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रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

इति मन्त्रराजन्यासमनुष्ठाय पूर्वस्थापितस्ववामपार्श्वस्थपूर्णकुम्भे श्रीराममन्त्रो-
च्चारणपूर्वकं तुलसीदलं निक्षिप्य श्रीमन्त्रराजेनैवाभिमन्त्र्य तज्जलेनार्घ्यादिपञ्चपा-
त्राणि क्रमेण षडक्षरमन्त्रोच्चारणपूर्वकं प्रपूर्य उद्धरण्यार्घ्यादिपञ्चपात्रेभ्यः किञ्चित्कि-
ञ्चित्तोयं समुद्धृत्यपूर्णकुम्भे निक्षिपेत् । तत उद्धरण्यार्घ्यसलिलमादायनासाग्रपर्यन्तमु-
त्धृत्य ॐ विरजे आगच्छागच्छेति सप्तकृत्वा उक्त्वा तत्तोयेनात्मानं पूजोपकरणानि
यागभूमि च प्रोक्ष्यावशिष्टमन्यत्र प्रक्षिपेत् ।
पूर्वोक्त रीतिसे श्रीमन्त्रराज का न्यास करने के बाद अपने वाम भाग मे पहले रखे पूर्ण
कुम्भ मे श्रीराममहामन्त्र का उच्चारण करते हुये तुलसी दल को डाले । पुन श्रीराममन्त्र से ही
अभिमन्त्रित करके उसी जलसे अयोदि पञ्चपात्रो को अर्घ्यपात्र के क्रम से षडक्षर श्रीमन्त्रराज के
उच्चारण पूर्वक भरकर पुन दक्षिणावर्त शंख या आचमनी से पाचो पात्रो से थोडा थोडा जल
निकालकर पूर्ण कुम्भ मे डाल दे । इसके बाद दक्षिणावर्त शंख या आचमनी से अर्घ्य पात्र से
जल लेकर अपने नाक के आगे तक ऊपर उठाकर ॐ विरजे आगच्छ आगच्छ इस आवा
हन वाक्य को सातवार बोलकर उस जल से अपना देह सब पूजा की सामग्री यागभूमि-मन्दिर
को भी प्रक्षालन सिंचन करके अवशिष्ट जल को अन्यत्र डाल दे ।
ततस्तुलसीदल समादाय हरिः ॐ
साकेतं दिव्यलोकं सुरतरुमतुलं तत्र रत्नालिगर्भं
हैमं सिंहासनं तच्छुभरुचिनिचयं भानुकोटिप्रकाशम् ।
पद्मं चानेकपत्रं कपिनिकरपति पादुके वातजातं
सुग्रीवान् द्वारपालान् नलगवयमुखान् रामभक्तानग्रपद्ये ।
वामं पादं प्रसार्याश्रितकलुषहरं दक्षिणं कुञ्चयित्वा
जानुन्याधाय दिव्येरिपुकुलदमने बाणचापे दधत्सः ।
रामः पाणिद्वयेन प्रतिभटभयदः पद्मगर्भारुणाक्षो
देवीभूषादिजुष्टो वितरतु जगतां शर्म साकेतनाथः ।२।
इति पद्यैरित्थमनुसन्धाय श्रीसीतालक्ष्मणसमेतभगवच्छ्रीरामचन्द्रचरणारविन्दे
तत्प्रक्षिपेत् ।
अनन्तर तुलसीदल को हाथ मे लेकर हरि ॐ इस प्रकार उच्चारण कर दिव्य लोक श्रीसाकेत
मे स्थिर वर्णनातीत कल्पवृक्ष के नीचे रत्न समूह से खचित दिव्य सुवर्ण सिहासन जो कि करोडों
सूर्य के प्रकास से भी अधिक प्रकाश वाला तथा कल्याण प्रद और जनमन मोहक है उसके मध्य
मे अनेक पत्रवालेदिव्य कमलासन मे विराजमान सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी है जिनके चारो तरफ कपि
सेनापतियो का समूह स्थित है, तथा श्रीरामजी के चरणारविन्द की सेवा करते हुए श्रीहनुमानजी
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