रामार्चन पद्धति (जगद्गुरु रामानन्दाचार्य - सन्त कबीर व रविदास के दीक्षा-गुरु प्रणीत मूल ग्रन्थ)
Ramarchana Paddhati of Jagadguru Ramanandacharya
जगद्गुरु स्वामी रामानन्दाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआग्नेय्यां दिशि ॐ धर्माय पीठपादाय नमः अ० । नैऋत्या ॐ ज्ञानाय पीठ-
पादाय ननः अ० । वायव्या ॐ वैराग्याय पीठपादाय नमः अ० । ऐशान्या ॐ
ऐश्वर्यायपीठपादाय नमः अ० । मध्ये ॐ पीठभूताय अनन्ताय नागराजाय नमः
अ० । प्राच्यां ॐ अधर्माय पीठगात्राय नमः अ० । दक्षिणस्या ॐ अज्ञानाय पीठ-
गात्राय नमः अ० पश्चिमायां ॐ अवैराग्याय पीठगात्राय नमः अ० । उत्तरस्या ॐ
अनैश्वर्याय पीठगात्राय नमः अ० ।
ॐ धर्माय पीठपादाय नम इस मन्त्र को बोलकर प्रथम सिंहासन के अग्नि कोण की अर्घ्य
आदि सर्वोपचार से पूजा करे । ॐ ज्ञानाय पीठपादाय नम ऐसा बोलकर नैऋत्य कोण की पूजा
करे । ॐ वैराग्यायपीठ पादाय नम ऐसा बोलकर वायव्य कोण की पूजा करे । ॐ ऐश्वर्याय
पीठपादाय नम ऐसा बोलकर ईशान कोण की पूजा करे । ॐ पीठ भूताय अनन्ताय नागराजाय
नम ऐसा बोलकर मध्यभाग की पूजा करे । ॐ अधर्माय पीठगात्राय नम ऐसा बोलकर सिंहा
सन के पूर्वभाग की पूजा करे । ॐ अज्ञानाय पीठ गात्राय नम ऐसा बोलकर दक्षिण भाग की
पूजा करे । ॐ अवैराग्याय पीठगात्राय नम ऐसा बोलकर पश्चिम दिशा की पूजा करे । ॐ
अनैश्वर्याय पीठगात्राय नम ऐसा बोलकर उत्तर दिशा की पूजा करे ।
एभिः परिच्छिन्नतत्त्वसदसदात्मकाय नमः अ० । ॐ ऋग्वेदाय पीठवाहकाय
नमः अ० । ॐ यजुर्वेदाय पीठवाहकाय नमः अ० । ॐ सामवेदाय पीठवाहकाय
नमः अ० । ॐ अथर्ववेदाय पीठ वाहकाय नमः अ० । इत्थं गन्धपुष्पादिभिस्तान-
भ्यर्च्य प्रणमेत् ।
ॐ एभि परिच्छिन्नतत्त्वसदसदात्मकाय नम ऐसा बोलकर अधर्म अज्ञान अवैराग्य तथा
अनैश्वर्य रूपमात्र से मुक्त कार्य तथा कारणस्वरूप पीठतत्त्व की सर्वोपचार से पूजा करे ।
पुन ॐ ऋग्वेदाय पीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर पूर्वदिशा मे ऋग्वेद की पूजा करे । ॐ
यजुर्वेदाय पीठवाहकाय नम ऐसाबोलकर दक्षिण दिशा मे यजुर्वेद की पूजा करे । ॐ सामवेदाय
पीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर पश्चिम दिशा मे सामवेद की पूजा करे । ॐ अथर्ववेदाय
पीठवाहकाय नम ऐसा बोलकर उत्तर दिशा मे अथर्ववेद की पूजा करे । ऊपर बताए अनुसार
गन्ध पुष्प अक्षत आदि यथोचित पूजा सामग्री से भगवोन के सिंहासन के वहन करने वाले
वाहक रूप चारो वेदो की पूजा कर प्रणाम करे ।
अथ पीठवाहकोपरि ॐ परिच्छिन्नतनवेपीठभूताय शुद्धात्मकायाऽनन्ताय-
नागराजाय नमः इति तस्मै अ० । तत्रानन्तोपरि ॐ अष्टदल पद्माय नमः इति
तस्मै अ० । तद्दलेषु ॐ सं सूर्याय नमः अ० । केशरेषु ॐ सं सोममण्डलाय नमः अ० ।
कर्णिकायाम् ॐ रं वह्निमण्डलाय नमः अ० ।
पूर्व मे बताये अनुसार वेदो की पूजा करने के बाद ॐ परिच्छिन्नतनवे पीठ भूताय
शुद्धात्मकायाऽनन्ताय नागराजाय नम ऐसा बोलकर पीठवाहक चारो वेदो के ऊपर पीठस्वरूप शेष