रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
पृष्ठ 5, कुल 26 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामार्चनपद्धति ८०७
पूजनकरके श्रीआचार्य देव के द्वारा ही मानसिक भावना से पूजन वस्तुओ को आराध्य देव को
समर्पण करे । तात्पर्य यह कि भगवान् ? मै तो अल्पज्ञ हू अत आपकी आराधना मे पूर्णतया
असमर्थ हूं अत हमारे श्रीआचार्य देवके द्वारा ही आप मेरी आराधना को स्वीकार करे । इस
प्रकार प्रार्थना करके तीन बार प्राणायाम करके आराध्यदेव को शयन से उठाने के लिये इन
निम्नलिखित श्लोको द्वारा अतिविनम्र भाव से प्रार्थना करे ।
कौशल्यासुप्रजाराम ? पूर्वासन्ध्या प्रवर्तते । उत्तिष्ठनरशार्दूल कर्त्तव्यं दैवमाह्निकम् ।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठभद्रंते त्यजनिद्रा जगत्पते ? । त्वदीयोत्थानमात्रेण उत्थितं भुवनत्रयम् ।२।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठश्रीराम? भद्रं ते करुणानिधे ?। उत्तिष्ठ जानकीकान्त ? त्रैलोक्य मङ्गलं कुरु
अप्रमेयकृपासिन्धुस्वरूपे ? रामसुप्रिये ?। सुप्रभातानिशा सीते? श्रीरामाभिमुखीभव।४।
लक्ष्मणोत्तिष्ठ भद्रन्ते रामकैङ्कर्य्यतत्पर ?। सौमित्रे ? वीररामस्यप्राणप्रियतरप्रभो ?।५।
श्रीभगवद्रामचन्द्राभिमतानुरूपगुणविभवैश्वर्यशीलाद्यनवधिकातिसयासंख्येयकल्या-
णगुणगणा पद्मवनालयां पद्माननां पद्मदलायताक्षी नित्यानपायिनी भगवती निरवद्यां
श्रीसीतां श्रीरामदिव्यमहिषीमखिलजगन्मातरमशरणशरण्यामनन्यशरणः शरणमहं प्रपद्ये।
स्वशेषभूतेन मया स्वीयैः सर्वपरिच्छदैः ।
विधातुं प्रीतमात्मानं देवः प्रक्रमते स्वयम् ॥
इति श्लोकञ्चानुसन्धाय पश्चोपनिषन्न्यासं कुर्यात् ।
अनन्य पतिव्रता श्रीकौशल्यादेवी के सुपुत्र सर्वेश्वर हे रामजी प्रात कालिन सन्ध्या का समय
हो रहा है अत हे नरशार्दूल श्रीरामजी आप शैया से उठे कारण यह कि प्रात काल हो रहा है
अत देवाराधनादि दैनिक क्रियाओ को सम्पादन करना चाहिये। उन दैनिक क्रियाओ को सम्पाद
नार्थ आपका शरणापन्न यह सेवक उपस्थित है अत सर्वेश्वर श्रीरामजी ? आप जागें ।१। हे जगत्
पति श्रीरामजी ? आप निद्रा को त्याग कर जग जाय सुकोमल शैया को त्याकर उठ जाय हे
जगन्नियन्ता ? आप का कल्याण हो । प्रभो ? आपके उत्थान-यानी उठ जाने से तीन लोक उठ
जायगा अर्थात् तीनो लोकके जीव जगकर अपनी अपनी नित्यनैमित्तिक प्रवृत्तियो मे लगाजयेगे
अत लोगो की सत्प्रवृत्ति के लिये आप जागे ।।२।। हे श्रीरामजी ? आप उठ जाय हे करुणा
के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी आप जग जाय प्रभो ? आपका कल्याण हो। हे जानकीकान्त श्रीरामजी ?
आप उठ जाय । उठ कर तीनो लोको को कल्याण करे ।।३।। अमित कृपा के सिन्धु स्वरूपा
हे श्रीजानकीजी? हे श्रीराम प्रिया श्रीसीता जी ? प्रात काल हो गया है। अत सर्वेश्वरी हे श्रीसीता
जी ? उठकर नित्यकर्मो से निवृत्त होकर सर्वेश श्रीरामजी के अभिमुख सम्मुख हो जाय तथा श्रीराम
चन्द्रजी की आज्ञा के अनुसार सब कृत्य सम्पादन करावे ।।४।। हे श्रीलक्ष्मणजी ? आप उठ
जाय सर्वेश्वर श्रीरामजी के कैकर्य मे सर्वदा तत्पर रहनेवाले श्रीलक्ष्मणजी ? आपका कल्याण हो।
वीर व्रती श्रीरामजी के प्राण से भी प्रिय प्रभो ? श्रीलक्ष्मण ? हे सुमित्रानन्दन ? आप जागे तथा
श्रीरामजी के कैंकर्य मे सन्नद्ध हो जाय ।।५।। अनन्त ऐश्वर्य शाली सर्वेश्वर श्रीरोमजी के अनुरूप
गुण विभव ऐश्वर्य आदि अनवधिकातिशय अर्थात् सर्वोत्कृष्ट परमावधि से रहित उत्कृष्टवाली यानी