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सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

८२२ गङ्गा संहिता
पूर्वोक्तक्रम से भगवान् की प्रार्थना करने के बाद प्रणाम करने का प्रकार-नियम बतलाने के
लिये आचार्य श्री कहते है सर्वेश्वर परमकारण रूपसे स्थित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम करने के लिये
निश्चित बुद्धिवोले महापुरुप मन, वचन दोनो पैर दोनो जानु घुटना छाती शिर मस्तक नेत्रयुग
तथा फैलाया हुआ दोनो बाह हाथ इन आठो प्रकार के अगो से पृथिवी मे दण्ड की तरह लेट
कर गिरकर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी को सभी भक्त लोग सादर प्रणाम करे । इस प्रकार साष्टाग
दण्डवत प्रणाम करे । अनन्तर राजभोगादि के लिये निम्न प्रकार से व्यवस्था करे ।
अथ महानैवेद्यसमये पात्राणि प्रक्षाल्य पूर्ववत्पूर्णकुम्भ जलेन पात्राणि पूरयित्वा
भोज्याशनार्थं पादुके प्रसार्यार्घ्यादिभिरभ्यर्च्य मधुपर्कं च प्रदाय भगवतः श्रीराम-
चन्द्रस्य पुरस्ताच्छुचिप्रदेशे यथाशवितसम्पादितचतुर्विधभोज्यादीन्युपहृत्य-
पूर्वोक्त विधान से पूजा प्रणामादि के अनन्तर राजभोग के समय मे पूजा पात्रो को प्रक्षालन
कर पूर्व के समान ही पूर्णकुम्भ के जल से पात्रो को भरकर भोजन करने जाने के लिये
पादुका को आगे करके पूर्व प्रदर्शित विधान से पाद्य अर्घ्य आचमनीय आदि से पूजाकर मधुपर्क
समर्पण करे । अनन्तर सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी के समक्ष अति पवित्र किये गये स्थान मे यथा
विधियथा शक्ति सम्पादित चतुर्विध चार प्रकार के लेह्य पेय चर्व्यचोस्य भोज्य विशुद्ध सामग्री को
अति आदर के साथ रखकर निम्न प्रकार से प्रार्थना करे-
दोषाकर नीचमथाल्पशक्ति चैतन्यहीनं त्वशुचि त्वनर्हम्
त्वद्भृत्यकर्मण्यपराधभाजनम्पर दुरात्मानमितीत्थमेव ॥१।
सुचिन्तयन्मामपि मत्समर्पितमशेषपापापहनामधेय ?।
उपेक्षितुं त्वच्चरणावलम्बिनं न चार्हसि त्व जगदीशराघव ?।
शरणागत जीवों के सम्पूर्ण पापों के नाश करने मे प्रसिद्ध 'पतींतपावन सीताराम' ऐसे नाम
से जगद्विख्यात श्रीरामजी! आदर के साथ पवित्रतया मेरे द्वारा समर्पित नैवेद्य को आप स्वीकार
करे तथा अनन्त दोषो का भण्डार नीचवृत्तिवाला और अति अल्पशक्तिवाला और तथ्यातथ्य
विवेकसे रहित अपवित्र तथा आपके कैङ्कर्य मे अयोग्य सब जन कल्याणकारि आपके उद्देश्य
कर्म न करने से अपराध के पात्र बने अत्यन्त दुरात्मता से युक्त ऐसे ही अन्य अनन्त अव गुणों
से लिप्त यह है ऐसा विचार कर हे जगदीश्वर सर्वेश्वर श्रीराघवजी ? आप आपके दिव्यचरणों
के अवलम्बन किये मेरी भी उपेक्षा न करे ॥१।२॥
कौशल्याजनकात्मजावरगुणश्रीलक्ष्मणैरर्पितं
पंपायां शबरीसर्पितमहो दिव्याद्भुतस्वादकम् ।
भारद्वाजसमर्पितं च सरसं क्षीरं व्रजे यत्स्वयं
तयद्वैङ्‌गवमर्जितं सहघृतं यद्यज्ञपत्न्यर्पितम् ॥३॥
अन्यैर्भुक्तजनैः कुचैलविदुराद्यैरर्पितं त्वत्प्रियं
पथ्यं पाकविशेषसंयुतमथो दृष्टिप्रीयं राघव ! ।