोकोत्तरसौन्दर्यलावण्याढ्यं ध्यायन् दिव्यैः
षोडशोपचारैरर्चनं विदध्यात्।
इसके बाद प्रत्येक अंग प्रत्येक आयुध-शस्त्रादि परिवार सर्वेश्वरी श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजी
से संपृक्त दिव्य मगल श्रीविग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी क सर्वलोकोत्तर सौन्दर्यलावण्य से युक्त
पृथक् पृथक् अंग का मन से ही सम्यक् ध्यान करते हुये दिव्य षोडशोपचार से मानसिक अर्चना करे।
माध्याह्निकानुष्ठानसमयेऽपि भगवच्चरणारविन्दं स्वाचार्यचरणारविन्दं च ध्यायन्
स्नात्वा भगवद्विभूतिर्भगवच्छरीरभूतान् देवर्षिपितॄन् ध्यात्वा संतर्प्य च धौतवस्त्रादिकं
परिधायाचम्य पूर्ववद्देवोर्ध्वपुण्ड्रादिकं विधायैवमेवभगवदाराधनत्वेनैव माध्याह्निकानु-
ष्ठानमपि कुर्यात् ।
भगवान के मध्याह्निक आराधन के समय से भी सर्वेश्वर श्रीरामभद्रजी के श्रीचरण कमल
तथा स्वाचार्य देव के चरणकमलों का ध्यान करते हुए स्नान क्रिया सम्पादन करके सर्वाधार श्रीराम
जी की विभूति तथा शरीर भूत देवताओं और पितरों का ध्यान पूर्वक तर्पण करे। बाद में स्वच्छ
वस्त्र धारण कर आचमन कर के पहले बताए गए विधिके अनुसार ही ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे।
इसी प्रकार से सर्वदा सर्वेश्वर श्रीरामजी की आराधना बुद्ध्या मध्याह्निक क्रिया का सम्पादन करे !
अथैवमर्चनयोग्यो मुमुक्षुरुपासको भगवन्मन्दिर प्रविश्य
श्रीरामंजनकात्मजामनिलजं वेधोवसिष्ठावृषी
योगीशञ्चपराशर श्रुतिविदं व्यासंजिताक्षं शुकम् ।
श्रीमन्तं पुरुषोत्तमं गुणनिधि गङ्गाधराद्यान् यतीन्
श्रीमद्राघवदेशिकञ्च वरदं स्वाचार्यवर्यं श्रये ॥
इत्यादि श्रीगुरुपरम्परादिकमनुसन्दधत्साष्टाङ्गत्वेन दण्डवद्भगवन्तं प्रणम्य,
अर्चनपात्रादीनि संमृज्य शुद्धजलेन संप्रक्षाल्य समर्चनीयदेवस्य दक्षिणपार्श्वे समुपविश्य
पूर्वदिनसमर्पितगन्धमाल्यतुलसीदलादिकमपनीयपीठोपरिसन्निवेश्य आग्नेयादारभ्य
प्रदक्षिणक्रमेण, अर्घ्यपाद्याचमनस्नानपात्राणि संस्थाप्य तेषां मध्ये शुद्धजलपात्रं निधाय ।
पूर्व में प्रदर्शित क्रिया के द्वारा सर्वेश श्रीरामजी की अर्चना के योग्य हुए सायुज्य मोक्ष की
इच्छावाले उपासक को भगवान् के मन्दिर मे प्रवेश कर श्रीरामजी श्रीजानकीजी श्रीहनुमानजी श्रीब्रह्माजी

८०६ गङ्गा संहिता
श्रीवशिष्ठऋषिजी योगियो मे श्रेष्ठ श्रीपराशरजी वेदज्ञाता श्रीव्यासजी जितेन्द्रिय श्रीशुकदेवजी सर्वगुणो
के खजाने ऐश्वर्यशाली श्रीपुरुषोत्तमाचार्यजी बोधायन यतियो मे श्रेष्ठ श्रीगङ्गाधराचार्यजी आदि
समस्त पूर्वाचार्यों के साथ अपने गुरुदेव वरदाता श्रीमान् जगद्गुरु श्रीराघवानन्दाचार्यजी का मै
आनन्दभाष्यकार जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य आश्रय लेता हूँ अर्थात् समस्त पूर्वाचार्यों को सादर
दण्डवत् प्रणाम करता हूँ ।
श्लोक के आदि शब्द से श्रीसदानन्दाचार्यजी श्रीरामेश्वरानन्दाचार्यजी श्रीद्वारानन्दाचार्यजी
श्रीदेवानन्दाचार्यजी श्रीश्यामानन्दाचार्यजी श्रीश्रुतानन्दाचार्यजी श्रीचिदानन्दाचार्यजी श्रीपूर्णानन्दाचार्यजी
श्रीश्रियानन्दाचार्यजी तथा श्रीहर्यानन्दाचार्यजी का ग्रहण होता है । क्योकि श्रीआचार्यजी के
परम्परा मे श्रीरामजी से लेकर उनके गुरुदेव जगद्गुरु श्रीराघवानन्दाचार्यजी तक २१ आचार्य
है। अत आचार्य प्रवर आनन्दभाष्यकार श्रीरामानन्दाचार्यजी श्रीसम्प्रदाय (श्रीरामानन्द सम्प्रदाय)
के २२वे आचार्य है। इत्यादि श्रीगुरु परम्परादिक का अनुसन्धान करते हुये समाराधनीय भगवान
को सादर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर के पूजा के पात्रो को मलकर शुद्ध जल से धोकर स्वच्छ
करे अनन्तर समाराधनीय देव के दाहिने भाग मे बैठकर पहले दिन के चढे पुष्प चन्दन गन्ध
तुलसीदल माला आदि को वहाँ से हटाकर पीठ वाजोट-डाली आदि । रखकर एक तरफ कर दे।
अनन्तर अग्नि कोण से प्रारम्भ कर के प्रदक्षिणा क्रम से अर्घ्य पात्र पाद्यपात्र आचमनीयपात्र
स्नानीयपात्रो का स्थापन कर उनके मध्य मे शुद्ध जलपात्र का स्थापन करे ।
तत्रार्घ्यपात्रेसिद्धार्थक्षतकुशाग्रतिलयवगन्धफलपुष्प सहितं जलं निक्षिपेत् १ ।
दूर्वाविष्णुकर्णीपद्मश्यामाकसहित जलं पाद्यपात्रे निक्षिपेत् २ । एलालवङ्गकङ्कोलजा-
तिसहितं जलमाचमनपात्रे निक्षिपेत् ३ । कोष्ठमाजिष्ठहरिद्रामुस्ताशैलेयचम्पकवचाकर्पूर-
लामज्जकसहितं जलं स्नानपात्रेनिक्षिपेत् ४
अनन्तर अर्घ्यपात्र मे सरसो अक्षत कुशाग्र तिल यव गन्ध फल फूल सहित शुद्ध छना हुआ
जल डाले । पाद्यपात्र मे दुर्वा विष्णुकर्णी कमल तथा श्यामाक-सांवा सहित जल डाले । आच-
मनीय पात्र म इलायची लवंग, ककोल तथा जायफल सहित जल डाले । स्नानीयपात्र मे कूठ
मजीठ हल्दी मोथा छडीला चम्पा वच कपूर तथा लामज्जक-खस सहित जल डाले ।
तदेतदभावेतु तद्वाक्योच्चारणपूर्वकं तुलसीदलमेव तत्तत्तोयपात्रे निक्षिपेत् । श्री
मन्त्रराजेन प्रत्येकं तत्तत्पात्रं संमन्त्र्य सुरभिमुद्रां च प्रदर्श्य वामपार्श्वे पूर्णकुम्भं
निधाय अन्यानि पूजाद्रव्याणि दक्षिणपार्श्वे च निधाय मनसा स्वाचार्यमर्घ्यादिभिः
सम्पूज्य तद्धस्तेनैवाराधनं स्वीकार्यमिति भगवतेविज्ञाप्य प्राणायामत्रयं च कृत्वा भग-
वदुत्थापनाय भगवन्तं प्रार्थयेत् ।
पूर्वोक्त उन सभी वस्तुओ के अभावमे उन उन वस्तुओका नाम लेकर अर्घ्यादि पात्रों मे
केवल तुलसी सहित जलडाले । इसके बाद अर्घ्यादि सभी पात्रो को श्रीतारक मन्त्र से संमन्त्रित
करके सुरभिमुद्रा दिखाकर अपनी वाम भाग मे शुद्ध जल से भरा पात्र तथा अन्य पूजन की
समस्त सामग्री को अपनी दाहिने भाग मे रखकर अपने आचार्यजी की अर्ध्यादि से मानसिक

श्रीरामार्चनपद्धति ८०७
पूजनकरके श्रीआचार्य देव के द्वारा ही मानसिक भावना से पूजन वस्तुओ को आराध्य देव को
समर्पण करे । तात्पर्य यह कि भगवान् ? मै तो अल्पज्ञ हू अत आपकी आराधना मे पूर्णतया
असमर्थ हूं अत हमारे श्रीआचार्य देवके द्वारा ही आप मेरी आराधना को स्वीकार करे । इस
प्रकार प्रार्थना करके तीन बार प्राणायाम करके आराध्यदेव को शयन से उठाने के लिये इन
निम्नलिखित श्लोको द्वारा अतिविनम्र भाव से प्रार्थना करे ।
कौशल्यासुप्रजाराम ? पूर्वासन्ध्या प्रवर्तते । उत्तिष्ठनरशार्दूल कर्त्तव्यं दैवमाह्निकम् ।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठभद्रंते त्यजनिद्रा जगत्पते ? । त्वदीयोत्थानमात्रेण उत्थितं भुवनत्रयम् ।२।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठश्रीराम? भद्रं ते करुणानिधे ?। उत्तिष्ठ जानकीकान्त ? त्रैलोक्य मङ्गलं कुरु
अप्रमेयकृपासिन्धुस्वरूपे ? रामसुप्रिये ?। सुप्रभातानिशा सीते? श्रीरामाभिमुखीभव।४।
लक्ष्मणोत्तिष्ठ भद्रन्ते रामकैङ्कर्य्यतत्पर ?। सौमित्रे ? वीररामस्यप्राणप्रियतरप्रभो ?।५।
श्रीभगवद्रामचन्द्राभिमतानुरूपगुणविभवैश्वर्यशीलाद्यनवधिकातिसयासंख्येयकल्या-
णगुणगणा पद्मवनालयां पद्माननां पद्मदलायताक्षी नित्यानपायिनी भगवती निरवद्यां
श्रीसीतां श्रीरामदिव्यमहिषीमखिलजगन्मातरमशरणशरण्यामनन्यशरणः शरणमहं प्रपद्ये।
स्वशेषभूतेन मया स्वीयैः सर्वपरिच्छदैः ।
विधातुं प्रीतमात्मानं देवः प्रक्रमते स्वयम् ॥
इति श्लोकञ्चानुसन्धाय पश्चोपनिषन्न्यासं कुर्यात् ।
अनन्य पतिव्रता श्रीकौशल्यादेवी के सुपुत्र सर्वेश्वर हे रामजी प्रात कालिन सन्ध्या का समय
हो रहा है अत हे नरशार्दूल श्रीरामजी आप शैया से उठे कारण यह कि प्रात काल हो रहा है
अत देवाराधनादि दैनिक क्रियाओ को सम्पादन करना चाहिये। उन दैनिक क्रियाओ को सम्पाद
नार्थ आपका शरणापन्न यह सेवक उपस्थित है अत सर्वेश्वर श्रीरामजी ? आप जागें ।१। हे जगत्
पति श्रीरामजी ? आप निद्रा को त्याग कर जग जाय सुकोमल शैया को त्याकर उठ जाय हे
जगन्नियन्ता ? आप का कल्याण हो । प्रभो ? आपके उत्थान-यानी उठ जाने से तीन लोक उठ
जायगा अर्थात् तीनो लोकके जीव जगकर अपनी अपनी नित्यनैमित्तिक प्रवृत्तियो मे लगाजयेगे
अत लोगो की सत्प्रवृत्ति के लिये आप जागे ।।२।। हे श्रीरामजी ? आप उठ जाय हे करुणा
के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी आप जग जाय प्रभो ? आपका कल्याण हो। हे जानकीकान्त श्रीरामजी ?
आप उठ जाय । उठ कर तीनो लोको को कल्याण करे ।।३।। अमित कृपा के सिन्धु स्वरूपा
हे श्रीजानकीजी? हे श्रीराम प्रिया श्रीसीता जी ? प्रात काल हो गया है। अत सर्वेश्वरी हे श्रीसीता
जी ? उठकर नित्यकर्मो से निवृत्त होकर सर्वेश श्रीरामजी के अभिमुख सम्मुख हो जाय तथा श्रीराम
चन्द्रजी की आज्ञा के अनुसार सब कृत्य सम्पादन करावे ।।४।। हे श्रीलक्ष्मणजी ? आप उठ
जाय सर्वेश्वर श्रीरामजी के कैकर्य मे सर्वदा तत्पर रहनेवाले श्रीलक्ष्मणजी ? आपका कल्याण हो।
वीर व्रती श्रीरामजी के प्राण से भी प्रिय प्रभो ? श्रीलक्ष्मण ? हे सुमित्रानन्दन ? आप जागे तथा
श्रीरामजी के कैंकर्य मे सन्नद्ध हो जाय ।।५।। अनन्त ऐश्वर्य शाली सर्वेश्वर श्रीरोमजी के अनुरूप
गुण विभव ऐश्वर्य आदि अनवधिकातिशय अर्थात् सर्वोत्कृष्ट परमावधि से रहित उत्कृष्टवाली यानी

८०८ गङ्गा संहिता
सर्वोत्तम ऐश्वर्यवाली तथा असङ्ख्येय यानी अनन्त कल्याण गुण समुदायों से सम्पन्न तथा दिव्य
कमलबनो मे आवासशील दिव्य कमल के समान मुखकमलवाली और दिव्य कमलदल पत्रके समान
अति सुन्दर सर्वजन मोहक आङ्गवाली तथा नित्य अनपायिनी अर्थात् अनश्वर सर्वदा सर्वकाल देश
आदि मे एकरूपसे स्थिर रहनेवाली भगवती यानी उत्पत्ति प्रलय अगति गति विद्या अविद्या प्रभृति
छ प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पृक्त तथा निश्चय यानी कर्म से होनेवाले सङ्कोच विकास आदि सर्व
दोषो से सर्वदा रहित रहनेवाली सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी से सर्वदा अभिन्न रहने वाली श्रीरामजी
की दिव्य पत्नी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी जो सम्पूर्ण जगत् की माता शरण रहित सब जीवो को अपने
शरण मे रख कर सर्वदा के लिये अभय करने वाली सर्वेश्वरी श्रीसीताजी है उनके शरण मे अन्य
शरण रहित मै जाता हूं अर्थात् अन्यशरण रहित शरणागत सब जीवो को संसार भय से मुक्त कर
देनेवाली सर्वेश्वरी श्रीमतीजी के शरण मे मै जाता हूँ । सर्वेश्वर श्रीराम जी की आराधना करने
मे मेरे जैसे अल्पज्ञ जीव की गति ही क्या अत परम कारुणिक सर्वशरण्य श्रीरामचन्द्रजी अपने
शेष स्वरूप मेरे तथा श्रीरामजी के नित्य परिचारक नित्यमुक्त सेवको के द्वारा अपना अभीप्सित
सम्पादन करने के लिये या मेरे जैसे संसार चक्र मे पतित जीव का उद्धार करने के लिये स्वय
ही शुभ कार्यारम्भ कर रहे हे । इस प्रकार ऐकान्तिक रूप से अनुसन्धान-ध्यान करके पञ्चोप-
निषद् वाक्योका न्यास करे । वे इस प्रकार से है-
ॐ पां नमः परायपरमेष्ठ्यात्मने नमः इति शिरसि ।१।
ॐ यां नमः पराय पुरुषात्मने नमः इति नासाग्रे ।२।
ॐ रां नमः पराय विश्वात्मने नमः इति हृदये ।३।
ॐ वां नमः पराय निवृत्त्यात्मने नमः इति गुह्ये ।४।
ॐ लां नमः पराय सर्वात्मने नमः इति पादयोः ।५।
ॐ पा नम पराय परमेष्ठ्यात्मने नम इस मन्त्र को बोल कर शिर का स्पर्श करना । ॐ
या नम पराय पुरुषात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर नाक के अग्रभाग का स्पर्श करना । ॐ
रा नम पराय विश्वात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर हृदय का स्पर्श करना । ॐ वा नम पराय
निवृत्त्यात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर गुह्य-गुप्तांग का स्पर्श कर हाथ धोवे । ॐ ला नम
पराय सर्वात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर दोनो पैरो का स्पर्श करना ।
पञ्चोपनिषद् न्यासं विधाय श्रीमन्त्रराजन्यासं कुर्यात् ॐ रां ज्ञानाय हृदयाय
नमः । ॐ नमः ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा । ॐ रामाय शक्त्यै नमः शिखायै वषट् ।
ॐ बलाय कवचाय हुम् । ॐ तेजसे नेत्राभ्यां वौषट् । ॐ रामाय वीर्याय-अस्त्रायफट्।
पूर्वमे बताये अनुसार पञ्चोपनिषद् वाक्यो का न्यास करने के बाद नीचे बताये अनुसार से
श्रीमन्त्रराज का न्यास करे- ॐ रा ज्ञानाय हृदयाय नम ऐसा बोलकर हृदय प्रदेश का स्पर्श करे
ॐ नम ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ऐसा बोलकर शिरका स्पर्श करे । ॐ रामाय शक्त्यै नम शिखा
यैवषट् ऐसा बोलकर शिखा का स्पर्श करे । ॐ बलाय कवचाय हूँ ऐसा बोलकर दोनों हाथो के
मूल भाग का परस्पर मे स्पर्श करे । ॐ तेजसे नेत्राभ्या वौषट् ऐसा बोलकर दोनो नेत्रो का
स्पर्श करे । ॐ रामाय वीर्याय अस्त्राय फट् ऐसा बोलकर दक्षिण हाथ को शिर पर घूमाकर ताली
बजावे ।

इति मन्त्रराजन्यासमनुष्ठाय पूर्वस्थापितस्ववामपार्श्वस्थपूर्णकुम्भे श्रीराममन्त्रो-
च्चारणपूर्वकं तुलसीदलं निक्षिप्य श्रीमन्त्रराजेनैवाभिमन्त्र्य तज्जलेनार्घ्यादिपञ्चपा-
त्राणि क्रमेण षडक्षरमन्त्रोच्चारणपूर्वकं प्रपूर्य उद्धरण्यार्घ्यादिपञ्चपात्रेभ्यः किञ्चित्कि-
ञ्चित्तोयं समुद्धृत्यपूर्णकुम्भे निक्षिपेत् । तत उद्धरण्यार्घ्यसलिलमादायनासाग्रपर्यन्तमु-
त्धृत्य ॐ विरजे आगच्छागच्छेति सप्तकृत्वा उक्त्वा तत्तोयेनात्मानं पूजोपकरणानि
यागभूमि च प्रोक्ष्यावशिष्टमन्यत्र प्रक्षिपेत् ।
पूर्वोक्त रीतिसे श्रीमन्त्रराज का न्यास करने के बाद अपने वाम भाग मे पहले रखे पूर्ण
कुम्भ मे श्रीराममहामन्त्र का उच्चारण करते हुये तुलसी दल को डाले । पुन श्रीराममन्त्र से ही
अभिमन्त्रित करके उसी जलसे अयोदि पञ्चपात्रो को अर्घ्यपात्र के क्रम से षडक्षर श्रीमन्त्रराज के
उच्चारण पूर्वक भरकर पुन दक्षिणावर्त शंख या आचमनी से पाचो पात्रो से थोडा थोडा जल
निकालकर पूर्ण कुम्भ मे डाल दे । इसके बाद दक्षिणावर्त शंख या आचमनी से अर्घ्य पात्र से
जल लेकर अपने नाक के आगे तक ऊपर उठाकर ॐ विरजे आगच्छ आगच्छ इस आवा
हन वाक्य को सातवार बोलकर उस जल से अपना देह सब पूजा की सामग्री यागभूमि-मन्दिर
को भी प्रक्षालन सिंचन करके अवशिष्ट जल को अन्यत्र डाल दे ।
ततस्तुलसीदल समादाय हरिः ॐ
साकेतं दिव्यलोकं सुरतरुमतुलं तत्र रत्नालिगर्भं
हैमं सिंहासनं तच्छुभरुचिनिचयं भानुकोटिप्रकाशम् ।
पद्मं चानेकपत्रं कपिनिकरपति पादुके वातजातं
सुग्रीवान् द्वारपालान् नलगवयमुखान् रामभक्तानग्रपद्ये ।
वामं पादं प्रसार्याश्रितकलुषहरं दक्षिणं कुञ्चयित्वा
जानुन्याधाय दिव्येरिपुकुलदमने बाणचापे दधत्सः ।
रामः पाणिद्वयेन प्रतिभटभयदः पद्मगर्भारुणाक्षो
देवीभूषादिजुष्टो वितरतु जगतां शर्म साकेतनाथः ।२।
इति पद्यैरित्थमनुसन्धाय श्रीसीतालक्ष्मणसमेतभगवच्छ्रीरामचन्द्रचरणारविन्दे
तत्प्रक्षिपेत् ।
अनन्तर तुलसीदल को हाथ मे लेकर हरि ॐ इस प्रकार उच्चारण कर दिव्य लोक श्रीसाकेत
मे स्थिर वर्णनातीत कल्पवृक्ष के नीचे रत्न समूह से खचित दिव्य सुवर्ण सिहासन जो कि करोडों
सूर्य के प्रकास से भी अधिक प्रकाश वाला तथा कल्याण प्रद और जनमन मोहक है उसके मध्य
मे अनेक पत्रवालेदिव्य कमलासन मे विराजमान सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी है जिनके चारो तरफ कपि
सेनापतियो का समूह स्थित है, तथा श्रीरामजी के चरणारविन्द की सेवा करते हुए श्रीहनुमानजी
१०२

८१० गंगा सहिता
है । सुग्रीव नल नील गवय आदि प्रवान प्रधान लोग द्वारपाल के रूप मे स्थिर है । ऐसे श्रीराम
सेवापरायण श्रीरामभक्त तथा सर्वेश्वर श्रीरामजी के शरण मे मै हूँ यानी सपरिकर श्रीरामजी को
सादर प्रणाम करता हूँ ॥१॥ सम्पूर्ण कलुष कल्मष पाप के अपहरण करनेवाले वाम पाद् को
प्रसार्य-लम्बाकर लटकाकर तथैव सर्व पापताप संहारक दक्षिण पाद को मूढ़कर जानु के ऊपर रखकर
विराजमान तथा दिव्य दोनो कर कमलो से शत्रुकुल का दमन यानी नाश करनेवाले दिव्य धनुष
और बाण वारण किये हुए वे सर्वलोक प्रसिद्ध सर्वेश्वर श्रीरामजी जोकि कमल के बीच के भाग
के समान अरुण यानी लाल आख वाले प्रतिपक्षिवीरो को भय देने वाले यानी दमन करने वाले
दिव्य महिषी श्रीसीताजी तथा अनेक दिव्य आभूषणो से सुशोभित दिव्यधाम श्रीसाकेत लोक के
स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सब संसार को कल्याण प्रदान करे ॥२॥ इत्यादि पद्यों से ऊपर वर्णित
रूप से ध्यान वरकर सर्वेश्वरी श्रीसीताजी श्रीलक्ष्मणजी के सहित सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के चरणार
विन्दो मे हाथ मे ली हुई तुलसी आसन के रूप मे समर्पण करे ।
अथैवमासनं कल्पयित्वा ओमाधारशक्त्यै नमः इति आधार शक्त्यै अर्ध्या-
दीनि समर्पयामि । ओ प्रकृत्यै नमः इति प्रकृत्यै अर्ध्यादीनिसमर्पयामि । ओमखिलज-
गदाधाराय कूर्मरुपिणे नारायणाय नमः इति तस्मै अ०। ओंभगवतेऽनन्ताय नागराजाय
नमः इति तस्मै अ० । ॐ भूम्यै नमः इति तस्यै अ० । ॐ श्रीमाकेताय दिव्य नगराय
नमः इति तस्मै अ० । ॐ पुष्पकाय दिव्यविमानाय नमः इति तस्मै अ० । ॐ श्री
साकेतायदिव्यजनपदाय नमः अ० । ॐ आनन्दयायमदिव्यरत्नमण्डपाय नमः अ० ।
ॐ आस्तरणभूताय अनन्ताय नमः अ० ।
पूर्वोक्त क्रम से आसन की कल्पना करके निम्नप्रकार से आधार शक्ति आदि की पूजा करे-
ॐ आधार शक्त्यै नम अर्ध्या दीनि समर्पयामि इस मन्त्र को बोलकर आधार शक्ति की पाद्य
अर्घ्य आचमनीय आदि षोडशोपचार या यथा मिलितोपचार यांनी षोलह पदार्थों से या जितने
पदार्थ की शक्यता हो उतने ही पूजा की सामग्री से पूजा करे । अर्ध्यादि मे आदि शब्द से अन्य
पूजा द्रव्यो का ग्रहण करना चाहिये जो देश काल तथा शक्ति के अनुसार जुटाई गई हो।
ॐ प्रकृत्यै नम इति प्रकृत्यै अर्ध्यादीनि समर्पयादि ऐसा बोलकर यथोपचार सामग्री से प्रकृति की
पूजा करे । तथैव ॐ अखिल जगदाधाराय कूर्मरूपिणे नारायणाय नम ऐसा बोलकर निखिल
ब्रह्माण्ड के आधार भूत कूर्मजी की पूजा करे। ॐ भगवते अनन्ताय नारायणाय नम इस प्रकार
बोलकर सर्वोपचार से नागराज की पूजा करे । ॐ भूम्यै नम ऐसा बोलकर सर्वोपचारौद्रव्य से
भूमिकी पूजा करे । ॐ श्री साकेताय दिव्य नगराय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से
सर्वापेक्षयोपर रूप से स्थित दिव्य धाम श्रीसाकेत की पूजा करे । ॐ पुष्पकाय दिव्यविमानाय
नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यो से दिव्य पुष्पक विमान की पूजा करे । ॐ श्रीसाकेताय
दिव्य जनपदाय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यो से श्रीसाकेत नामक दिव्यजनपद की पूजा
करे । ॐ आनन्दमयाय दिव्यरत्नमण्डपाय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्य से आनन्दस्वरूप
दिव्यरत्नमण्डप की पूजा करे । ॐ आस्तरणभूताय अनन्ताय नम ऐसा बोलकर सर्वोपचार द्रव्यों
से आस्तर स्वरूप यानी ऊपर का बिछौनाके रूपमे अनन्त की पूजा करे । इसके बाद-

प्रथम खण्ड: न्यास, मन्त्र-दीक्षा एवं षोडशोपचार रामार्चन

आग्नेय्यां दिशि ॐ धर्माय पीठपादाय नमः अ० । नैऋत्या ॐ ज्ञानाय पीठ-
पादाय ननः अ० । वायव्या ॐ वैराग्याय पीठपादाय नमः अ० । ऐशान्या ॐ
ऐश्वर्यायपीठपादाय नमः अ० । मध्ये ॐ पीठभूताय अनन्ताय नागराजाय नमः
अ० । प्राच्यां ॐ अधर्माय पीठगात्राय नमः अ० । दक्षिणस्या ॐ अज्ञानाय पीठ-
गात्राय नमः अ० पश्चिमायां ॐ अवैराग्याय पीठगात्राय नमः अ० । उत्तरस्या ॐ
अनैश्वर्याय पीठगात्राय नमः अ० ।
ॐ धर्माय पीठपादाय नम इस मन्त्र को बोलकर प्रथम सिंहासन के अग्नि कोण की अर्घ्य
आदि सर्वोपचार से पूजा करे । ॐ ज्ञानाय पीठपादाय नम ऐसा बोलकर नैऋत्य कोण की पूजा
करे । ॐ वैराग्यायपीठ पादाय नम ऐसा बोलकर वायव्य कोण की पूजा करे । ॐ ऐश्वर्याय
पीठपादाय नम ऐसा बोलकर ईशान कोण की पूजा करे । ॐ पीठ भूताय अनन्ताय नागराजाय
नम ऐसा बोलकर मध्यभाग की पूजा करे । ॐ अधर्माय पीठगात्राय नम ऐसा बोलकर सिंहा
सन के पूर्वभाग की पूजा करे । ॐ अज्ञानाय पीठ गात्राय नम ऐसा बोलकर दक्षिण भाग की
पूजा करे । ॐ अवैराग्याय पीठगात्राय नम ऐसा बोलकर पश्चिम दिशा की पूजा करे । ॐ
अनैश्वर्याय पीठगात्राय नम ऐसा बोलकर उत्तर दिशा की पूजा करे ।
एभिः परिच्छिन्नतत्त्वसदसदात्मकाय नमः अ० । ॐ ऋग्वेदाय पीठवाहकाय
नमः अ० । ॐ यजुर्वेदाय पीठवाहकाय नमः अ० । ॐ सामवेदाय पीठवाहकाय
नमः अ० । ॐ अथर्ववेदाय पीठ वाहकाय नमः अ० । इत्थं गन्धपुष्पादिभिस्तान-
भ्यर्च्य प्रणमेत् ।
ॐ एभि परिच्छिन्नतत्त्वसदसदात्मकाय नम ऐसा बोलकर अधर्म अज्ञान अवैराग्य तथा
अनैश्वर्य रूपमात्र से मुक्त कार्य तथा कारणस्वरूप पीठतत्त्व की सर्वोपचार से पूजा करे ।
पुन ॐ ऋग्वेदाय पीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर पूर्वदिशा मे ऋग्वेद की पूजा करे । ॐ
यजुर्वेदाय पीठवाहकाय नम ऐसाबोलकर दक्षिण दिशा मे यजुर्वेद की पूजा करे । ॐ सामवेदाय
पीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर पश्चिम दिशा मे सामवेद की पूजा करे । ॐ अथर्ववेदाय
पीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर उत्तर दिशा मे अथर्ववेद की पूजा करे । ऊपर बताए अनुसार
गन्ध पुष्प अक्षत आदि यथोचित पूजा सामग्री से भगवोन के सिंहासन के वहन करने वाले
वाहक रूप चारो वेदो की पूजा कर प्रणाम करे ।
अथ पीठवाहकोपरि ॐ परिच्छिन्नतनवेपीठभूताय शुद्धात्मकायाऽनन्ताय-
नागराजाय नमः इति तस्मै अ० । तत्रानन्तोपरि ॐ अष्टदल पद्माय नमः इति
तस्मै अ० । तद्दलेषु ॐ सं सूर्याय नमः अ० । केशरेषु ॐ सं सोममण्डलाय नमः अ० ।
कर्णिकायाम् ॐ रं वह्निमण्डलाय नमः अ० ।
पूर्व मे बताये अनुसार वेदो की पूजा करने के बाद ॐ परिच्छिन्नतनवे पीठ भूताय
शुद्धात्मकायाऽनन्ताय नागराजाय नम ऐसा बोलकर पीठवाहक चारो वेदो के ऊपर पीठस्वरूप शेष

८१२ गङ्गा सहिता
की सर्वोपचार द्रव्यो से पूजा करे । पुन अनन्त के ऊपर मे ॐ अष्टदल पद्माय नम ऐसा
बोलकर अष्टदल कमल की पूजा करे । ॐ स सूर्याय नम ऐसा बोलकर अष्टदल कमल के दलों
-पत्तो पर सूर्य मण्डल की पूजा करे । ॐ स सोममण्डलाय नम ऐसा बोलकर कमल के केसरोँ
मे चन्द्रमण्डल की पूजा करे । ॐ र वह्निमण्डलाय नम ऐसा बोलकर अष्टदलकमल के कर्णिका
मे अग्नि मण्डल की पूजा करे ।
इति मण्डलत्रयं ध्यात्वा पद्मस्य पूर्वपार्श्वदले ॐ विमलायै चामरहस्तायै नमः
इति तस्यै अ० । पद्मस्याग्निकोणे ॐ उत्कर्षिण्यै चामरहस्तायै नमः इति अ० । पद्मस्य
दक्षिणदले ॐ ज्ञानरूपायै चामरहस्तायै नमः अ० । पद्मस्य नैऋत्यदले ॐ क्रियायै
चामरहस्तायै नमः अ० । पद्मस्य पश्चिमदले ॐ योगायै चामरहस्तायै नमः अ० ।
पद्मस्य वायव्यदले ॐ सत्यायै चामरहस्तायै नमः अ० । पद्मस्योत्तरदले ॐ प्रह्वयै
चामरहस्तायै नमः अ० । पद्मस्यैशानदले ॐ ऐशानायै चामरहस्तायै नमः अ० ।
पूर्वोक्त प्रकार से अष्टदल कमल मे तीनो मण्डल का शान्तचित्त से ध्यानकर यथोपचार पूजा
करके ॐ विमलायै चामरहस्तायै नम इस मन्त्रको बोलकर कमल के पूर्वभाग के दल मे हाथ
मे चंवर ली हुई विमलाजी की अर्ध्यादि से पूजा करे । तथैव ॐ उत्कर्षिण्यै चामरहस्तायै नम
को बोलकर कमल के अग्नि कोण के दल मे चंवर हस्ता उत्कर्षिणी की अर्ध्यादि से पूजा करे ।
ॐ ज्ञानरूपायै चामरहस्तायै नम ऐसा बोलकर कमल के दक्षिणदल मे चंवर ली हुई ज्ञानरूपा की
अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ क्रियायै चामरहस्तायै नम ऐसा बोलकर कमल के नैऋत्यकोण के
दल मे हाथ मे चंवर ली हुई क्रिया शक्ति की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ योगायै चामरहस्तायै
नम ऐसा बोलकर कमल के पश्चिम दल मे हाथ मे चंवर ली हुई योगशक्ति की अर्ध्यादि से पूजा
करे । ॐ सत्यायै चामरहस्तायै नम ऐसा बोलकर कमल के वायव्यकोणवाले दल मे हाथ मे चंवर
ली हुई सत्यास्वरूपा शक्ति की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ प्रह्व्यैचामर हस्तायै नम ऐसा बोलकर
कमल के उत्तर तरफ के दल मे हाथ मे चंवर ली हुई प्रह्वीनामक शक्ति की अर्ध्यादि से पूजा
करे । ॐ ऐशानायै चामरहस्तायै नम ऐसा बोलकर कमल के ईशान वाले दल मे हाथ मे चंवर
ली हुई ऐशानी रूपा शक्ति की अर्ध्यादि से पूजा करे । अनन्तर-
भगवतोऽग्रे कर्णिकायाः पूर्वभागे ॐ अनुग्रहायै नमः अ० । पद्मस्य कर्णि-
कायां ॐ जगत्प्रकृतयेदिव्ययोगपीठवाहकाय नमः अ० । दिव्ययोगपीठवाहकोपरि
ॐ दिव्ययोगपीठाय नमः अ० । योगपीठे ॐ दिव्ययोगपर्यङ्काय नमः अ० ।
पर्यङ्कोपरि ॐ सहस्रफणाशोभिताय नागराजाय नमः अ० । पुरो ॐ भगवत्पादपीठाय
नमः अ० । तदुपरि ॐ भगवत्पादुकाभ्यां नमः अ० ।
ॐ अनुग्रहायै नम इस मन्त्र को बोलकर भगवान् श्रीरामजी के आगे अष्टदल कमल की
कर्णिका के पूर्वदिशा में अनुग्रहा रूपा शक्ति की अर्घ्य आदि सर्वोपचार द्रव्यों से पूजा करे ।
ॐ जगत्प्रकृतये दिव्ययोगपीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर अष्टदल कमल के कर्णिका मे दिव्ययोग-
पीठ वाहक की अर्घ्य आदि से पूजा करे । ॐ दिव्ययोगपीठाय नम ऐसा बोलकर दिव्ययोग

पीठवाहक के ऊपर दिव्ययोग पीठकी अर्घ्य आदि से पूजा करे । ॐ दिव्ययोगपर्यङ्काय नम ऐसा
बोलकर योगपीठ पर दिव्ययोग पर्यङ्क की अर्घ्य आदि से पूजा करे । ॐ सहस्रफगाशोभिताय
नागराजाय नम ऐसा बोलकर पर्यङ्क के ऊपर सहस्र फग से शोभित नागराज की अ र्ये आदि
से पूजा करे । ॐ भगवत्पाद पीठाय नम ऐसा बोलकर भगवान् के सामने भगवान् के पादुका
पीठ की अर्घ्य आदि से पूजा करे । ॐ भगवत्पादुकाभ्या नम ऐसा बोलकर पादुका पीठ के
ऊपर भगवान के दिव्य पादुका खडाउ की अर्घ्य आदि से पूजा करे ।
अथ तादृशाष्टदलपद्मस्थपर्यङ्कस्थितानन्तोपरि-
प्रपन्नाभीष्टसन्दोहश्रीराम ? करुणानिधे ?।
शिवशेषाद्यविज्ञेयाशेषमाहात्म्य राघव ? ।१।
तादृश्या सीतयाऽऽगच्छ लक्ष्मणेन सह प्रभो ? ।
आज्ञां क्रियस्व दासस्य प्रपन्नस्यार्चनाय मे ।२।
इति श्रीसीतालक्ष्मणसहितमप्रमेयकृपारत्नाकर भगवन्तं साङ्गं सोयुधं सपरि-
वारं सवाहनं स्वशक्तियुक्त श्री रामचन्द्रमावाह्य पुष्पाञ्जलि च तस्मै प्रदाय पूर्वस्था-
पितार्घ्यपात्रादुद्धरण्यार्घ्यजलमादाय ॐ श्रीसीतालक्ष्मणसमेतायाप्रमेयकृपा रत्ना-
कराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नमः, मध्ये 'रां रामाय नमः' वामे 'श्रीसीतायै स्वाहा'
दक्षिणे 'लं लक्ष्मणाय नमः' इति तत्तन्मन्त्रैः पृथक् पृथग्वा अर्घ्यं समर्पयामी त्युक्त्वा
भगवतो दक्षिणहस्त प्रोक्षन्निव विभाव्य तज्जलं पतनपात्रे प्रक्षिपेत् ।
पूर्व कथित विधान से भगवान् के पादुकान्त पूजा होजाने के बाद पहले वर्णित अष्टदल
कमल मे स्थित अनन्त के ऊपर निम्न रूप से सपरिकर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी का आवाहन करे
शरण मे आये हुये सभी जनो के इच्छित पदार्थ को देने वाले हे करुणा के खजाने सर्वेश्वर
श्रीरामजी ? शिव शेषनाग सर्वदेव समूह सरस्वती प्रभृति से सर्व प्रयत्न करने पर भी आप का
सम्पूर्ण माहत्म्य नही जाना जा सका ऐसे अनन्त माहत्म्य शाली रघुकुल श्रेष्ठ हे श्रीराघवजी ?
सर्वसमर्थ प्रभु श्रीरामजी ? आप से अभिन्न स्वरूपो नित्य सहचरी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी
तथा सर्व जगत् के आधार श्रीलक्ष्मणजी के साथ पधारे तथा आपके शरण मे आये आपका
नित्य किंकर मुझे आपकी पूजा करने के लिये आज्ञा प्रदान करे । इस प्रकार प्रार्थना पूर्वक
सर्वेश्वरी श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजी के साथ अप्रमेय अमित कृपा के समुद्र सर्वेश्वर श्रीरा-
मचन्द्रजी को आयुध-दिव्यास्त्र धनुप बाणादि सपरिवार बाहन अनन्तानन्त अपनी शक्तियो के
साथ श्रीरामचन्द्रजी को आवाहन करके पुष्पाञ्जलि श्रीचरणो मे समर्पण करके पहले से स्थापित
अर्घ्यपात्र से दक्षिणावर्तशंख या आचमनी से अर्घ्य जल लेकर-ॐ श्रीसीता लक्ष्मण समेताया
प्रमेय कृपा रत्नोकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस मन्त्र को बोलकर श्रीरामजी का दाहिना हाथ
प्रक्षालन की भावना से अर्घ्यं समर्पयामि ऐसा कहते हुये हाथ मे लिया अर्घ्य जल पतनपात्र
योनी तरभाणीं मे गिरादे । अनन्तर पाद्य आदि यथा मिलित पूजा द्रव्यों का नाम लेकर सभी
वस्तुओं से पूर्व क्रम से ही पूजा करे । अथवा दिव्यासन के मध्यभाग मे-रा रामाय नमः, इस

८१४ गङ्गा संहिता
महामन्त्र से सर्वेश्वर श्रीरामजी का सर्वोपचारो से पूजा करे । तथैव श्रीरामजी के वामभाग मे ‘श्री
सीतायै स्वाहा’ इस मन्त्र से श्रीसीताजी की आवाहन तथा पूजा करे । श्रीसीताजी तथा श्री
रामजी के आसन से किञ्चित् न्यून नीचे श्रीरामजी के दक्षिण भाग मे ‘ल लक्ष्मणाय नम’ इस
मन्त्र से श्रीलक्ष्मणजी का आवाहन कर पूजा करे । यहा यह खयाल मे रखना चाहिये कि यदि
आचमनी एक ही हो तो उसे शुद्ध जल से प्रक्षालन धोकरही अर्घ्यपात्र से पाद्यपात्र मे तथा
पाद्यपात्र से आचमन पात्र मे डालना चाहिये । अलग अलग पात्रो के लिये अलग अलग
आचमनी की व्यवस्था हो तो अति उत्तम ।
तत उद्धरणीं शुद्धजलपात्रजलेन संप्रक्षाल्य ततस्तया पाद्यजलपात्रात् पाद्यजलमादाय
तदेव वाक्यं समुच्चार्य पाद्यं समर्पयामीति वदन् भगवतः पादौ प्रक्षाल्येव विभाव्य
तज्जलं पतनपात्रे द्विः प्रक्षिपेत् । शुद्धजलपात्रस्थजलेनोद्धरणी प्रक्षाल्य आचमन पात्रा-
त्ताज्वलमादाय तदेव वाक्यं समुच्चार्य आचमनं तस्मै समर्पयामीति वदन् भगवतो
मुखकमलसमीपे प्रदर्श्य तज्जलं पतनपात्रे त्रिः प्रक्षिपेत् ।
पुन शुद्धजल पात्र के जल से आचमनी को प्रक्षालन कर के आचमनी से पाद्य जलपात्र
से पाद्यजल लेकर ॐ श्रीसीता लक्ष्मण सहितायाऽप्रमेय कृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम
इस प्रकार बोलकर या पूर्वोक्त क्रमसे श्रीरामजी श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजी को अलग अलग
उन उन मन्त्रो का उच्चारण करते हुये भगवान के श्रीचरण कमलो को प्रक्षालन की भावना करके
पाद्यं समर्पयामि बोलकर श्रीचरणो मे दृष्टि रखकर पतन पात्र मे दो वार उस जल को गिरावे ।
फिर शुद्ध जलपात्र के जल से आचमनी को प्रक्षालन करके आचमनी मे आचमन पात्र से जल
लेकर ॐ श्रीसीता लक्ष्मण सहितायाऽप्रमेयकृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस प्रकार
बोलकर श्रीमुखारविन्द के समक्ष दृष्टि करके आचमनीय जल को भी श्रीमुखकमल के समक्ष करके
मै भगवान को आचमन करा रहा हू ऐसी भावनाकर “आचमनीयं समर्पयामि” ऐसा बोलते हुए
आचमनीय जल को पतन पात्र मे तीन वार गिरादे ।
उद्धरणी पूर्ववदेव प्रक्षाल्य शुभ्रवस्त्रेण हस्तकमलमुख कमलेसंमृज्य, शाटिकोत्तरा-
ग्रेण पदौ च प्रत्येकं संमृज्य, षोडशोपचारान् समर्पयामीति पुष्पाञ्जलि प्रदाय,
उद्धरण्या पूर्णकुम्भात्सलिलमुद्धृत्यक्षीरफलगुडपूर्णध्यात्वा तदेव वाक्यं समुच्चार्य मधु-
पर्के समर्पयामीति वदन् निवेद्य पतनपात्रे प्रक्षिप्य पूर्ववदुद्धरणी प्रक्षाल्य पूर्ववदेवाचमनं
प्रदाय शाट्या पूर्ववत्संमृज्य स्नानार्थ पादुके समर्पयामीति पुष्पाञ्जलिं भगवते प्रदाय
पूर्ववदेवचार्घ्याद्युपचारान् प्रदाय स्नानशाटी मनसाध्यात्वा तुलसीकाष्ठेन तद्वाक्यो-
च्चारणपूर्वकं दन्तधावनमाचरन्निव विभाव्य स्वहस्तं प्रक्षाल्य शुद्धजलपात्रतोयेन मन्त्रो
च्चारणपूर्वकं गण्डूषं समर्पयामीति तज्जलं षट्कृत्वः पतनपात्रे प्रक्षिप्य पुनरपि तज्ज
लेनमुखशोधनं समर्पयामीति मुखाम्बुजशोधनमाचरन्निव विभाव्य तज्जलं पतनपात्रे
प्रक्षिप्य पूर्ववत्पाद्याचमने प्रदाय ताम्बूलं च प्रदाय अभ्यङ्गोद्वर्तनचूर्णं प्रदाय अभ्य-

श्रीरामार्जनपद्धति ८१५
ङ्गस्नानमाचरन्निव विभाव्यस्नानपात्रं मूर्ध्नि निधाय स्नानीयपात्रजलेन पुरुष-
सूक्तादिकमनुसंदधत् भगवन्तं स्नापयित्वा स्नानशाट्या संमृज्य सिंहासने स्थापयित्वा
तद्वाक्येनैव गन्धपुष्पधूपदीपादिकं समर्पयामीति वदन् गन्धादिकं भगवते समर्पयेत्।
अनन्तर पहले के समान ही आचमनी को शुद्धजल से प्रक्षालन कर स्वच्छ सफेद वस्त्र के
एक भाग से भगवान के हस्तकमल तथा मुखकमल पोछने की भावना करते हुये मुखारविन्द तथा
हस्तकमलो के समक्ष मे समुपस्थापित करे वस्त्र के अन्य भाग से श्रीचरणकमलो की पोछने की
भावना से श्रीचरणकमल के समक्ष समुपस्थापित करे । पुन हाथ मे तुलसी तथा पुष्पो को
लेकर-ॐ श्रीसीतालक्ष्मण सहितायाप्रमेय कृपारत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस मन्त्र को
वोलकर षोडशोपचारान् समर्पयामि ऐसा बोलकर षोडशोपचार की भावना से श्रीचरणकमलों मे
पुष्पाञ्जलि समर्पण कर दे । अनन्तर आचमनी से पूर्णकुम्भ से शुद्ध जल लेकर दूब फल तथा
गुड से पूर्ण है ऐसा ध्यान करके ॐ श्रीसीतालक्ष्मणसहितायाप्रमेयकृपा रत्नाकराय भगवते श्री
रामाय नम इस को बोलकर मधुपर्कं समर्पयामि ऐसा वोलकर पतन पात्र मे गिरा दे, पुन आच-
मनी को प्रक्षालन कर पूर्वके समान ही भगवान को आचमन कराकर पहले के समान ही शुभ्रवस्त्र
से हस्तकमल तथा मुखकमल और चरण कमलो को पोछने की भावन कर वस्त्र को भगवान् के
सम्मुख करे । अनन्तर हाथ मे पुष्प लेकर भगवान के स्नान के लिये पादुका का समर्पण करता
हूँ ऐसी भावना कर भगवान के श्रीचरणो मे पुष्पाञ्जलि समर्पण करे तब पूर्वके समान ही अर्घ्य
पाद्य समर्पण कर आचमन कराके स्नानार्थ शाटिका-पीताम्बर का मन से ही ध्यान कर पूर्व के
समान ही मन्त्र का उच्चारण करके दन्त धावनं समर्पयामि ऐसा बोलकर तुलसी काष्ठ से भगवान को
दन्तधावन करा रहे हो ऐसी भावना करके उस काष्ठ को पतनपात्र मे रखकर अपने हाथ को धोकर
शुद्ध जलमात्र से आचमनी से जल लेकर पूर्व के समान मन्त्र को बोलकर गण्डूषं समर्पयामि
ऐसा बोलकर जल को छ बार पतनपात्र मे गिरा दे । पुन आचमनी से शुद्ध जल लेर पूर्व
के समान ही मन्त्र को बोलकर मुखशोधनं समर्पयामि ऐसा बोलकर शुद्ध जल से मुखारविन्द प्रक्षा-
लन की भावना कर उस जल को पतनपात्र मे गिरा दे । पुन अर्घ्यपाद्य आचमन कराने के
वाद पूर्वके समान ही मन्त्र को पढकर ताम्बूलं समर्पयामि ऐसा बोलकर ताम्बूल समर्पण करने के
वाद अभ्यङ्ग स्नान के लिये तेल तथा उबटन आदि हाथ मे लेकर यह मानसिक भावना करेकि
श्रीभगवान् के दिव्य अङ्गोमे मै सुगन्धित द्रव्यादि लगा रहा हू । इसके बाद अभ्यङ्ग स्नान
सम्पादन करने की भावना से स्नान पात्र को मस्तक मे स्थापित कर उस शुद्ध जल से हरि ॐ
सहस्रशीर्षा पुरुष इत्यादि पुरुष सूक्त के मन्त्रो को पढते हुए भगवान् को स्नान कराकर स्नान
शाटि-शुद्धशुभ्रवस्त्र से अच्छी तरह से पोछकर सिहासन मे विराजमान करा दे । अनन्तर ॐ
श्रीसीता लक्ष्मण सहितायाप्रमेय कृपा रत्नाकराय भगवते श्रीरामचन्द्राय नम इस मन्त्र को बोलकर
गन्धं समर्पयामि इस प्रकार बोलकर गन्ध का समर्पण करे । तथैव पुष्प समर्पयामि बोलते हुए
पुष्प तथा धूप-दीप नैवेद्य-तम्बूल-एला-लवङ्ग-सुगन्धद्रव्य आदि नामो को अलग-अलग बोलकर
यथामिलित सभी द्रव्य भगवान् को सादर समर्पण करे ।
ततः पात्रावशिष्टजलेन श्रीं श्रियै नमः लीं लीलायै नमः भूं भूम्यै नमः इति
मन्त्रोच्चारणेनार्घ्यादिकं प्रदाय ततः ॐ किरीटाय मुकुटाधिपतये नमः अ० । ॐ

८१६ गङ्गा संहिता
दक्षिणकुण्डलाय मकरात्मने नमः अ० । ॐ वामकुण्डलाय मकरात्मने नमः अ० ।
ॐ वैजयन्तीमालायै श्रीतुलस्यै नमः अ० । ॐ श्री वत्साय श्रीनिवासाय नमः अ० ।
ॐ कौस्तुभायरत्नाधिपतये नमः अ० । ॐ काञ्चीगुणोज्ज्वलायदिब्यपीताम्बराय
नमः अ० । ॐ सर्वेभ्योभगवद्दिव्यविभूषणेभ्यो नमः अ० । इति भगवद्भूषणानि
अर्ध्यादिभिरभ्यर्चेत् ।
पूर्वोक्त प्रकार से भगवान की पूजा सम्पादन करने के वाद अर्ध्यादिपात्रो मे वचे हुये
जल से श्री श्रियै नम इस मन्त्र को बोलकर श्रीदेवी की अर्घ्य आदि सभी पदार्थों से पूजा करे।
तथैव लीं लीलायै नम इस मन्त्र को बोलकर लीलादेवी की और भू भू+यै नम इस मन्त्र
को बोल कर भूदेवी की सभी अर्ध्यादि सामग्री से पूजा करे । पुन ॐ किरीटाय मुकुटाधि
पतये नम इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्य पाद्य आचमनीय स्थानीय गन्ध पुष्प आदि से किरीट
मुकुट की पूजा करने के वाद ॐ दक्षिण कुण्डलाय मकरात्मने नम इस मन्त्र को वोलकर पहले
के समानही अर्ध्यादि सामग्री से दक्षिण कुण्डल की पूजा करके ॐ वामकुण्डलाय मक्रात्मने नम
इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के ही तरहसे वाम कुण्डल की पूजा करे । तब ॐ वैजयन्तीमाल्यै
श्रीतुलस्यै नम इस मन्त्र को बोल कर अर्ध्यादि सभी वस्तुओ से वैजयन्ती माला की पूजा करनेके
वाद ॐ श्रीवत्साय श्रीनिवासाय नम इस मन्त्र को वोलकर पूर्व के समान ही सभी अर्ध्यादि से
श्रीरामचन्द्रजी के वक्षस्थल मे स्थित सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के निवास स्थान भूत श्रीवत्स की पूजा
करे । इसके बाद ॐ कौस्तुभाय रत्नाधिपतये नम इस मन्त्र को बोलकर पहले के समान ही
अर्ध्यादि समस्त सामग्री से श्रीरामजी का भूषण कौस्तुभमणि की पूजा सम्पादन करे । अनन्तर
ॐ काञ्चीगुणोज्ज्वलाय दिव्यपीताम्बराय नम इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के ही समान अर्ध्यादि सभी
वस्तुओं से श्रीरामजी के दिव्य परिधान पीताम्बर की पूजा करे । इसके बाद ॐ सर्वेभ्यो भगवद्दि
व्यविभूषणेभ्यो नम इस मन्त्र को बोलकर पूर्व के ही तरह से समस्त अर्ध्यादि द्रव्यों से श्रीराम
चन्द्रजी के समस्त दिव्य आभूषणों की एक ही साथ मे पूजा करे ।
ततोऽर्ध्याद्येकैकपात्रस्थ जलेन क्रमशः ॐ सुदर्शनाय हेतिराजाय नमः अ० ।
ॐ पाञ्चजन्याय शङ्खाधिपतये नमः अ० । ॐ कौमोदक्यै गदाधिपतये नमः अ० ।
ॐ नन्दकाय खङ्गाधिपतये नमः अ० । ॐ शार्ङ्गाय चापाधिपतये नमः अ० ।
इति भगवतो दिव्यायुधानि अर्ध्यादिभिरभ्यर्चेत् ।
पूर्वोक्त क्रम से भगवान् के दिव्य भूषणो के पूजन करने के बाद उन्ही अर्घ्य आदि पात्रों
के जलसे ॐ सुदर्शनाय हेतिराजाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्घ्य पाद्य आदि सभी
सामग्री से भगवान् के दिव्य आयुध सुदर्शन चक्रकी पूजा करे । इसी प्रकार से ॐ पाञ्चजन्याय
शङ्खाधिपतये नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से पाञ्चजन्य शंख की पूजा करे । पुन ॐ
कौमोदक्यै गदाधिपतये नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से गदाकी पूजा करने के बाद ॐ
नन्दकाय खङ्गाधिपतये नम इस मन्त्र को बोलकर खड्ग की अर्ध्यादि से पूजा करे पुन ॐ
शार्ङ्गायचापाधिपतये नम इस मन्त्र को बोलकर भगवान् के दिव्य आयुध धनुषबाण की अर्ध्यादि
से पूजा करे ।

श्रीरामर्चनपद्धति ८१७
ततस्तथैव ॐ अं अनन्ताय नमः अ० । ॐ गं गरुडाय नमः अ० । ॐ विं
विष्वक्सेनाय नमः अ० । ॐ गं गजाननाय नमः अ० । ॐ जं जयत्सेनाय नमः
अ० । ॐ हं हरिवक्राय नमः अ० । ॐ कं कालप्रकृत्यै संज्ञिकायै नमः अ० । ॐ
सर्वेभ्योभगवत्परिजनपरिचरश्रीसुग्रीवाङ्गदविभीषणजाम्बवन्तनलनीलसुषेणगजगवयप्रभृ--
तिभ्यो नमः अ० । इति भगवत्परिजनानर्घ्यादिभिरभ्यर्च्येत ।
भगवान् के दिव्यायुधो के पूजन के बाद पूर्व मे बताये क्रम से ही ॐ अ अनन्ताय
नम इस मन्त्र को बोलकर अनन्त की अर्ध्यादि से पूजा करे । पुन ॐ ग गरुडाय नम इस
मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से गरुडजी की पूजा करे तथा ॐ वि विष्वक्सेनाय नम इस मन्त्र
को बोलकर विष्वक्सेन की पूजा करे। और ॐ गं गजाननाय नम इस मन्त्र को बोलकर गजा
नन की अर्ध्यादि से पूजा करे । तब ॐ ज जयत्सेनाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि
से जयत्सेन की पूजा करे । बाद मे ॐ ह हरिवक्राय नम इस मन्त्र को बोलकर हरिवक्र की
अर्ध्यादि से पूजा करे । अनन्तर मे ॐ क कालप्रकृत्यै सज्ञिकायै नम इस मन्त्र को बोलकर
अर्ध्यादि से कालप्रकृति की पूजा करने के बाद ॐ सर्वेभ्योभगवत्परिजनपरिचरश्रीसुग्रीवाङ्गदविभी-
पणजाम्बवन्तनलनीलसुषेणगजगवयप्रभृतिभ्यो नम इस मन्त्र को बोलकर भगवान् के सभी परिजन
परिचर श्रीसुग्रीव श्रीअङ्गद श्रीविभीषण श्रीजाम्बवन्त श्रीनलनील सुषेण गजगवय आदि को अर्ध्यादि
से पूजा करे ।
ततस्तथैव भगवतः पूर्वे ॐ ऋक्षराजाय नमः अ० । ॐ नीलाय नमः अ० ।
दक्षिणे ॐ सुग्रीवाय नमःअ० । ॐ नलाय नमः अ० । पश्चिमे ॐ शत्रुघ्नाय नमः
अ०। ॐ अंगदाय नमः अ० । उत्तरे ॐ भरताय नमः अ०। ॐ बिभीषणाय नमः अ०।
भगवतोऽग्रे ॐ आञ्जनेयाय महाबलाय हुं हनुमते नमः अ० । ॐ सर्वेभ्योभगवद्
द्वारपालेभ्यो नमः अ० । इति भगवतोद्वारपालानर्घ्यादिभिरभ्यर्चैत् ।
पूर्वोक्त क्रम से परिजनादि कीपूजा के बाद उसी प्रकार से भगवान् के द्वारपालो की पूर्वादि
क्रम से पूजा करे ॐ ऋक्षराजाय नम इस मन्त्र को बोलकर भगवदपेक्षाया पूर्वदिशामे अर्ध्यादि
से श्रीऋक्षराजजी की पूजा कर तथैव ॐ नीलाय नम इस को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीनीलजी
की पूजा करे । पुन ॐ सुग्रीवाय नम इस मन्त्र को बोलकर दक्षिणादिशा मे अर्ध्यादि से श्रीसुग्री-
वजी की पूजा करके ॐ नलाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीनलजी की पूजा करे
फिर ॐ शत्रुघ्नाय नम इस मन्त्र को बोलकर पश्चिमभाग मे अर्ध्यादि से श्रीशत्रुघ्नजी की पूजा
कर ॐ अगदाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीअंगदजी की पूजा करे । पुन
ॐ भरताय नम इस मन्त्र को बोलकर उत्तरदिशा मे श्रीभरतजी की अर्ध्यादि से पूजा कर ॐ
विभीषणाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्रीविभीषणजी की पूजा करे । अनन्तर भग-
वान् के आगे ॐ आञ्जनेयाय महाबलाय हुं हनुमते नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से श्री
हनुमानजी की पूजा के बाद ॐ सर्वेभ्यो भगवद् द्वारपालेभ्यो नम इस मन्त्र को बोलकर भगवान्
के सभी द्वारपालो की अर्ध्यादि से पूजा करे ।
१०३

ततस्तथैव ॐ विघ्नेशाय नमः अ० । ॐ वाण्यै नमः अ० । ॐ दुर्गायै नमः
अ० । ॐ क्षेत्रपालाय नमः अ० । ॐ सूर्याय नमः अ० । ॐ चन्द्राय नमः अ० ।
ॐ नारायणाय नमः अ० । ॐ नारसिंहाय नमः अ० । ॐ वासुदेवाय नमः अ० ।
ॐ वाराहाय नमः अ० । इत्यङ्गदेवान् सम्पूज्य ॐ श्रीसीतायै नमः अ० । ॐ
श्रीलक्ष्मणाय नमः अ० । ॐ श्रीहनुमते नमः अ० । ॐ श्रीभरताय नमः अ० । ॐ
श्रीशत्रुघ्नाय नमः अ० । ॐ श्रीविभीषणाय नमः अ० । ॐ श्रीसुग्रीवाय नमः अ० ।
ॐ श्रीअङ्गदाय नमः अ० । ॐ श्री जाम्बवन्ताय नमः अ० । ॐ श्रीप्रणवाय नमः
अ० । इत्यङ्गमन्त्रान् प्रपूजयेत् ।
पूर्वोक्त क्रम से द्वारपालादिको की पूजा के बाद निम्न प्रकार से भगवान के दश अग
देवताओ को पूजे ॐ विघ्नेशाय नम इस मन्त्र को बोलकर अर्ध्यादि से विघ्नेश की पूजा करे।
ॐ वाण्यै नम इस मन्त्र को बोलकर वाणी की अर्ध्यादि से पूजे । ॐ दुर्गायै नम इस मन्त्र
से दुर्गाजी की अर्ध्यादि से पूजे । ॐ क्षेत्रपालाय नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि द्वारा क्षेत्रपालों
की पूजा करे । ॐ सूर्याय नम इस मन्त्र से सूर्य की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ चन्द्राय
नम इस मन्त्र से चन्द्र की अर्ध्यादि से पूजा करे ॐ नारायणाय नम इस मन्त्र को बोलकर
नारायण को अर्ध्यादि से पूजे ॐ नारसिंहाय नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि द्वारा नारसिंह की पूजा
करे । ॐ वासुदेवाय नम इस मन्त्र से वासुदेव की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ वाराहाय नम
इस मन्त्र से अर्ध्यादि से वाराह की पूजा करे । इस प्रकार अग देवताओ की पूजा करने के
बाद श्रीरामजी के अग मन्त्रो की निम्न रूप से पूजा करे-ॐ श्रीसीतायै नम इस मन्त्र को
बोलकर श्रीसीताजी की अर्ध्यादि सभी सामग्री से पूजा करे । तथैव ॐ लक्ष्मणाय नम इस
मन्त्र से श्रीलक्ष्मणजी की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ श्रीहनुमते नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि
द्वारा श्रीहनुमानजी की पूजा करे । ॐ श्रीभरताय नम इस मन्त्र से श्रीभरतजी की अर्ध्यादि से
पूजा करे । ॐ श्रीशत्रुघ्नाय नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि द्वारा श्रीशत्रुघ्नजी की पूजा करे । ॐ
श्रीविभीषणाय नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि से श्रीविभीषणजी की पूजा करे । ॐ श्रीसुग्रीवाय नम
इस मन्त्रके द्वारा अर्ध्यादि से श्रीसुग्रीवजी की पूजा करे । ॐ अगदाय नम इस मन्त्र से अगद
जी की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ श्रीजाम्बवन्ताय नम इस मन्त्र से श्रीजाम्बवन्तजी की
अर्ध्यादि से पूजा करके ॐ श्रीप्रणवाय नम इस मन्त्र से प्रणव की अर्ध्यादि से अच्छी प्रकार
प्रेम भावना युक्त होकर पूजा करे ।
“अङ्गान् विना रामो विघ्नकरो भवति” ऐसा श्रीरामोपनिषद् मे लिखा है अत सर्वेश्वर श्री
रामजी के पूर्वोक्त विघ्नेश आदि दश अग देवता तथा श्रीसीता आदि दश अग मन्त्रो की पूजा
सावधानी से सभक्तिभाव करना चाहिये । इसी ओर आचार्य श्रीने सकेत-प्रपूजयेत लिखकर किया
है । क्योकि साग पूजा के बिना पूजा सफल नही होती है ।
ॐ सर्वे भ्यो भगवद्गणाधिपेभ्यो नमः अ० । ॐ सर्वे भ्योभगवत्पार्षदेभ्यो
नमः अ० । ॐ सर्वे भ्यो भगवत्परिजनपरिचरेभ्यो नमः अ० । ॐ नीत्यै नमः अ० ।

[Header] श्रीराममार्चनपद्धति ८१९
ॐ मुक्त्यै नमःअ० । ॐ साङ्गसायुधसपरिवारसमहिषीकायदिव्यमङ्गलमूर्त्तये नमःअ० ।
पूर्व वर्णित क्रमसे सर्वेश्वर श्रीरामजी के अंगो की पूजा करने के बाद पूर्वोदित क्रम से ही
ॐ सर्वेभ्यो भगवद्गणाधिपेभ्यो नम इसे बोलकर भगवान् के सभी गणाधिपो की अर्ध्यादि से
पूजाकर के ॐ सर्वेभ्यो भगवत्परिजनेभ्यो नम इस मन्त्र से भगवान् के सभी परिजनो कीअर्घ्यादि
से पूजा करे । तब ॐ नीत्यै नम इस मन्त्र से नीति की अर्ध्यादि से पूजा करे । ॐ मुक्त्यै
नम इस मन्त्र से अर्ध्यादि से मुक्ति की पूजा करे । अनन्तर ॐ साङ्गायसायुधसपरिवारस-
महिषीकाय दिव्य मङ्गलमूर्तये नम इस मन्त्र से भगवान् के अगो आयुधो परिवारो परिकरो
आदि तथा सर्वेश्वरी श्रीमतीजी के साथ दिव्य मगल विग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की अर्ध्यादि
उपचारो से पूजाकरे।
अथत्थं पूर्वोक्तैः सहभगवन्तं श्रीराममभ्यर्च्य अञ्जलिनापुष्पाण्यादाय-
अनन्तर पूर्वोक्त विधिसे सर्वेश श्रीरामचन्द्रजी की अंग आयुध परिवार परिकर तथा श्रीसीताजी
के साथ पूजा करने के बाद अञ्जलि मे पुष्पो को लेकर निम्नश्लोको से प्रार्थना कर श्रीचर-
णारविन्दो मे पुष्पाञ्जलि समर्पण करे-
सुरासुरेन्द्रादिमनोमधुव्रतेर्निषेव्यमाणाङ्घ्रिसगेरुह प्रभो ।
असंख्यकल्याणगुणामृतोदधे? सुरेश? रामाद्भुतवीर्यमापते ॥१।
समस्त सुरासुर देवदानव इन्द्रप्रमुखो के मनरूपी भ्रमरो से सर्वदा स सेव्यमान चारणरूपी
कमलवाले सर्वसमर्थ हे प्रभु श्रीरामजी ? हे देवेश ? अत्यन्त अद्भुत लोकोत्तर चमत्कारकारी पराक्रम
शाली सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी ? असख्य अनन्त कल्याग गुणरूपी अमृत के महासमुद्ररूप हे श्री
रामजी ? आपके श्रीचरणो मे अनेक वार सादर दण्डवत प्रणाम हे ॥१॥
अपारसंसारमहार्णवप्लवं पदाम्बुजं तं प्रणतार्तिनाशनम् ।
निषेव्यमाण सगणेःशिवादिभिर्गतोऽस्म्यहं ते शरणंशरण्यम् ।२।
हे प्रणतार्तिनाशक श्रीरामजी ? अपार ससाररूपी महासमुद्र को पार करने के लिये सुदृढ
नौका रूप आपके शरण मे आकर प्रणाम-नमस्कार करनेवाले जनो के सर्व दुखो को सर्वदा के
लिये नाश करने वाले तथा अपने समस्त गण परिजन और परि करो के साथ श्रीशिवजी श्री
विष्णुजी और श्रीब्रह्माजी के द्वारासर्वदा ससेव्यमान यानी निरन्तर सेवित शरण्य अर्थात् सबो के
लिये शरण मे आने योग्य या शरण म आये जीवो को सर्वदा के लिये अभय करदेनेवाले उन
प्रसिद्ध तीनो लोको को पवित्रकरने वाले सर्वसमर्थ आपके श्रीचरणरूपी कमलो के शरण मे आया
हूँ प्रभो? ससार भय से अब मेरी रक्षा करे ॥२॥
विकचपद्मदलायतलोचना प्रणतकामदुघाङ्घ्रिसरोरुहाम् ।
अशरणः शरणां जनकात्मजे प्रतिदिनं भवतीमनुचिन्तये ॥३।
अच्छी तरह से विकशित-खीले हुये कमल पत्र के समान विशाल तथा अति मनोहर नेत्र-
वाली तथा आपके शरण मे आकर प्रणाम करनेवाले जनो के सब कामनाओ को पूर्ण करनेवाले
चरणरूपी कमल वाली और अशरण यानी अन्य रक्षक या आधार से रहीत जीवो को सर्वदा शरण

८२० गङ्गा संहिता
प्रदान करनेवाली हे जनकनन्दिनी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी ? सबो को अभय प्रदान करनेवाली आपको
मै प्रतिदिन सादर चिन्तन यानी स्मरण के साथ नमन करता हूँ॥३॥
श्रीरामकैङ्कर्यपरायणम्मुहुर्मुहुश्च सीतेशनिदेशकारिणम् ।
तमेकवीरंशरदिन्दुकीर्तिं नमाम्यहं लक्ष्मणमप्रमेयम् ॥४॥
सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के कैंकर्य-सेवा मे सर्वदा तत्पर तथा बारबार किसी भी प्रकार के
सर्वेश्वरी श्रीसीताजी के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के आज्ञाओ को परिपालन करनेवाले शरदकालिन
चन्द्रमा के समान स्वच्छ कीर्तिवाले अनन्यवीर-अतिपराक्रमी शूर वीर बल तथा शौर्यादि मे अन्य
उपमा रहीत उन प्रसिद्ध वीर श्रीलक्ष्मणजी को मै नमस्कार करता हू ॥४॥
मणीन्दुगर्भं मुकुटाधिनाथं श्रीमत्किरीटं मणिकुण्डले च ।
श्रीकौस्तुभादीनिचदिव्यभूषणान्येतानिनित्यंप्रणमामिविष्णोः ।५।
मणि रूपी चन्द्रमा है गर्भ-वीच भाग मे जिसके ऐसे मुकुटो मे श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के
मुकुट संपूर्ण शोभा से युक्त श्री रामजी का किरीट तथा मणियो से शोभित दिव्य कुण्डल और
दिव्य श्रीकौस्तुभमणि आदि समस्त दिव्य आभूषणो को सर्वदा प्रणाम करता हूँ॥५॥
महाबलं वायुसुतं महामति प्रपन्नचामीकरचारुलोचनम् ।
श्रीरामपादाम्बुजनिविष्टमानसं द्विद्वन्तकं श्रीहनुमन्तमीडे ॥६॥
सन्तप्त अति तपाये हुये सोने के समान अति सुन्दर नेत्र वाले अति बलशाली और महा-
बुद्धिशाली तथा श्रीरामचन्द्रजी के चरणरूपी कमलो मे सर्वदा सन्निवेषित मनवाले और उपासक के
शत्रुओ का नाश करनेवाले वायुदेव के पुत्र सर्वैश्वर्य सम्पन्न श्री हनुमानजी की प्रार्थना यानी स्तुति
करता हू ॥६॥
प्रत्यूहव्यूहभङ्गं विदधदुरुबलश्शक्तिमान् सर्वकारी
भूरिश्रेयः प्रतापोमुनिवरनिकरैः स्तूयमानो विमानः ।
रक्षो दैत्यादिनाशी क्षुभितजलनिधिलोकजिल्लोकमान्यो
धन्योनोमङ्गलौघंसपदिसुकुरुताद्रामशस्त्रास्त्रसङ्घः ॥७॥
अति वेगवाला तथा महा सामर्थ्य से युक्त अघटित घटना आदि सब कुछ करने मे सर्वदा
समर्थ और अत्यन्त श्रेष्ठ तथा प्रतापी तथैव सर्वदा अभिमान से रहित और राक्षस तथा दैत्यादि
समूहो का नाश करनेवालो सर्वदा मननशील मुनिओ से अहर्निश संस्तुत, तथा अति अगाध समुद्र
को अपने अलौकिक तेजसे क्षुभित करनेवाला और सर्वलोको को जितने वाला एवं सर्वलोक
समान्य तथा अतिधन्य यानी सर्वविजयादि ऐश्वर्य सम्पन्न सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी का अस्त्र तथा
शस्त्र (जिसको मन्त्र के बिना चलाया जाता है उसे शस्त्र कहा जाता है, जैसे बाण खड्ग आदि ।
मन्त्र प्रयोग पूर्वक जिसका प्रयोग किया जाता है उसे अस्त्र कहते है, जैसे ब्रह्मास्त्र आग्नेयास्त्र
आदि) समूह है वह अति शीघ्र ही मेरे विघ्न समूहों का विनाश करता हुआ समस्त मंगल
सप्रदान करे ॥७॥

द्वितीय खण्ड: तारक-मन्त्र जप, आरती एवं रामार्चन पद्धति उपसंहार

उरः (chest)
2. शिरः (head)
3. दृष्टिः (eyes)
4. मनः (mind)
5. वचः (speech)
6, 7, 8:
Wait, how many in "उरः शिरो दृष्टि मनो वचः"? That's 5!
Then we need 3 more to make 8!
What are the other 3?
Feet, hands, knees! (पद्, कर, जानु)
So:
पद्द्वय (two feet) - that's 1 kind (feet)
कर... (hands)
जानु (knees)
5 + 3 = 8 limbs (अष्टाङ्ग)!
Now look at the words for feet, hands, knees:
"पद्द्वय" (feet)
"करा..." ?
Wait, could it be:
"पद्द्वयकरात्..."? No!
Wait, hands are two, knees are two: "करयुग्म"? "जानुयुग्म"?
Look at the characters again:
पद् (pad)
द्व (dva)
य (ya)
करा (karā)
त् (t) ? No, look at that letter: it's 'त' or 'न' or 'ल'?
Wait, look at:
पद्द्वयकरात्कयुग्मजानुभिः - wait!
Let's look at the arches:
Wait, those ARE NOT PA

८२२ गङ्गा संहिता
पूर्वोक्तक्रम से भगवान् की प्रार्थना करने के बाद प्रणाम करने का प्रकार-नियम बतलाने के
लिये आचार्य श्री कहते है सर्वेश्वर परमकारण रूपसे स्थित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम करने के लिये
निश्चित बुद्धिवोले महापुरुप मन, वचन दोनो पैर दोनो जानु घुटना छाती शिर मस्तक नेत्रयुग
तथा फैलाया हुआ दोनो बाह हाथ इन आठो प्रकार के अगो से पृथिवी मे दण्ड की तरह लेट
कर गिरकर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी को सभी भक्त लोग सादर प्रणाम करे । इस प्रकार साष्टाग
दण्डवत प्रणाम करे । अनन्तर राजभोगादि के लिये निम्न प्रकार से व्यवस्था करे ।
अथ महानैवेद्यसमये पात्राणि प्रक्षाल्य पूर्ववत्पूर्णकुम्भ जलेन पात्राणि पूरयित्वा
भोज्याशनार्थं पादुके प्रसार्यार्घ्यादिभिरभ्यर्च्य मधुपर्कं च प्रदाय भगवतः श्रीराम-
चन्द्रस्य पुरस्ताच्छुचिप्रदेशे यथाशवितसम्पादितचतुर्विधभोज्यादीन्युपहृत्य-
पूर्वोक्त विधान से पूजा प्रणामादि के अनन्तर राजभोग के समय मे पूजा पात्रो को प्रक्षालन
कर पूर्व के समान ही पूर्णकुम्भ के जल से पात्रो को भरकर भोजन करने जाने के लिये
पादुका को आगे करके पूर्व प्रदर्शित विधान से पाद्य अर्घ्य आचमनीय आदि से पूजाकर मधुपर्क
समर्पण करे । अनन्तर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के समक्ष अति पवित्र किये गये स्थान मे यथा
विधियथा शक्ति सम्पादित चतुर्विध चार प्रकार के लेह्य पेय चर्व्यचोस्य भोज्य विशुद्ध सामग्री को
अति आदर के साथ रखकर निम्न प्रकार से प्रार्थना करे-
दोषाकर नीचमथाल्पशक्ति चैतन्यहीनं त्वशुचि त्वनर्हम्
त्वद्भृत्यकर्मण्यपराधभाजनम्पर दुरात्मानमितीत्थमेव ॥१।
सुचिन्तयन्मामपि मत्समर्पितमशेषपापापहनामधेय ?।
उपेक्षितुं त्वच्चरणावलम्बिनं न चार्हसि त्व जगदीशराघव ?।
शरणागत जीवों के सम्पूर्ण पापों के नाश करने मे प्रसिद्ध 'पतींतपावन सीताराम' ऐसे नाम
से जगद्विख्यात श्रीरामजी! आदर के साथ पवित्रतया मेरे द्वारा समर्पित नैवेद्य को आप स्वीकार
करे तथा अनन्त दोषो का भण्डार नीचवृत्तिवाला और अति अल्पशक्तिवाला और तथ्यातथ्य
विवेकसे रहित अपवित्र तथा आपके कैङ्कर्य मे अयोग्य सब जन कल्याणकारि आपके उद्देश्य
कर्म न करने से अपराध के पात्र बने अत्यन्त दुरात्मता से युक्त ऐसे ही अन्य अनन्त अव गुणों
से लिप्त यह है ऐसा विचार कर हे जगदीश्वर सर्वेश्वर श्रीराघवजी ? आप आपके दिव्यचरणों
के अवलम्बन किये मेरी भी उपेक्षा न करे ॥१।२॥
कौशल्याजनकात्मजावरगुणश्रीलक्ष्मणैरर्पितं
पंपायां शबरीसर्पितमहो दिव्याद्भुतस्वादकम् ।
भारद्वाजसमर्पितं च सरसं क्षीरं व्रजे यत्स्वयं
तयद्वैङ्‌गवमर्जितं सहघृतं यद्यज्ञपत्न्यर्पितम् ॥३॥
अन्यैर्भुक्तजनैः कुचैलविदुराद्यैरर्पितं त्वत्प्रियं
पथ्यं पाकविशेषसंयुतमथो दृष्टिप्रीयं राघव ! ।