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सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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श्रीरामर्चनपद्धति ८०५
सीताकान्तसमारम्भां रामानन्दार्य मध्यमाम्।
अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ॥
इस श्लोक के स्मरणपूर्वक रहस्यत्रय-मन्त्रराज पढ़कर चरम मन्त्र तथा शरणागति मन्त्रों का
सार्थ स्मरण कर अनन्तर भगवान् की आज्ञा से सर्वेश्वर श्रीरामभद्रजी का कैङ्कर्य बुद्ध्या सन्ध्या
वन्दनादि नित्य कर्मों को शास्त्रीय विधान के अनुसार सम्पादन करे।
ततो दिव्यमङ्गलविग्रहस्यसाङ्गसायुधसपरिवारस्य श्रीसीतालक्ष्मणसमेतस्य भगवतो
रामभद्रस्य मनसैव एकैकमङ्गं ब्रह्मसृष्टिलोकोत्तरसौन्दर्यलावण्याढ्यं ध्यायन् दिव्यैः
षोडशोपचारैरर्चनं विदध्यात्।
इसके बाद प्रत्येक अंग प्रत्येक आयुध-शस्त्रादि परिवार सर्वेश्वरी श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजी
से संपृक्त दिव्य मगल श्रीविग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी क सर्वलोकोत्तर सौन्दर्यलावण्य से युक्त
पृथक् पृथक् अंग का मन से ही सम्यक् ध्यान करते हुये दिव्य षोडशोपचार से मानसिक अर्चना करे।
माध्याह्निकानुष्ठानसमयेऽपि भगवच्चरणारविन्दं स्वाचार्यचरणारविन्दं च ध्यायन्
स्नात्वा भगवद्विभूतिर्भगवच्छरीरभूतान् देवर्षिपितॄन् ध्यात्वा संतर्प्य च धौतवस्त्रादिकं
परिधायाचम्य पूर्ववद्देवोर्ध्वपुण्ड्रादिकं विधायैवमेवभगवदाराधनत्वेनैव माध्याह्निकानु-
ष्ठानमपि कुर्यात् ।
भगवान के मध्याह्निक आराधन के समय से भी सर्वेश्वर श्रीरामभद्रजी के श्रीचरण कमल
तथा स्वाचार्य देव के चरणकमलों का ध्यान करते हुए स्नान क्रिया सम्पादन करके सर्वाधार श्रीराम
जी की विभूति तथा शरीर भूत देवताओं और पितरों का ध्यान पूर्वक तर्पण करे। बाद में स्वच्छ
वस्त्र धारण कर आचमन कर के पहले बताए गए विधिके अनुसार ही ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे।
इसी प्रकार से सर्वदा सर्वेश्वर श्रीरामजी की आराधना बुद्ध्या मध्याह्निक क्रिया का सम्पादन करे !
अथैवमर्चनयोग्यो मुमुक्षुरुपासको भगवन्मन्दिर प्रविश्य
श्रीरामंजनकात्मजामनिलजं वेधोवसिष्ठावृषी
योगीशञ्चपराशर श्रुतिविदं व्यासंजिताक्षं शुकम् ।
श्रीमन्तं पुरुषोत्तमं गुणनिधि गङ्गाधराद्यान् यतीन्
श्रीमद्राघवदेशिकञ्च वरदं स्वाचार्यवर्यं श्रये ॥
इत्यादि श्रीगुरुपरम्परादिकमनुसन्दधत्साष्टाङ्गत्वेन दण्डवद्भगवन्तं प्रणम्य,
अर्चनपात्रादीनि संमृज्य शुद्धजलेन संप्रक्षाल्य समर्चनीयदेवस्य दक्षिणपार्श्वे समुपविश्य
पूर्वदिनसमर्पितगन्धमाल्यतुलसीदलादिकमपनीयपीठोपरिसन्निवेश्य आग्नेयादारभ्य
प्रदक्षिणक्रमेण, अर्घ्यपाद्याचमनस्नानपात्राणि संस्थाप्य तेषां मध्ये शुद्धजलपात्रं निधाय ।
पूर्व में प्रदर्शित क्रिया के द्वारा सर्वेश श्रीरामजी की अर्चना के योग्य हुए सायुज्य मोक्ष की
इच्छावाले उपासक को भगवान् के मन्दिर मे प्रवेश कर श्रीरामजी श्रीजानकीजी श्रीहनुमानजी श्रीब्रह्माजी