रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
पृष्ठ 6, कुल 26 में से
संदर्भ में पढ़ें८०८ गङ्गा संहिता
सर्वोत्तम ऐश्वर्यवाली तथा असङ्ख्येय यानी अनन्त कल्याण गुण समुदायों से सम्पन्न तथा दिव्य
कमलबनो मे आवासशील दिव्य कमल के समान मुखकमलवाली और दिव्य कमलदल पत्रके समान
अति सुन्दर सर्वजन मोहक आङ्गवाली तथा नित्य अनपायिनी अर्थात् अनश्वर सर्वदा सर्वकाल देश
आदि मे एकरूपसे स्थिर रहनेवाली भगवती यानी उत्पत्ति प्रलय अगति गति विद्या अविद्या प्रभृति
छ प्रकार के ऐश्वर्य से सम्पृक्त तथा निश्चय यानी कर्म से होनेवाले सङ्कोच विकास आदि सर्व
दोषो से सर्वदा रहित रहनेवाली सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी से सर्वदा अभिन्न रहने वाली श्रीरामजी
की दिव्य पत्नी सर्वेश्वरी श्रीसीताजी जो सम्पूर्ण जगत् की माता शरण रहित सब जीवो को अपने
शरण मे रख कर सर्वदा के लिये अभय करने वाली सर्वेश्वरी श्रीसीताजी है उनके शरण मे अन्य
शरण रहित मै जाता हूं अर्थात् अन्यशरण रहित शरणागत सब जीवो को संसार भय से मुक्त कर
देनेवाली सर्वेश्वरी श्रीमतीजी के शरण मे मै जाता हूँ । सर्वेश्वर श्रीराम जी की आराधना करने
मे मेरे जैसे अल्पज्ञ जीव की गति ही क्या अत परम कारुणिक सर्वशरण्य श्रीरामचन्द्रजी अपने
शेष स्वरूप मेरे तथा श्रीरामजी के नित्य परिचारक नित्यमुक्त सेवको के द्वारा अपना अभीप्सित
सम्पादन करने के लिये या मेरे जैसे संसार चक्र मे पतित जीव का उद्धार करने के लिये स्वय
ही शुभ कार्यारम्भ कर रहे हे । इस प्रकार ऐकान्तिक रूप से अनुसन्धान-ध्यान करके पञ्चोप-
निषद् वाक्योका न्यास करे । वे इस प्रकार से है-
ॐ पां नमः परायपरमेष्ठ्यात्मने नमः इति शिरसि ।१।
ॐ यां नमः पराय पुरुषात्मने नमः इति नासाग्रे ।२।
ॐ रां नमः पराय विश्वात्मने नमः इति हृदये ।३।
ॐ वां नमः पराय निवृत्त्यात्मने नमः इति गुह्ये ।४।
ॐ लां नमः पराय सर्वात्मने नमः इति पादयोः ।५।
ॐ पा नम पराय परमेष्ठ्यात्मने नम इस मन्त्र को बोल कर शिर का स्पर्श करना । ॐ
या नम पराय पुरुषात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर नाक के अग्रभाग का स्पर्श करना । ॐ
रा नम पराय विश्वात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर हृदय का स्पर्श करना । ॐ वा नम पराय
निवृत्त्यात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर गुह्य-गुप्तांग का स्पर्श कर हाथ धोवे । ॐ ला नम
पराय सर्वात्मने नम इस मन्त्र को बोलकर दोनो पैरो का स्पर्श करना ।
पञ्चोपनिषद् न्यासं विधाय श्रीमन्त्रराजन्यासं कुर्यात् ॐ रां ज्ञानाय हृदयाय
नमः । ॐ नमः ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा । ॐ रामाय शक्त्यै नमः शिखायै वषट् ।
ॐ बलाय कवचाय हुम् । ॐ तेजसे नेत्राभ्यां वौषट् । ॐ रामाय वीर्याय-अस्त्रायफट्।
पूर्वमे बताये अनुसार पञ्चोपनिषद् वाक्यो का न्यास करने के बाद नीचे बताये अनुसार से
श्रीमन्त्रराज का न्यास करे- ॐ रा ज्ञानाय हृदयाय नम ऐसा बोलकर हृदय प्रदेश का स्पर्श करे
ॐ नम ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा ऐसा बोलकर शिरका स्पर्श करे । ॐ रामाय शक्त्यै नम शिखा
यैवषट् ऐसा बोलकर शिखा का स्पर्श करे । ॐ बलाय कवचाय हूँ ऐसा बोलकर दोनों हाथो के
मूल भाग का परस्पर मे स्पर्श करे । ॐ तेजसे नेत्राभ्या वौषट् ऐसा बोलकर दोनो नेत्रो का
स्पर्श करे । ॐ रामाय वीर्याय अस्त्राय फट् ऐसा बोलकर दक्षिण हाथ को शिर पर घूमाकर ताली
बजावे ।