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सर्वकोश
रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)

Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya

जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

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८०४ | गङ्गा संहिता
१।४ आदि दश प्रश्न किये थे । उन प्रश्नों मे पाचवा प्रश्न 'धर्म एकोऽस्ति कश्च" १।४ श्री
वैष्णवमताब्जभास्कर के इस पाचवे प्रश्न के जवाब मे आनन्द भाष्यकार महाप्रभुजी ने सर्वधर्म
मुख्यात्मक श्रीवैष्णवधर्म निरूपण प्रसंग मे अर्चावतार की चर्चा 'अर्चावतारोऽपि च' ५।११ तथा
'स्वयं व्यक्तश्च' ५।१२ इन श्लोको से कर-
"आवाहनासनाभ्या च पाद्याद्याचमनैस्तथा ।
स्नानवस्त्रोपवीतैश्च गन्धपुष्पसुधूपकैः ॥५.१३
दीपनैवेद्यताम्बूलप्रदक्षिणविसर्जनैः । षोडशार्चाप्रकारैस्तमेतैरर्चेत्सदासुक्रीः ॥५.१४"
का उपदेश किया। अर्थात् मुमुक्षु भजनानन्दी महापुरुष प्रात उठकर के शौचादि स्नानान्त
प्रात्यहिक कर्मकर लेने के वाद समार्जित पूजा स्थानादि म उपस्थित होकर आवाहन आसन पाद्य
अर्घ्य आचमन स्नान वस्त्र यज्ञसूत्र गन्ध पुष्प धूप दीप नैवेद्य ताम्बूल प्रदक्षिणा और विसर्जनान्त
षोडशोपचार-विधि से समन्त्रक सर्वेश्वर श्रीरामजी की सर्वदा पूजा करे । पूजक यदि द्विज होतो
पुरुषसूक्त विधान से पूजन करे द्विजेतर होतो पौराणिक विधि से नियतरूप से अचेना करे । इस
प्रकार अति संक्षिप्त रूप से अर्चाश्रीविग्रह सर्वेश्वर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा का उपदेश महा प्रभुजी
ने किया । पर इस सूत्रात्मक उपदेश से सामान्य जन जिस प्रकार से सर्वेश्वरजी की सेवा होनी
चाहिये उस प्रकार नही कर पायेगे ऐसा विचार कर कारुणिक आचार्य श्रीने श्रीमुख से ही 'श्रीरा-
मार्चपद्धति' का उपदेश किया । जो कुछ विस्तृत तथा गद्य पद्य मय होने से स्वमुखारविन्द से ही
उपदिष्ट श्रीवैष्णवमताब्जभास्कर के खिल-परिशिष्ट भाग के रूप म प्रसिद्ध है । कई एक व्यक्ति
इस श्रीरामार्चनपद्धति को भाष्यकार की अलग कृति के रूप मे परिगणित करते हैं क्रिया सौविध्य
के लिये अलग से मुद्रित भी हे पर यह है एक ग्रन्थ भास्कर का परिशिष्ट भाग ही महाभारत
का शेषभाग हरिवंश के समान । अत आचार्य प्रवर- "तदित्थम्" इत्यादि से पूर्वोपदिष्ट प्रसंगानु
सन्धानपूर्वक उपदेश प्रारम्भ कर रहे है ।
भवसागर से मुक्ति की इच्छा वाले साधक को चाहियेकि दो घडी रात्रि शेष रहते ही
प्रात काल मे सर्वथा आलस्य रहित होकर उठ जाय । अनन्तर हाथ पैर धोकर यथेच्छ कुल्लाकर पूर्व-
दिशा के तरफ मुख कर बैठ जाय । तब अत्यन्त तन्मयता से- "हरि ॐ सचन्त' तथा "अर्वाची"
इन मन्त्रो का तथा प्रात स्मरण के पाच श्लोको का मधुर स्वर से अर्थानुसन्धानपूर्वक कीर्तन करे।
अनन्तर बाहर दूर जाकर दाहिने कान मे यज्ञसूत्र को वेष्टित-चढाकर उत्तराभिमुख होकर मल-
मूत्रका त्याग करे । पुन शौच तथा दुर्गन्ध निवारणार्थ आलस्य रहित होकर आवले के दाने के
बराबर विशुद्ध मिट्टी तथा शुद्ध जल से प्रत्येकवार सात बार गुदा को तीन बार लिंग को विधिवत्
प्रक्षालन कर फिर पूर्व क्रम से ही दशवार दोनो हाथ तथा पांचवार दोनोंपैर का प्रक्षालन करे ।
अनन्तर शुद्ध जल से सोलह कुल्ला करके शुद्ध हो जाय । इसके बाद दो वार आचमन कर देह
शुद्धि के लिये विशुद्ध जल से स्नान करे-देश काल स्वास्थ्यादि के आनुकूल्य से प्रोक्षणादि को
सम्पन्न करे । इसके बाद "श्रीराम जनकात्मजामनिन वेधो वशिष्ठावृपी यागीश च पराशर श्रुतिविद्
व्यास जिताक्ष शुकम् । श्रीमन्त पुरुषोत्तम गुणनधि गङ्गाधराद्यान्यतीन् श्रीमद्राघवदेशिकञ्च वरद
स्वार्यवर्यं श्रये ॥ इत्यादि समस्त पूर्वाचार्यो को अपने आचार्य-अपने दीक्षा गुरु तक सभी का
अनुसन्धान सादर स्मरण कर उन-उन मन्त्रो के उच्चारण पूर्वक बारह ऊर्ध्व पुण्ड्रों को धारण करके
अपने आचार्य-दीक्षागुरु तथा आचार्य परपरा के-